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Bhaya Kabeer Udas

Bhaya Kabeer Udas

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  • Pages: 183p
  • Year: 2019, 4th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126713875
  •  
    यह महज़ इत्तिफाक है या फिर उत्तराधिकार? नानी बहुत कम आयु में मर गई थीं, सुना था कि उनकी छाती मंे फोड़ा था, कभी किसी को बताया ही नहीं। यदि बताया भी होगा तो मालूम नहीं क्या उपचार हुआ होगा? अन्त समय में लोग उनके पास जाने तक से कतराते थे। मरी हुई मछली जैसी गन्ध आने लगी थी उनकी देह से। ‘‘कैन्सर!’’ डॉक्टर स्टीेवन ने सुनते ही कहा तुम्हारी नानी को अवश्य ही कैन्सर रहा होगा। यदि ट्यूमर निकाला न जाए तो वह अन्दर ही अन्दर ऐसे ही बढ़ता रहता है, जब फूटता है तो पूरे शरीर में उसका ज़हर फैल जाता है। बहुत भयंकर, पीड़ा भरी मौत होती है।’’ उसकी कल्पना मात्र से ही मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, डाक्टर स्टीवेन मेरे कंधे पर हलके से हाथ रखते हुए कहते हैं, ‘‘पर तुम फिक्र न करो हम लोग यहाँ हैं तुम्हारे लिए इस रणस्थली में हम साथ-साथ हैं मिलकर इस शत्रु को परास्त करने में सफल होंगे।’’ ‘‘वादा?’’ वह आश्वस्त भाव से मुस्करा दिए - ‘‘वादा’’ उन्होंने दोहराया।

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    Usha Priyamvada

    हिन्दी की विशिष्ट कथाकार।

    शिक्षा : इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में पी-एच.डी., इंडियाना यूनिवर्सिटी, ब्लूमिंगटन, अमेरिका में तुलनात्मक साहित्य में दो वर्ष पोस्ट-डॉक्टरल अध्ययन शोध। अध्यापन के प्रथम तीन वर्ष दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज दिल्ली, तदुपरान्त इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दो वर्ष में सम्पन्ना करके, विस्कांसिन विश्वविद्यालय मेडिसन के दक्षिण एशियाई विभाग में प्रोफेसर रहीं। हिन्दी और अंग्रेजी, दोनों ही भाषाओं में समान रूप से दक्ष उषा प्रियम्वदा ने साहित्य सृजन के लिए हिन्दी और समीक्षा अनुवाद और अन्य बौद्धिक क्षेत्रों के लिए अंग्रेजी का चयन किया।

    प्रकाशित पुस्तकें : उपन्यास : पचपन खम्भे लाल दीवारें (1961), रुकोगी नहीं राधिका (1966), शेष यात्रा (1984), अन्तर-वंशी (2000), भया कबीर उदास (2007)। कहानी-संग्रह : फिर बसंत आया (1961), जिन्दगी और गुलाब के फूल (1961), एक कोई दूसरा (1966), कितना बड़ा झूठ, मेरी प्रिय कहानियाँ, शून्य एवं अन्य रचनाएँ, सम्पूर्ण कहानियाँ (1997)।

    इसके अतिरिक्त भारतीय साहित्य, लोककथा एवं मध्यकालीन भक्ति काव्य पर अनेक लेख, जो अंग्रेजी में समय-समय पर प्रकाशित हुए। मीराबाई और सूरदास के अंग्रेजी अनुवाद साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने पुस्तक रूप में प्रकाशित किए। उन्होंने आधुनिक हिन्दी कहानियों के भी अनुवाद किए।

    इंडियन स्टडीज विभाग से संलग्न रहते हुए 1977 में उन्हें 'फुल प्रोफेसर ऑफ इंडियन लिट्रेचर’ का पद मिला। 2002 में अवकाश लेकर अब पूरा समय लेखन, अध्ययन और बागबानी में बिता रही हैं।

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