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Bhartiya Kavyashastra Ke Nai Chhitij

Bhartiya Kavyashastra Ke Nai Chhitij

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  • Pages: 403p
  • Year: 2018, 6th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171788386
  • ISBN 13: 9788171788385
  •  
    ––परंपरा कोई विच्छिन्न क्रम नहीं है । उसका स्वाभाविक विकास निरंतर होता रहता है । कई बार उसमें बड़े निर्णायक उभार दिखाई देते हैं लेकिन वे स्वत% स्वतंत्र नहीं होते । वे बड़े वैचारिक द्वंद्व के, सांस्कृतिक उथल–पुथल के प्रतिबिंब मात्र होते हैं । अनेक बार अतिरिक्त उत्साह के कारण हम बिना जाने ही अपनी परंपरा से विरासत में प्राप्त ज्ञान को व्यर्थ और अनुपयोगी मान बैठते हैं, जिससे हम उस शक्ति से वंचित हो जाते हैं जो हमारे साहित्य और सांस्कृतिक जगत की प्राण–/ाारा है । डॉ– राममूर्ति त्रिपाठी ने अपने आलोचनात्मक ग्रंथ भारतीय काव्यशास्त्र के नए क्षितिज में इसी शक्ति को, इसी प्राण–धारा को सुरक्षित रखने का गंभीर प्रयास किया है । पुरातन मनीषा आज के साहित्यालोचन की कहाँ तक सहयात्री हो सकती है, यही मूल चिंता लेखक के संपूर्ण विश्लेषण में व्याप्त है । लेखक ने अपने मंतव्य को कोरे सैद्धांतिक कथनों में प्रकट न करके साहित्य के गंभीर विश्लेषण के मा/यम से प्राचीन आचार्यों के वैचारिक मंथन को सारग्राही, प्रौढ़ और आवश्यक सिद्ध किया है । यद्यपि विद्वान लेखक ने विभिन्न काव्य–संप्रदायों के आचार्यों का चिंतन गवेषणापूर्ण ढंग से विश्लेषित किया है किंतु सर्वा/िाक शक्तिशाली काव्य–सिद्धांत के रूप में आचार्य आनंदवर्द्धन ने रस–ध्वनि मत की अत्यंत विशद और गूढ़ विवेचना को केंद्र में रखा है । आधुनिक काव्यशास्त्र के क्षेत्र में सक्रिय आलोचकों और समीक्षकों की सोच की व्यापक पड़ताल, उनके मतों की भारतीय संदर्भों में समीक्षा के द्वारा लेखक ने पुरातन चिंतना की सार्थकता को सिद्ध करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है । इसी के साथ पौरस्त्य और पाश्चात्य की वैचारिकता के प्रस्थान बिंदु, इलियट, क्रोचे आदि मनीषियों के अवदान की चर्चा ने ग्रंथ की उपादेयता और बढ़ा दी है ।

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    Dr. Ram Murti Tripathi

    जन्म: 4 जनवरी, 1929;

    जन्म-स्थान: नीवी कलाँ, वाराणसी (उ.प्र.)।

    शिक्षा: काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से एम.ए., पी-एच.डी.; साहित्याचार्य, साहित्यरत्न।

    काव्यशास्त्र एवं दर्शन के प्रकांड पंडित। हिंदी विभाग, विक्रम विश्वविद्यालय, उज्जैन के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त।

    प्रकाशित कृतियाँ: व्यंजना और नवीन कविता, भारतीय साहित्य दर्शन, औचित्य विमर्श, रस विमर्श, साहित्यशास्त्र के प्रमुख पक्ष, लक्षणा और उसका हिन्दी काव्य में प्रसार, रहस्यवाद, काव्यालंकार सार संग्रह और लघु वृत्ति की (भूमिका सहित) विस्तृृत व्याख्या, नृसिंह चम्पू (व्याख्या), हिन्दी साहित्य का इतिहास, कामायनी: काव्य, कला और दर्शन, आधुनिक कला और दर्शन, भारतीय काव्यशास्त्र के नए संदर्भ, भारतीय काव्यशास्त्र: नई व्याख्या, तंत्र और संत, आगम और तुलसी, रस सिद्धांत: नए संदर्भ (प्रस्तोता के रूप में)।

    निधन : 30 मार्च, 2009 |

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