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Bhartiya Aryabhasha Aur Hindi

Bhartiya Aryabhasha Aur Hindi

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  • Pages: 321p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126709332
  •  
    उत्तरी भारत में यदि कोई व्यक्ति वहाँ की जनता से विचार-विनिमय करना चाहता है, तो उसके लिए हिन्दी या हिन्दुस्तानी के किसी एक रूप - नागरी-हिन्दी या उर्दू या केवल बाज़ारू हिन्दुस्थानी - का ज्ञान अनिवार्य हो जाता है। कलकत्ता या ढाका आनेवाले किसी गुजराती सज्जन को रेल, जहाज़, बाज़ार, रास्तों में सभी जगह लोगों से बातचीत करने के लिए अपनी टूटी-फूटी हिन्दुस्थानी का ही उपयोग करना पड़ेगा, चाहे वे उसका अपनी मातृभाषा के कारण बहुत-कुछ गुजरातीकरण क्यों न कर डालें; हाँ, कुछ इने-गिने शिक्षित लोगों से उनका काम अंग्रेज़ी में भी चल जाएगा। लगभग 35 वर्ष (इस पुस्तक का पहला संस्करण 1954 में हुआ था) से भी पहले की बात है, महात्मा गांधी कलकत्ता आए थे। उस समय लेखक ने उनका हिन्दुस्थानी में दिया हुआ व्याख्यान सुना था। उस भाषा पर उनकी मातृभाषा गुजराती का काफ़ी गहरा रंग चढ़ा था; परन्तु लेखक को उन दिनों के अपने हिन्दी के सीमित ज्ञान के बावजूद भी उस भाषा को समझने में बिलकुल भी कठिनाई नहीं हुई। इसी प्रकार एक बंगाली सज्जन अपनी टूटी-फूटी हिन्दुस्थानी के सहारे, फिर चाहे वह थोड़ी-बहुत बंगालीकृत हो, उत्तर भारत में पश्चिमी कोने तक बड़ी आसानी से प्रयाण कर सकते हैं। यह इसी महान् ‘आदान-प्रदान (मेल-मिलाप) भाषा’ की कृपा का फल है कि प्रवास या साधारणतया अन्य सम्पर्कों के अवसर पर हमें प्रादेशिक भाषाओं की विभिन्नता उत्तर भारत में (द्राविड़भाषी दक्षिण की तुलना में) बिलकुल भी नहीं अखरती। रास्ते में एकत्रित हुए लोगों के ऐसे झुंड हमें मिलेंगे जिनकी आपस में बोली जाती स्थानीय भाषा हम बिलकुल भी न समझें; परन्तु उनमें से भी दस प्रतिशत लोग ऐसे निकल ही आएँगे जो सहज हिन्दुस्थानी में किए हुए किसी प्रश्न का उत्तर, समझ में आ जाने लायक हिन्दुस्थानी से मिलती-जुलती-सी भाषा में अवश्य दे ही देंगे। यह बात आपको सर्वत्र मिलेगी; चाहे आप कुमिल्ला जाएँ या दार्जिलिंग, नोआखाली या बरिशाल, चाईबासा या पूना, पुरी या पेशावर, जोकि सारे हिन्दी या हिन्दुस्थानी क्षेत्र के बिलकुल बाहर पड़ते हैं। भारत में आनेवाला अंग्रेज़ थोड़ी-सी ‘बाज़ारू हिन्दुस्थानी’ सीख लेता है और उसी से उत्तर भारत के शहरों और गाँवों तथा दक्षिण भारत के बड़े शहरों तक में उसका काम अच्छी तरह चल जाता है। अंडमान द्वीपों में पोर्ट ब्लेयर की भारतीय कैदियों की बस्ती में भी मुख्यतः प्रचलित भाषा का स्थान चलतू हिन्दुस्थानी ही है, यद्यपि कैदी लोग भारत के विभिन्न भागों के निवासी हैं। उत्तर भारत में घुमक्कड़ ‘साधु- संन्यासी’ लोग अपने ‘संघ’ बनाकर विभिन्न प्रदेशों में घूमते समय स्थानीय जनों से इसी हिन्दी या हिन्दुस्थानी में ही बातचीत करते हैं; यहाँ तक कि बंगाल में (तथा जहाँ तक लेखक ने सुना है, आर्यभाषी भारत के अन्य भागों में भी) हिन्दी या हिन्दुस्थानी तो ‘साधु-संन्यासी’ लोगों की स्वाभाविक भाषा ही समझी जाती है। ‘साधु’ लोग निरन्तर विचरण एवं भ्रमण की भावना से प्रेरित होकर घर-बार छोड़कर सुदूर अपरिचित देशों तथा तीर्थ स्थानों की यात्रा करते रहते हैं, और हिन्दू धर्म के धार्मिक जीवन के एक अखिल भारतवर्षीय दृष्टिकोण में उनका विशिष्ट स्थान होता है। उत्तर भारत की धार्मिक तथा सांस्कृतिक परिस्थिति में ऐसी एक ‘सधुक्कड़’ भाषा का अपना खास स्थान है। उपर्युक्त परिभ्रमण तथा हिन्दू धर्म की अखिल भारतीयता - इन दोनों वस्तुओं की भाषागत अभिव्यक्ति हमें पूर्णतया हिन्दी या हिन्दुस्थानी में मिलती है। केवल बंगला या गुजराती, पंजाबी या मराठी का ज्ञान किसी व्यक्ति को प्रांतों के संकुचित क्षेत्र तक ही सीमित रख सकता है; परन्तु हिन्दी या हिन्दुस्थानी को लेकर वह अखिल भारतीय बन जाता है: सर्वसाधारण की भावना भी यही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दुस्थानी उत्तरी या आर्य भारत के वातावरण में पूर्णतया छाई हुई है। - (इसी पुस्तक से एक अंश)

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    Sunitikumar Chatujrya

    SunitikumarChatujrya

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