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Bharat Se Payar

Bharat Se Payar

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  • Pages: 267p
  • Year: 2006
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126712244
  •  
    जमशेतजी नुसेरवानजी टाटा का जन्म 1889 में हुआ था । उनके जीवनकाल में भारत अंग्रेजों के शिकंजे में कसा रहा । फिर भी उनके द्वारा परिकल्पित परियोजनाएँ देश के आजाद हो जाने पर उसके विकास का आधार बनीं । अपनी प्रकृति से असाधारण होते हुए भी ये संस्थान अपने-अपने क्षेत्रों में दूसरों के लिए आदर्श बने हुए हैं । उनकी ढेर सारी उपलब्धियों में देश के कुछ बेहतरीन वैज्ञानिकों को तैयार करनेवाला बेंगलूर का इंडियन इंस्टीट्‌यूट ऑफ साइंस; जमशेदपुर स्थित टाटा इस्पात संयंत्र; जो कि देश के व्यापार से विनिर्माण में संक्रमण करने का द्योतक है; उनकी पथ-प्रदर्शक पनबिजली परियोजना और दुनिया के लाजवाब होटलों में से एक मुंबई का ताजमहल होटल शामिल है । अपने हाथ में लिये अन्य कामों की भाँति जमशेतजी ने इन परियोजनाओं में एक ऐसे व्यक्ति की अमोघ नैसर्गिक वृत्ति को प्रकट किया जिसे पता था कि पराधीन राष्ट्र के गौरव की बहाली कैसे की जाए । उन्होंने देश की आजादी के बाद उसे दुनिया के अग्रणी राष्ट्रों में स्थान पाने में मदद की । ये परियोजनाएँ जिस बड़े पैमाने की थीं उसके लिए बहुत दम-गुर्दे की आवश्यकता थी । कुछ मामलों में तो बस लगे रहने की जिद थी जो कि रंग लाई-जैसे कि इस्पात परियोजना के लिए उपयुक्त जगह की तलाश करने का मामला असीम धैर्य के कारण हल हुआ । दूसरे मामलों में, जैसे-इंडियन इंस्टीट्‌यूट ऑफ साइंस में मान-मनुहार करने का उनका लाजवाब कौशल और धैर्य ही था जिसने आखिरकार शंकालु वाइसराय लॉर्ड कर्जन से उन्हें मंजूरी दिलवाई । 'भारत से प्यार' में आरएम. लाला ने जमशेतजी और उनके समय के जीवंत चित्रण के लिए लन्दन की इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी और दूसरे अभिलेखागारों की नवीन सामग्री के साथ-साथ उनके पत्रों का उपयोग किया । यह एक महत्त्वपूर्ण लेखा-जोखा है जो स्पष्ट कर देता है कि जशमेतजी की उपलब्धि वाकई मानीखेज थी और उनकी मृत्यु के सौ साल बाद भी ऐसा क्यों जान पड़ता है कि वे अपने समय से बहुत आगे थे ।

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    R. M. Lala

    रूसी एम. लाला ने अपने कार्यकाल का प्रारम्भ 1948 में 19 वर्ष की आयु में पत्रकारिता से किया। 1959 में वे लंदन में प्रथम भारतीय पुस्तक प्रकाशन-गृह के प्रबन्धक बने और 1964 में उन्होंने (राजमोहन गांधी के साथ मिलकर) हिम्मत वीकली की नींव रखी, जिसका उन्होंने एक दशक तक सम्पादन किया। उनकी प्रथम पुस्तक द क्रिएशन ऑफ वेल्थ, 1981 में प्रकाशित हुई जिसका प्रकाशकीय एवं व्यावसायिक दोनों ही : ष्टि से अप्रत्याशित स्वागत हुआ। इसके बाद कई अन्य पुस्तकें आईं जिनमें बियोंड द लास्ट ब्लू माउंटेन: ए लाइफ ऑफ जे. आर. डी. टाटा (1992), सेलीब्रेशन ऑफ द सैल्स: लैटर्स फ्रॉम ए कैंसर सरवाइवर (1999), ए टच ऑफ ग्रेटनेस: एनकाउंटर्स विद द ऐमिनेंट (2001), फॉर द लव ऑफ इंडिया: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ जमशेतजी टाटा (2004), इन सर्च ऑफ इथिकल लीडरशिप (2005) और रोमांस ऑफ टाटा स्टील (2007) सम्मिलित हैं।

    रूसी एम. लाला की पुस्तकों का अन्य भाषाओं, जिनमें जापानी भी शामिल है, अनुवाद हो चुका है। वे अठारह वर्षों तक टाटाओं के प्रमुख न्यास, सरदोराबजी टाटा ट्रस्ट के निदेशक रहे। वे सेंटर फ़ॉर एडवांसमेंट ऑफ़ फिलेन्थ्रॉपी के सह-संस्थापक रहे, और 1993 से इसके अध्यक्ष हैं।

    मॉरिओ मिराण्डा, जिनके चित्र इस पुस्तक में आए हैं, अत्यन्त लोकप्रिय कार्टूनिस्ट एवं चित्रकार हैं। उनकी रचनाओं का व्यापक प्रदर्शन एवं प्रकाशन हुआ है।

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