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Bhajpa Hinduttva Aur Musalman

Bhajpa Hinduttva Aur Musalman

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  • Pages: 352p
  • Year: 2010
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126718955
  •  
    ‘‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’’ अपने ढंग की अनूठी कृति है। इस विषय का यह पहला मौलिक और विचारोत्तेजक ग्रंथ है। उक्त तीनों मुद्दों और उनके आपसी संबंधों पर जितनी गहराई और जितने कोणों से विद्वान लेखक ने विचार किया है, अब तक किसी भी ग्रंथ में नहीं किया गया है। भाजपा का असली संकट क्या है, उसका समाधान क्या है, उसका भविष्य कैसा है, वह कहीं कांग्रेस की कार्बन-कॉपी तो नहीं बन गई है, संघ और भाजपा के बीच अतर्द्वन्द्व के मुद्दे कौन-कौन से हैं, आदि अनेक प्रश्नों पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने गहन विश्लेषण प्रस्तुत किया है। सावरकर का हिंदुत्व अब कितना प्रासंगिक रह गया है? उसमें से क्या घटाया और क्या जोड़ा जाए, इस जटिल और विवादास्पद विषय पर डॉ. वैदिक ने जो मौलिक विचार प्रस्तुत किए हैं, वे भाजपा ही नहीं, 21वीं सदी के भारत के लिए भी ध्यातव्य हैं। हिंदुत्व और इस्लाम के नाम पर चले अभियानों पर लेखक के जिन बेबाक निबंधों ने देश की तत्कालीन राजनीति पर सीधा असर डाला था, वे भी इस ग्रंथ में संकलित किए गए हैं। इस ग्रंथ में कुछ निबंध ऐसे भी हैं, जिनके बारे में आपको लगेगा कि वे अपने आप में एक-एक ग्रंथ के बराबर हैं। मुस्लिम राजनीति और मुसलमानों के प्रति भाजपा के रवैए पर भी लेखक ने अपनी दो-टूक राय जाहिर की है। मुसलमान भारतीय इतिहास को कैसे देखें और शेष भारत मुसलमानों को कैसे देखे, आदि अत्यंत पेचीदा और नाजुक मुद्दों पर भी लेखक ने अपने निर्भीक विचार प्रस्तुत किए हैं। डॉ. वैदिक कोरे विचारक और पत्रकार नहीं हैं। उन्होंने देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका अदा की है। पिछले 50 वर्षों में वे अनेक आंदोलनों के सूत्रधार रहे हैं। दलों की राजनीति से ऊपर रहते हुए भी देश के सभी शीर्ष नेताओं से उनके घनिष्ठ संबंध रहे हैं। ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’ जैसे महत्वपूर्ण विषय पर डॉ. वैदिक के ये निबंध हमारे राजनेताओं, विद्वानों, पत्रकारों और प्रबुद्ध पाठकों के लिए दिशा-बोधक और उपयोगी सिद्ध होंगे।द

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    Ved Pratap Vaidik

    वेदप्रताप वैदिक

    अपने मौलिक चिन्तन, प्रखर लेखन और विलक्षण वक्तृत्व के लिए विख्यात। जन्म: 30 दिसम्बर, 1944 में इन्दौर में। सदा प्रथम श्रेणी के छात्र। फ़ारसी, रूसी और संस्कृत आदि भाषाओं के जानकार। दर्शन और राजनीतिशास्त्र मुख्य विषय। 1971 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’ विषय पर पी-एच.डी.। दिल्ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में राजनीतिशास्त्र का अध्यापन। ‘इंडियन कौंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च’  द्वारा अफ़गानिस्तान पर शोध-कार्य के लिए वरिष्ठ शोधवृत्ति। 1981 से 1983 के बीच ‘इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस’ तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय राजनय विभाग में ‘सीनियर फैलो’ के तौर पर शोध एवं अध्यापन। 1999 में विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दक्षिण एशियाई विश्व-सम्मेलन में उद्घाटन-भाषण। लगभग दस वर्षों तक पी.टी.आई. भाषा के संस्थापक-सम्पादक और उसके पहले नवभारत टाइम्स के सम्पादक (विचार) रहे।

    छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार। साठ से अधिक देशों की यात्राओं के साथ भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में अनेक व्याख्यान।  अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर 1962 से अब तक अगणित कार्यक्रम। पिछले 40 वर्षों में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर सैकड़ों लेख, हजारों संपादकीय टिप्पणियाँ और दर्जनों शोध-पत्र प्रकाशित।

    कृतियाँ: अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा, हिन्दी पत्रकारिता: विविध आयाम, भारतीय विदेश नीति: नये दिशा संकेत, एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका: इंडियाज़ ऑप्शन्स, हिन्दी का सम्पूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो?, भारतीय भाषाएँ लाओ, अंग्रेज़ी हटाओ, वर्तमान भारत, अफगानिस्तान: कल आज और कल।

    भारतीय भाषाओं के संघर्ष के प्रतीक। 1966 में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रन्थ हिन्दी में लिखने का आग्रह। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से इसी कारण निष्कासन। संसद में दो वर्ष तक अपूर्व हंगामा। राष्ट्रीय विवाद। अन्ततः विजय। पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले।

    अनेक सम्मानों से विभूषित। एकाधिक प्रतिष्ठित संस्थाओं में सक्रिय योगदान।

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