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Bahrupiya Shahar

Bahrupiya Shahar

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  • Pages: 253p
  • Year: 2007
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126713493
  •  
    ‘‘स्कूल के गेट के बाहर को थामे हुए लोगों की लाईन समाज के ढाँचे में ढली अपनी अनचाही पहचान से लड़ रही थी। आँखों में बेचैनी, चेहरे पर एक भूख लिए कोई बैठा था। किसी ने धूप से बचने के लिए पल्लू से अपने सिर को ढका हुआ था, कोई दीवार से टेक लगाए उसके साये में खड़ा था। एक अजीब शोर था इस दृश्य में।...’’ ‘‘उसने जैसे ही अपना पैर सिंकोड़ा, उसके मुँह से कराहने की आवाज आई। मैंने उसके पैंट के पाँयचे ऊपर करते हुए देखा तो उसके टखने एकदम सुर्ख और सूजे हुए थे। मेरा हाथ जैसे वहीं जम गया। चारों तरफ की छतें सपाट मैदान में बदल गई थीं।’’ ‘‘दोपहर का वक्त था। मैं बाहर से होकर घर लौटी, अभी दरवाजे तक ही पहुँची थी। सूरज की तेजी के मुकाबले घर में अंधेरा था। कमरे में एक तरफ चूल्हा जल रहा था। माँ और मौसा उसकी चमक के दोनों तरफ खड़े थे। कमरे में धुआँ भरा था। मौसा के बाएँ हाथ में कुछ कागज और लिफाफे थे। बगल में डायरियाँ एक के ऊपर एक रखी थीं।...’’ ‘‘बाहर सड़क पर काफी कोहरा था और बहुत कम लोग, इक्के-दुक्के या वो भी नहीं दिखाई देते। पापा ने ठंड के लिए मफलर और एक जर्सी बदन पर डाल ली थी। मुझे पूरा जैकेट और जर्सी में पैक कर दिया था। हम चाँदनी चौक के एक रैन बसेरे की तरफ जा रहे थे। पापा को पता था कि वहाँ पटरियों पर कई लोग सोते हैं और सुबह जल्दी ही निकल जाते हैं। इस वजह से हम इतने सवेरे निकले थे भइया की तलाश में।...’’ ‘‘चारों तरफ ठंडी राख थी। उसके बीच जले बाँस, लकड़ी के लठ और बल्ले कोयले की शक्ल में बेजान पड़े थे। लोहे के पाईपों का मुड़ा आकार जगह-जगह राख के टीलों से निकल रहा था। दीवारों और दरवाजों से बनाई जमीन की रेखाएँ धुंधली होकर राख के साथ उड़ रही थीं। राख के कोहरे के बीच रामबाबू अपने हाथ जोड़े खड़े थे।...’’ -इसी किताब से

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