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Azadi Ki Aadhi Sadi : Swapna Aur Yatharth

Azadi Ki Aadhi Sadi : Swapna Aur Yatharth

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  • Pages: 180p
  • Year: 2010
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126721078
  •  
    शिक्षित वर्ग और साधारण जन के सम्बन्ध में क्रातिकारी परिवर्तन लाने का गाँधी जी का प्रयास एक नए, मौलिक और स्वायत आधार पर दो वर्गों के बीच सेतु कायम करने के प्रयास था-एक ऐसा वर्ग जो ज्ञान का तो सृजन और सवर्धन करता है किन्तु सामाजिक व्यवहार और श्रमिक समाज से कटा हुआ है और दूसरा विशाल समुदाय जो सामाजिक व्यवहार और श्रम की प्रक्रिया से तो अभिन्न रूप से जुदा है लेकिन जो कोल्हू के बैल की तरह चक्कर कटता हुआ परिवर्तन और विकास के स्रोतों से-ज्ञान-विज्ञान और उसके नवीनीकरण पर आधारित टेक्नोलॉजी के नवीनीकरण की प्रक्रियाओं से-कटा हुआ है | गाँधी का महाप्रयास औपनिवेशिक माध्यम वर्ग और किसान-मजदूर के बीच सेतु कायम करना था-ऐसा माध्यम वर्ग जो भूमि, पूँजी, उद्यम का धनि है लेकिन जिसकी भूमिका उपनिवेशवाद के दलाल के रूप में किसान और मजदूर वर्ग के शोषक और उसकी श्रमशक्ति के दोहन की है और ऐसा किसान और मजदूरवर्ग जो विशाल श्रम-शक्ति का धनि है लेकिन जिसकी श्रमशक्ति का स्वयं अपने और देश के हित में उपयोग नहीं होता है | गाँधी जी ने शिक्षित वर्ग और साधारण जन, माध्यम वर्ग और गरीब किसान-मजदूर तथा शहर और ग्राम के अलगाव में देश की त्रासदी की कुंजी खोजी थी | गाँधी जी की यह मूल समझ आज के भारत के लिए भी उतनी ही जिवंत और प्रासंगिक है जितनी उनके जीवनकाल के भारत और उसके बाद के पांच दशकों के लिए थी | इस अलगाव और अंतर्विरोध से आज की परिस्थिति में जूझकर और उसमे गुणात्मक परिवर्तन लाकर ही भारत की उन्नति और विकास के नए क्षितिज खुलेंगे, यही सत्य हमारा पिछले पांच दशकों का इतिहास और हमारा अनुभव हमें सिखाता है | -- इसी पुस्तक से

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    Puran Chandra Joshi

    डॉ– पूरनचंद्र जोशी
    जन्म : 9 मार्च, 1928; ग्राम दिगोली, अल्मोड़ा (उत्तराखंड); प्रारम्भिक शिक्षा : मॉडल स्कूल और गवर्नमेंट इंटर कॉलेज, अल्मोड़ाय उच्च शिक्षा : बी–ए– ऑनर्स, एम–ए– और पी–एच–डी–, लखनऊ स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड सोशियोलोजी, लखनऊ विश्वविद्यालय ।
    भारतीय समाजशास्त्र के उच्चकोटि के अध्यापन और चिन्तन और बंगाली भाषा में साहित्य और समाजशास्त्र को जोड़ने की दिशा में सृजन के लिए जाने–माने डी–पी– साहब से प्रेरणा पाकर ‘साहित्य की सामाजिक भूमिका’ और ‘हिन्दी साहित्य में किसान’ विषयों पर विचारोत्तेजक लेखन । युवा काल से मार्क्स से प्रेरणा पाकर ‘सामाजिक क्रान्ति’ और ‘उत्पीड़ितों के समाजशास्त्र’ की दिशा में मौलिक लेखन ।
    भूमिसुधार, कृषि–विकास, ग्रामीण श्रमिक हितकारी नीतियों तथा संचार और सम्प्रेषण की विकास में भूमिका के प्रश्नों पर उच्चस्तरीय कमेटियों के चेयरमैन या सदस्य के रूप में कई वर्षों तक सक्रिय ।
    सम्मान : समाजशास्त्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए भारतीय समाजशास्त्र परिषद् द्वारा ‘लाइफ टाइम एचीवमेंट एवार्ड’ द्वारा सम्मानित । रवीन्द्र भारती विश्वविद्यालय, कलकत्ता द्वारा डी–लिट्– आनरिस कौजर की उपाधि से सम्मानित । हिन्दी के प्रमुख संस्थानों द्वारा हिन्दी में अर्थ और समाजशास्त्र के मौलिक शोध और लेखन के लिए पुरस्कृत ।
    प्रमुख प्रकाशित रचनाएँ : भारतीय ग्रामय परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयामय आजादी की आधी सदी : स्वप्न और यथार्थय अवधारणाओं का संकटय महात्मा गांधी की आर्थिक दृष्टि : जीवन्तता और प्रासंगिकताय मेरे साक्षात्कारय संचार, संस्कृति और विकास (हिन्दी अनुवाद); अंग्रेजी में एक दर्जन से अधिक पुस्तकों का लेखन । इसके अतिरिक्त प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं में समय–समय पर प्रकाशित  महत्त्वपूर्ण लेख ।
    विदेश यात्राएँ : अमेरिका, रूस, चीन, थाइलैंड आदि कई देशों की यात्राएँ ।
    सम्प्रति : स्वतंत्र लेखन ।

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