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  • Pages: 255p
  • Year: 2008, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171783762
  •  
    रघुवीर सहाय आधुनिक भारत के अंतर्राष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त कवी तो थे ही, इस दौर के एक सशक्त संपादक और समाजवादी विचारक भी थे ! हिंदी पत्रकारिता में उन्होंने संवाददाता, संपादक और स्तम्भ-लेखक के रूप में लम्बे समय तक महत्त्पूर्ण भूमिका निबाही ! अर्थात में संकलित लेख उन्होंने 1984 से 1990 के दौरान लिखे जो 'जनसत्ता' में नियमित स्तम्भ के तौर पर छपे ! प्रस्तुत पुस्तक में संकलित लेखों में रघुवीर सहाय की सामाजिक चिंताएं, उनकी जीवनदृष्टि और समाज विरोधी शक्तियों के विरुद्ध उनकी संघर्षशीलता परिलक्षित होती है ! उनके इन लेखों से राजनीति, समाज, संस्कृति, भाषा, पत्रकरिता, संचार, रंगमंच, फिल्म, साहित्य, यात्रा और संस्मरण जैसे विषयों पर समग्रता से विचार करने की पद्धति सीखने को मिलती है ! रघुवीर सहाय ने अपने इन लेखों में राजनीति में प्रबंध और साम्प्रदायिकता पर तीखे प्रहार किये हैं, पत्रकारिता और भाषा के सवालों पर गहराई से विचार किया है और समाज में न्याय, समता तथा स्वतंत्रता की धारणा प्रस्तुतु की है ! यह पुस्तक रघुवीर सहाय के लेखन में रुचि रखनेवालों के लिए तो महत्त्पूर्ण है ही, समाजवादी विचारों से जुड़े व्यक्तियों और पत्रकारिता, साहित्य तथा संस्कृति के अध्येताओं के लिए भी विशेष उपयोगी है !

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    Raghuveer Sahai

    जन्म: 9 दिसम्बर, 1929, लखनऊ।

    शिक्षा: लखनऊ विश्वविद्यालय से 1951 में अंग्रेजी साहित्य में एम.ए.।

    समाचार जगत में ‘नवजीवन’ (लखनऊ) से आरम्भ करके पहले समाचार विभाग, आकाशवाणी, नई दिल्ली में और फिर ‘नवभारत टाइम्स’ नई दिल्ली में विशेष संवाददाता और अनंतर 1979 से 1982 तक ‘दिनमान’ समाचार साप्ताहिक के प्रधान सम्पादक रहे। उसके  बाद अपने अन्तिम दिनों तक स्वतंत्र लेखन करते रहे। 1988 में भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य मनोनीत।

    साहित्य के क्षेत्र में प्रतीक (दिल्ली), कल्पना (हैदराबाद) और वाक् (दिल्ली) के सम्पादक-मंडल में रहे। कविताएँ दूसरा सप्तक (1951), सीढ़ियों पर धूप में (1960), आत्महत्या के विरुद्ध (1967), हँसो, हँसो जल्दी हँसो (1975), लोग भूल गए हैं (1982) और कुछ पते कुछ चिट्ठियाँ (1989) में संकलित हैं।

    कहानियाँ सीढ़ियों पर धूप में, रास्ता इधर से है (1972) और जो आदमी हम बना रहे हैं (1983) में और निबंध सीढ़ियों पर धूप में, दिल्ली मेरा परदेस (1976), लिखने का कारण (1978), ऊबे हुए सुखी और वे और नहीं होंगे जो मारे जाएँगे (1983) में उपलब्ध हैं। इसके अलावा कई नाटकों और उपन्यासों के अनुवाद भी किए हैं।

    सम्पूर्ण रचनाकर्म रघुवीर सहाय रचनावली में प्रस्तुत है।

    ‘लोग भूल गए हैं’ को 1984 का राष्ट्रीय साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। मरणोपरांत हंगरी के सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान, बिहार सरकार के राजेन्द्र प्रसाद शिखर सम्मान और आचार्य नरेन्द्रदेव सम्मान से उन्हें सम्मानित किया गया।

    देहान्त: 30 दिसम्बर, 1990

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