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Sanskriti : Rajya Kalayen Aur Unse Pare

Sanskriti : Rajya Kalayen Aur Unse Pare

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  • Pages: 206p
  • Year: 1999
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171787606
  •  
    संस्कृति भारतीय अनुभव की आत्मा है। भारतीय अनुभव को समझने के लिए आवश्यक है कि उसके मर्म में स्थित भारतीय संस्कृति को समझा जाए। ईसाई युग के अभ्युदय से काफी पहले ही पूर्णत: विकसित हो चुकी इस संस्कृति ने भारतवासियों को (और समस्त भरतवंशियों को भी) एक निश्चित अस्मिता और चरित्र से संपन्न किया है। लेखक की मान्यता है कि संस्कृति के इसी अवदान के कारण भारतीय जन-गण इतिहास के कई दौरों और मानव-चेतना में हुए कई परिवर्तनों के बावजूद अनी अखंडता सुरक्षित रख पाए हैं। यह पुस्तक भारतीय संस्कृति की एक असाधारण अन्वेषण-यात्रा करते हुए व्याख्यात्मक प्रयास के जरिए कई अंतर्संबंधित विषय-वस्तुओं पर प्रकाश डालती है। इन्हीं में से एक धारणा यह है कि भारत में एक विकसित संस्कृति और विकासमान अर्थव्यवस्था का दुर्लभ संयोग मिलता है। लेखक का दावा है कि बीसवीं सदी के आखिरी वर्षों में राष्ट्र-समुदाय के बीच राष्ट्रों की हैसियत तय करने में संस्कृति का कारक महत्वपूर्ण होता जा रहा है। शीतयुद्धोत्तर विश्व में 'बाजार' ने 'सैन्य-शक्ति' को प्रतिस्थापित कर दिया है और 'संस्कृति' अब इन दोनों के महत्त्व को चुनौती दे रही है। लेखक ने कला और संस्कृति के साथ भारतीय राज्य की अन्योन्यक्रिया की जाँच-पड़ताल ऐतिहासिक ही नहीं, समकालीन दृष्टिकोण से भी की है। उनकी मान्यता है कि जवाहरलाल नेहरू और मौलाना आजाद के जमाने से ही भारत सरकार कला और संस्कृति के क्षेत्रों को प्रायोजित करने और संरक्षण देने की नीति के साथ प्रतिबद्ध रही है (इस विषय से जुड़े हुए कुछ पत्राचार संबंधी अप्रकाशित दस्तावेज भी पुस्तक में उद्धृत किए गए हैं)। नब्बे के दशक की शुरुआत से जारी अर्थव्यवस्था के उदारीकरण और पश्चिमी मीडिया के प्रभावों के मद्देनजर लेखक ने व्यापारिक क्षेत्र द्वारा संस्कृति के क्षेत्र में सरकार के साथ जुड़ने की आवश्यकता की ओर ध्यान खींचा है। उसका तर्क है कि धरोहर सथलों के समुचित संरक्षण और भारतीय संस्कृति के रचनात्मक रखरखाव के लिए परियोजनाओं और कार्यक्रमों के प्रायोजित करने का दायित्व निभाने में निजी क्षेत्र सरकार की मदद कर सकता है। पुस्तक इस संबंध में विचारवान नागरिकों और स्वयंसेवी संस्थाओं की भूमिका को उभारते हुए सुझाव देती है कि देश की सांस्कृतिक धरोहर के प्रबंधन के लिए भारत सरकार को इस काम में विशेष रूप से पारंगत प्रशासिक कैडर का गठन करना चाहिए। संस्कृति से संबंधित यह सर्वथा नवीन विश्लेषण 'सभ्यताओं में संघर्ष' जैसी बहुप्रचारित धारणाओं को अस्वीकार करते हुए सभ्यताओं के बीच मैत्री का परिदृश्य व्याख्यायित करता है और उसे लोकतंत्र के सुदृढ़ीकरण के व्यापकतर संदर्भ से जोड़ देता है। लेखक की दलील है कि इस वैचारिक विन्यास के लिए आनेवाली सहस्राब्दि में गौतम बुद्ध और महात्मा गांधी की शिक्षाएँ उत्तरोत्तर प्रासंगिक होती चली जाएगी। भारतीय सांस्कृतिक इतिहास, राजकीय नीति के विश्लेषण और दार्शनिक विचार-विमर्श के मिश्रण के माध्यम से यह पुस्तक राष्ट्रीय सांस्कृतिक धरोहर और उसके भारतीय व वैश्विक संदर्भों पर एक चुनौतीपूर्ण व नवीन दृष्टि डालती है।

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    Balmiki Prasad Singh

    सिक्किम के राज्यपाल बाल्मीकि प्रसाद सिंह एक मान्य विद्वान, विचारक और प्रशासक हैं। आपको ‘जवाहरलाल फैलोशिप’ (1982-84), ‘क्वीन एलिजाबेथ फैलोशिप’ (1989-90) और ‘महात्मा गांधी फेलोशिप’ सहित अनेक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। इनमें विशिष्ट प्रशासनिक सेवा के लिए भारत के राष्ट्रपति द्वारा ‘गुलजारी लाल नंदा अवार्ड’ (1998) और माननीय दलाई लामा द्वारा ‘मैन ऑफ लैटर्स’ अवार्ड (2008) भी शामिल हैं।

    पिछले चार दशकों में आप अतिरिक्त सचिव (पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, 1993-95), संस्कृति सचिव (1995-97) और गृह सचिव (1997-99) जैसे विभिन्न महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्य कर चुके हैं। 1999-2002 की अवधि में आप विश्व बैंक में कार्यकारी निदेशक और राजदूत भी रहे।

    प्रकाशित रचनाएँ: द प्रॉब्लम ऑफ चेंज: ए स्टडी ऑफ नॉर्थ ईस्ट इंडिया (1987); इंडिया’ज कल्चर: द स्टेट, द ऑर्ट्स एंड बियांड (1998); (‘संस्कृति: राज्य, कलाएँ और उनसे परे’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित) सहित पाँच पुस्तकें।

    ‘द मिलेनियम बुक ऑन न्यू डल्ही’ (2001) के मुख्य सम्पादक।

     

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