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Anubhav Ke Aakash Mein Chand

Anubhav Ke Aakash Mein Chand

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  • Pages: 143
  • Year: 2017, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126707287
  •  
    सातवें दशक में नाटक जारी है के प्रकाशन से लीलाधर जगूड़ी की कविता अपने विभिन्न पेचीदा मोड़ों और पड़ावों से होती हुई बीसवीं सदी के अंतिम दशक में अनुभव के आकाश में चाँद नमक इस नए संग्रह के साथ एक नई जगह पर आ पँहुची है | इन 74 कविताओं में जगूड़ी अपने समय के बाहर और भीतर को; पास और दूर को; उसके अन्तः स्रोतों और अंतर्विरोधों को एक साथ देख लेते हैं | निरंतर होते जा रहे इस संसार के ताप से पके हुए आत्मस्थ सौन्दर्य की ये कविताएँ स्मृति, उपस्थिति और संभाव्यता के बीच सहज आवा-जाही करती हैं | इन कविताओं में अनुभव का आकाश एक साथ ऊँचा और गहरा; विस्तृत और सघन हुआ है | जगूड़ी की पहचान सबसे पहले अपने समय और परिवेश को पैनी निगाह से देखने वाले कवी के रूप में रही है लेकिन इस संग्रह में वे मूलभूमि छोड़े बिना और अधिक अनुभव संपन्न होकर बाहर आते देखते हैं | यह बाहर आना समकालीनता का इतिहास लिखने जैसा एक महत्त्पूर्ण उपक्रम जान पड़ता है | अनुभव के आकाश में चाँद की कवितायेँ हमें हिंदी कविता का एक नया व्यक्तित्व दिखाती है | इसकी वजह कथ्य के अलावा इनके उस शिल्प की विविधता में भी है जो अत्यंत संवेदनशील भाषा और जोखिम उठाती प्रयोगशीलता से भरी हुई है | दरअसल यह संग्रह कवि के इस विशवास का भी उदहारण है कि जीवन के हरेक अनुभव को भाषा का अनुभव बनना चाहिए | जीवन के बाजार में आत्मा की तरह विस्मत और विकल ये कविताएँ इस सच को रेखांकित करती चलती हैं कि सिक्के का दूसरा पहलू कहीं ज्यादा महत्त्पूर्ण है | दृश्य के अदृश्य को दिखाने में जगूड़ी की इन कविताओं की तात्विक मुखरता और इनका आत्निष्ठ एकांत अपने साथ हमें संलग्न ही नहीं करते बल्कि अपने में अन्तर्निहित भी करते हैं |

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    Liladhar Jagudi

    जन्म: 1 जुलाई, 1940, धंगण गाँव (सेम मुखेम), टिहरी (उत्तराखंड)। राजस्थान और उत्तर प्रदेश के अलावा भी अनेक प्रान्तों और शहरों में कई प्रकार की जीविकाएँ करते हुए शालाग्रस्त शिक्षा के अनियमित क्रम के बाद हिन्दी साहित्य में एम.ए.। फौज (गढ़वाल राइफल) में सिपाही। लिखने-पढ़ने की उत्कट चाह के कारण तत्कालीन रक्षामन्त्री कृष्ण मेनन को प्रार्थना पत्र भेजा, फलतः फौज की नौकरी से छुटकारा। छब्बीसवें वर्ष में पूरी तरह घर वापसी और परिवार की खराब आर्थिक स्थिति के कारण सरकारी जूनियर हाईस्कूल में शिक्षक की नौकरी। बाद में पब्लिक सर्विस कमीशन उत्तर प्रदेश से चयनोपरांत उत्तर प्रदेश की सूचना सेवा में उच्च अधिकारी और पहाड़ से बीस वर्ष का स्वैच्छिक निर्वासन।

    सेवा-निवृत्ति के बाद नए राज्य उत्तराखंड में सूचना सलाहकार, ‘उत्तरांचल दर्शन’ के प्रथम सम्पादक तथा उत्तराखंड संस्कृति साहित्य कला परिषद के प्रथम उपाध्यक्ष रहे।

    जगूड़ी ने 1960 के बाद की हिन्दी कविता को एक नई पहचान दी है।

    प्रकाशित कविता-संग्रह: शंखमुखी शिखरों पर, नाटक जारी है, इस यात्रा में, रात अब भी मौजूद है, बची हुई पृथ्वी, घबराए हुए शब्द, भय भी शक्ति देता है, अनुभव के आकाश में चाँद, महाकाव्य के बिना, ईश्वर की अध्यक्षता में, खबर का मुँह विज्ञापन से ढका है। ‘कवि ने कहा’ सीरीज में कविताओं का चयन। गद्य: मेरे साक्षात्कार।

    प्रौढ़ शिक्षा के लिए ‘हमारे आखर’ तथा ‘कहानी के आखर’ का लेखन। ‘उत्तर प्रदेश’ मासिक और राजस्थान के शिक्षक- कवियों के कविता-संग्रह ‘लगभग जीवन’ का सम्पादन। अनेक भाषाओं में कविताओं के अनुवाद।

    सम्मान: रघुवीर सहाय सम्मान, भारतीय भाषा परिषद कलकत्ता का सम्मान, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का नामित पुरस्कार। ‘अनुभव के आकाश में चाँद’ (1994) के लिए 1997 में साहित्य अकादमी पुरस्कार। 2004 में पर्शिं्री से अलंकृत।

    सम्प्रति: स्वतन्त्र लेखन।

    मो. 09411733588

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