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Anubhav

Anubhav

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  • Pages: 165p
  • Year: 1996
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171784836
  •  
    अश्वत्थामा के माथे पर के सदा बहते घाव की तरह मनुष्य की पेशानी पर भी प्रकृति ने एकाकीपन का एक ज़ख्‍़म बड़ा है । इस ज़ख़्म को भरने के सफल-असफल प्रयासों का नाम जीवन है । सामाजिक क्षेत्र में, महत्वाकांक्षा का दामन थाम, कुछ कर गुजरने की ललक इस घाव को किन्हीं अंशों में भरने में सहायक होती है । परंतु मन के एकाकीपन का जख्‍म सदा रिसता रहता है । पारसी पृष्ठभूमि पर लिखे इस उपन्यास की नायिका खोर्शेद की छोटी-सी दुनिया-कमजोर-दिमाग माँ, प्यारे पेसी अंकल, आया मेरी तथा इब्राहीम पॉववाले तक सीमित है, जहाँ प्रेम एवं विश्वास से घिरी, वह अपने छोटे-छोटे सुखों को लेकर संतोष से जी रही है । जिस स्कूल में वह पड़ी है, वहीं नौकरी पा जाना उसके सुख की पराकाष्ठा है । यहाँ उसका संपर्क होता है दो भाइयों से । केखुशरू यानि केकी, जो दफ्तर में उसका बॉस है, और मीनोचेहेर या मीनू जो उसकी इच्छा, आकांक्षाओं का केंद्र बिंदु हैं । वक्त आने पर उसे अपने जन्म की हकीकत से अवगत कराया जाता है । यह जानकारी उसकी छोटी-सी दुनिया को क्षत-विक्षत कर देती है । जब वह कुछ सम्हलती है तो पाती है कि अब न उसके पास कोई भूतकाल बचा है, न आगे कहीं भविष्य ही दिखाई देता है । पेसी अंकल, आया मेरी, इब्राहीम पाँववाला, सभी का साथ छूट जाता है । माँ को वह स्वयं अलग करती है । फिर एक दौर आता है जिसमें जिद और हिम्मत के बल पर वह नियति द्वारा, अपने हिस्से में बीटी गई, इस असमान बाजी में, बाहरी पहलू पर तो विजय हासिल कर लेती है, पर अतिरिक पहलू पर, प्राप्त अनुभव को ही लक्ष्य मानकर उसे अंतत: समझौता करने के लिए विवश होना पड़ता है ।

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    Hemangini A. Ranade

    जन्म: गुजरात के एक मुस्लिम परिवार में। शिक्षा-दीक्षा मुंबई तथा इंदौर में। आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक। संगीतज्ञ डॉ. अशोक दा. रानडे से सन् 1967 में विवाह। कॉलेज जीवन से ही आकाशवाणी से संलग्न। पहले इंदौर, तत्पश्चात् आकाशवाणी मुंबई में। आकाशवाणी में नाट्य-स्वर के रूप में कार्य। महिलाओं तथा बालकों के हिंदी कार्यक्रमों का संचालन तथा प्रस्तुतिकरण।

    हिंदी, गुजराती, अंग्रेज़ी कार्यक्रमों में सहयोग। कई रेडियो-नाटकों का निर्देशन, लेखन और प्रस्तुतिकरण एवं उनमें अभिनय। कई नाटकों, वार्ताओं, कथाओं, रूपकों आदि का लेखन तथा अन्य भाषाओं की रचनाओं का हिंदी में अनुवाद। सन् 1992 में सेवानिवृत्त।

    ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, ‘नवभारत टाइम्स’ (मुंबई), ‘सबरंग’, ‘आजकल’ आदि पत्रिकाओं में कहानियों का प्रकाशन। ‘धर्मयुग’ में नारी-समस्याओं पर लेखन। ‘नवनीत समर्पण’ में गुजराती भाषा में कथा-कहानियाँ प्रकाशित। बालकों के लिए एन.बी.टी. के पाठक-मंच में कहानी- लेखन। एन.ए.बी. द्वारा ‘बोलती पुस्तकें’ में : ष्टिहीनों के लिए विभिन्न भाषाओं की नियमित वाचिका।

    पहला उपन्यास अनुभव राजकमल से सन् 1996 में प्रकाशित।

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