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Afghanistan Kal Aaj Aur Kal

Afghanistan Kal Aaj Aur Kal

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  • Pages: 202p
  • Year: 2002
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126704624
  •  
    अफगान-संकट पर दुनिया की अनेक भाषाओं में सैकड़ों पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं लेकिन यह ग्रंथ ज़रा लीक से हटकर है। यह अफगानिस्तान के वर्तमान संकट की जड़ों को खोजने के लिए उसके अतीत को खँगालता है और अतीत की व्याख्या उसके वर्तमान के संदर्भ में करता है। अफगानिस्तान के अतीत और वर्तमान इस ग्रंथ में सतत संगोष्ठी करते हुए दिखाई पड़ते हैं। यह ग्रंथ अफगानिस्तान का कोरा इतिहास नहीं है। उसके इतिहास, वर्तमान और भविष्य का दर्शन है। यह अफगानिस्तान के त्रिकाल की जीवंत और सरस व्याख्या है। हिन्दी में ही नहीं, दुनिया की किसी भी भाषा में समसामयिक अफगानिस्तान पर प्रस्तुत किया जानेवाला यह सर्वप्रथम मौलिक ग्रंथ है। इस ग्रंथ से पाठकों को पता चलेगा कि आर्यों, बौद्धों और हिन्दुओं का यह देश कभी ‘आर्याना’ कहलाता था। पाणिनी, गांधारी और गोरखनाथ का यह देश इस्लामी कैसे बना ? यह देश अब भी इस्लाम से संचालित होता है या उसके पहले से चली आ रही जातीय परम्पराओं से ? अफगानिस्तान में ऐसे कौन-से खज़ाने छिपे हुए हैं, जिन्हें पाने के लिए ब्रिटिश और रूसी साम्राज्यों ने काबुल में अपने घुटने तुड़वाए और विश्व-विजेता सिकन्दर, सम्राट अशोक तथा चंगेज खान ने हिन्दुकुश के गगनचुम्बी हिम-शिखरों को पार किया ? पिछले दो सौ वर्षों में महाशक्तियों की प्रतिस्पर्धा ने अफगानिस्तान में क्या-क्या विविध और विलक्षण रूप धारण किए और आगामी समय में उसका हश्र क्या हो सकता है, इसका विवेचन डॉ. वेदप्रताप वैदिक जैसे अधिकारी विद्वान से बेहतर कौन कर सकता है ? रूसी और फारसी भाषा के जानकार तथा कई दशकों से अफगानिस्तान की शोध-यात्राएँ करनेवाले डॉ. वैदिक ने अफगान राजवंशों की अंदरूनी खींचतान और सत्तारूढ़ गुटों की राजनीति के अनेक अनजाने पहलुओं को भी इस ग्रंथ में उजागर किया है। अफगानिस्तान आतंकवाद का अड्डा कैसे बना और उससे मुक्त कैसे हुआ, इसका चित्रोपम वर्णन तो इस ग्रंथ में है ही, भारत-पाक-अफगान संबंधों के अनेक रहस्यमय और रोचक पहलुओं पर भी प्रकाश डाला गया है। यह ग्रंथ प्रबुद्ध बुद्धिजीवियों, शोधकर्त्ताओं और नीति-निर्माताओं के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध होगा।

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    Ved Pratap Vaidik

    वेदप्रताप वैदिक

    अपने मौलिक चिन्तन, प्रखर लेखन और विलक्षण वक्तृत्व के लिए विख्यात। जन्म: 30 दिसम्बर, 1944 में इन्दौर में। सदा प्रथम श्रेणी के छात्र। फ़ारसी, रूसी और संस्कृत आदि भाषाओं के जानकार। दर्शन और राजनीतिशास्त्र मुख्य विषय। 1971 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से ‘अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’ विषय पर पी-एच.डी.। दिल्ली के मोतीलाल नेहरू कॉलेज में राजनीतिशास्त्र का अध्यापन। ‘इंडियन कौंसिल ऑफ सोशल साइंस रिसर्च’  द्वारा अफ़गानिस्तान पर शोध-कार्य के लिए वरिष्ठ शोधवृत्ति। 1981 से 1983 के बीच ‘इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस’ तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अंतर्राष्ट्रीय राजनय विभाग में ‘सीनियर फैलो’ के तौर पर शोध एवं अध्यापन। 1999 में विस्कॉन्सिन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दक्षिण एशियाई विश्व-सम्मेलन में उद्घाटन-भाषण। लगभग दस वर्षों तक पी.टी.आई. भाषा के संस्थापक-सम्पादक और उसके पहले नवभारत टाइम्स के सम्पादक (विचार) रहे।

    छात्र-काल में वक्तृत्व के अनेक अखिल भारतीय पुरस्कार। साठ से अधिक देशों की यात्राओं के साथ भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में अनेक व्याख्यान।  अनेक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर 1962 से अब तक अगणित कार्यक्रम। पिछले 40 वर्षों में राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर सैकड़ों लेख, हजारों संपादकीय टिप्पणियाँ और दर्जनों शोध-पत्र प्रकाशित।

    कृतियाँ: अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा, हिन्दी पत्रकारिता: विविध आयाम, भारतीय विदेश नीति: नये दिशा संकेत, एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका: इंडियाज़ ऑप्शन्स, हिन्दी का सम्पूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो?, भारतीय भाषाएँ लाओ, अंग्रेज़ी हटाओ, वर्तमान भारत, अफगानिस्तान: कल आज और कल।

    भारतीय भाषाओं के संघर्ष के प्रतीक। 1966 में अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का शोधग्रन्थ हिन्दी में लिखने का आग्रह। स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज से इसी कारण निष्कासन। संसद में दो वर्ष तक अपूर्व हंगामा। राष्ट्रीय विवाद। अन्ततः विजय। पहली बार उच्च शोध के लिए भारतीय भाषाओं के द्वार खुले।

    अनेक सम्मानों से विभूषित। एकाधिक प्रतिष्ठित संस्थाओं में सक्रिय योगदान।

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