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Aaj Aur Aaj Se Pahale

Aaj Aur Aaj Se Pahale

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  • Pages: 272p
  • Year: 2015, 3rd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8171788424
  • ISBN 13: 9788171788422
  •  
    अगर यह संचयन ' साहित्य के प्रति निष्ठा से समर्पित एक रचनाकार की सोच-समझ का छोटा-सा किन्तु प्रमाणिक जीवन भर होता तो मूल्यवान होते हुए भी वह गहरी विचारोत्तेजना का वैसा स्पंदित दस्तावेज न होता जैसा कि वह है ! कुंवर नारायण आधुनिक दौरे के कवि-आलोचकों की उस परंपरा के हैं जिसमे अज्ञेय और मुक्तिबोध, विजयदेव नारायण साही और मलयज आदि रहे हैं और जिसे पिछली अधसदी में हिंदी की केंद्रीय आलोचना कहा जा सकता है ! अपने समय और समाज को, अपने साहित्य और समकालीनों को, अपनी उलझनों-सरोकारों और संघर्ष को समझने-बूझने और उन्हें मूल्यांकित करने के लिए नए प्रत्यय, नई अवधारणाए और नए औजार इसी आलोचना ने खोजे और विन्यस्त किए हैं ! कुंवर नारायण का वैचारिक खुलापन और तीक्ष्णता, सुरुचि और सजगता तथा बौद्धिक अध्यवसाय उन्हें एक निरीक्षक और विवेचक की तरह 'अपने समय और समाज पर चौकन्नी नजर' रखने में सक्षम बनाते हैं ! यह संचयन कुंवर नारायण का हिंदी परिदृश्य पर पिछले चार दशकों से सक्रिय बने रहने का साक्ष्य ही नहीं, उनकी दृष्टि की उदारता, उनकी रुचि की पारदर्शिता और उनके व्यापक फलक का भी प्रमाण है ! प्रेमचंद, यशपाल, भगवतीचरण वर्मा, हजारीप्रसाद द्विवेदी से लेकर अज्ञेय, शमशेर, नेमिचंद्र जैन, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, निर्मल वर्मा, श्रीकांत वर्मा, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, श्रीलाल शुक्ल, अशोक वाजपेयी तक उनके दृष्टिपथ में आते हैं और उनमे से हरेक के बारे में उनके पास कुछ-न-कुछ गंभीर और सार्थक कहने को रहा हैं! इसी तरह कविता, उपन्यास, कहानी, आलोचना, भाषा आदि सभी पर उनकी नजर जाती रही है ! जो लोग साहित्य और हिंदी के आज और आज के पहले को समझना और अपनी समझ को एक बृहत्तर प्रसंग में देखना-रखना चाहते हैं उनके लिए यह एक जरूरी किताब है ! कुवर नारायण में समझ का धीरज है, अपना फैसला आयद करने की उतावली नहीं है और ब्योरों को समझने में एक कृतिकार का अचूक अनुशासन है ! हिंदी आलोचना आज जिन थोड़े से लोगों से अपना आत्मविश्वास और विचार-उर्जा साधिकार पाती है ! उनमे निश्चय ही कुंवर नारायण एक है ! यह बात अचरज की है कि यह कुंवर नारायण की पहली आलोचना-पुस्तक है ! बिना किसी पुस्तक के दशकों तक अपनी आलोचनात्मक उपस्थिति अगर कुंवर नारायण बनाए रख सके है तो इसलिए कि उनका आलोचनात्मक लेखन लगातार धारदार और जिम्मेदार रहा है !

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    Kunwar Narain

    कुँवर नारायण

    आज के साहित्यिक परिदृश्य को दूर तक प्रभावित करनेवाले हिन्दी के शिखर कवि।

    जन्म: 1927। आधी सदी से अधिक समय से लेखन में सक्रिय हैं। कविता के साथ ही लगातार विभिन्न साहित्यिक, वैचारिक और सांस्कृतिक विषयों पर भी महत्त्वपूर्ण लेखन कर रहे हैं। कई पत्रिकाओं के सम्पादन और विभिन्न सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। उनकी अनेक कृतियों के भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हो रहे हैं।

    प्रकाशित पुस्तकें - काव्य संग्रह: चक्रव्यूह, परिवेश: हम-तुम, तीसरा सप्तक, अपने सामने, कोई दूसरा नहीं, इन दिनों, हाशिए का गवाह; खंडकाव्य: आत्मजयी और वाजश्रवा के बहाने; कहानी संग्रह: आकारों के आसपास; समीक्षा: आज और आज से पहले, मेरे साक्षात्कार, साहित्य के अन्तर्विषयक सन्दर्भ; साक्षात्कार: तट पर हूँ पर तटस्थ नहीं; संचयन: कुँवर नारायण: संसार, कुँवर नारायण: उपस्थिति, चुनी हुई कविताएँ, प्रतिनिधि कविताएँ, नो अदर वर्ल्ड: अंग्रेज़ी अनुवाद और संचयन: अपूर्व नारायण।

    अनेक पुरस्कारों से सम्मानित जिनमें साहित्य अकादमी पुरस्कार, प्रेमचन्द पुरस्कार, शलाका सम्मान, राष्ट्रीय कबीर सम्मान, रोम का अन्तर्राष्ट्रीय ‘प्रीमिओ प़$ेरोनिआ’ पुरस्कार और भारत का सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार हैं। राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मभूषण’ से अलंकृत। साहित्य अकादमी की महत्तर सदस्यता (2010)।

    आरम्भिक जीवन फ़ैज़ाबाद और अयोध्या में बीता, उसके बाद अधिक समय लखनऊ में रहे। आजकल दिल्ली में पत्नी भारती और पुत्र अपूर्व के साथ रहते हैं।

    सम्पर्क: एच-1544, चितरंजन पार्क, नई दिल्ली-19

    फोन: (011) 26272508

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