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Aadhunik Sahitya : Mulya Aur Mulyankan

Aadhunik Sahitya : Mulya Aur Mulyankan

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Special Price Rs. 225

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  • Pages: 143p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126708336
  • ISBN 13: 9788126708338
  •  
    रचना और आलोचना की सतत विकासमान प्रक्रिया युग-सापेक्ष सही मूल्यों का निर्धारण करती है तथा उन सार्थक प्रतिमानों का निर्माण करती चलती है जो साहित्य के मूल्यांकन को दिशा और गति देते हैं । इस दृष्टि से देखें तो डी. निर्मला जैन की यह पुस्तक अपना विशेष महत्त्व रखती है । इसमें 'मूल्य' और 'मूल्यांकन' के ही बिन्दुओं पर आधुनिक-साहित्य की रचनात्मकता और आलोचनात्मकता के प्रश्नों को बारीकी और संजीदगी से उठाया गया है । आधुनिक साहित्य .. मूल्य और मूल्याकंन आलोचनात्मक निबन्धों का एक सुनियोजित उपयोगी संकलन है । समय-समय पर लिखे गए अपने इन निबन्धों में डी. जैन ने बहुत ही धारदार शैली में साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों और समस्याओं का वैचारिक विश्लेषण किया है । अनेक ऐसे मुद्‌दों को उन्होंने यहाँ नए आयाम दिए हैं जो बहसों के दौरान आए दिन बार-बार सामने आते रहे हैं । साथ ही, कविता और कथा के क्षेत्रों में अब तक की विशिष्ट उपलब्धियों को भी उन्होंने नए कोणों से देखा-परखा और रेखांकित किया है । संक्षेप में, यह पुस्तक रचना और आलोचना की सही पहचान कराने में सक्षम है ।

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    Dr. Nirmala Jain

    हिन्दी की जानी-मानी आलोचक निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बिरजू महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. और डी.लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

    लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-96) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमंत्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफेसर रहीं।

    अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किए। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है। अपने जीवन और समय का जायज़ा उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ में लिया है।

    निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम हैं जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना-दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष-प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनाई है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

    खास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

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