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Aadhunik Bhartiya Chintan

Aadhunik Bhartiya Chintan

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  • Pages: 342p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788171786084
  •  
    आधुनिक भारतीय चिंतन पर हिंदी ही नहीं, अन्य भारतीय भाषाओं में भी स्तरीय पुस्तकों का अभाव हे । अंग्रेजी समेत अन्य विदेशी भाषाओं में उपलब्ध पुस्तकें प्रशंसा या निंदा के अतिवाद का शिकार हैं । साथ ही उनमें भारतीय चिंतन के नाम पर प्राचीन भारतीय दर्शन का विश्लेषण-विवेचन है । डी. विश्वनाथ नरवणे की प्रस्तुत पुस्तक आधुनिक भारतीय चिंतन उपर्युक्त अतिवादों से मुक्त है । किसी देशी-विदेशी चश्मे से अपने को मुक्त रखते हुए भारतीय चिंतन के आधुनिक पहलुओं पर विचार करते हैं । इसमें प्रामाणिकता बनाए रखने की पूरी कोशिश है । वहीं समकालीन भारत में हो रहे परिवर्तनों को भी ध्यान में रखा गया है । प्राचीन काल में भारत चिंतन के मामले में अग्रणी था । लेकिन अब ऐसी स्थिति नहीं है । फिर भी पिछली दो शताब्दियों में चिंतन-क्षेत्र में कुछ न कुछ चमक रही हे 1 फिर भी उसके सम्यक् विवेचन-विश्लेषण वाली गंभीर कृति नहीं दीखती 1 डी. नरवणे इसी अभाव को भरते हैं । इस पुस्तक में भारतीय चिंतन में नवयुग की शुरुआत करनेवाले राजा राममोहन राय, जिन्होंने पाश्चात्य चिंतन को आत्मसात् करते हुए भारतीय चिंतन-परंपरा पर मनन किया, के योगदान और मूल्यांकन का सार्थक प्रयास है । रामकृष्ण परमहंस द्वारा मानवीय दृष्टि अपनाने पर वल दिया गया । विवेकानंद के तेजस्वी चिंतन, जिसमें धर्म के ऊपर समाज और सत्ता के ऊपर मनुष्य को स्थान देने की पुरअसर कोशिश है, का भी विस्तृत मूल्यांकन पुस्तक में है । चिंतन और कर्म की एकता पर बल देनेवाले चिंतन को रवीन्द्रनाथ ठाकुर और महर्षि अरविंद ने नये आयाम दिए तो गांधी का दर्शन निकला ही कर्म से । महात्मा के दर्शन ने समकालीन दुनिया को प्रभावित किया । सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने भारतीय दर्शन परंपरा को और माँजने का प्रयास किया । इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए डी. नरवणे कुमारस्वामी और इकबाल की चिंताधारा तक आते हैं । डी. नरवणे की पद्धति सिर्फ चिंतनपरक लेखन या कथन के विश्लेषण तक सीमित नहीं रहती । पिछले डेढ़ सौ वर्षों में भारतीय मानस को प्रभावित करनेवाले चिंतकों की जीवनियों, उनके साहसपूर्ण संघर्षों और दुर्गम यात्राओं के विवरण तक का उपयोग स्रोत सामग्री के रूप में किया गया है । महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, रामकृष्ण और विवेकानंद जैसे चिंतक पाश्चात्य चिंतनधारा के समक्ष हीनभाव से नतमस्तक नहीं होते । वे अपने विश्वासों, आस्थाओं, भावनाओं या अविश्वास के लिए लज्जित नहीं होते । वहीं उनमें पाश्चात्य दर्शन के प्रति उपेक्षा भाव भी नहीं है । भारतीय चिंताधारा में इतिहास ही नहीं, भूगोल विशेषकर हिमालय, समुद्र, और सदानीरा नदियों के योगदान का पता भी इस पुस्तक से चलता है । कला और संगीत पर कम, पर साहित्य-चिंतन पर अनेक उच्चस्तरीय कृतियाँ हैं पर उन आधुनिक चिंता- धाराओं के अध्ययन का सार्थक प्रयास नहीं दीखता जिनके ऊपर हमारी सांस्कृतिक प्रगति टिकी हुई है । यह शायद इसलिए कि चिंतन का विवेचन करना अत्यंत कठिन काम है । इस चुनौती का बरण डी. नरवणे ने किया है । वे आधुनिक भार्‌तीय चिंतन की बारीकियों और गुत्थियों को सुलझाने में कामयाब हुए हैं । इस पुस्तक को न केवल भारतीय बौद्धिकों बल्कि दुनिया भर के विद्वानों की सराहना मिली है । अरसे से अनुपलब्ध इस बहुचर्चित पुस्तक के प्रकाशन का अपना विशेष महत्त्व है ।

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    Vishwanath Narvane

    VishwanathNarvane

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      • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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