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Aacharya Ramchandra Shukla : Aalochana Ke Naye Mandand

Aacharya Ramchandra Shukla : Aalochana Ke Naye Mandand

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Special Price Rs. 270

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  • Pages: 215p
  • Year: 2003
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 10: 8126707992
  • ISBN 13: 9788126707997
  •  
    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के पहले हिन्दी आलोचना का कोई व्यवस्थित ढाँचा तैयार नहीं हुआ था। कृति के गुण- दोष-दर्शन में दोष ढूँढ़ने का प्रचलन अधिक था। दोष- दर्शन में भी भाषागत त्राुटियों को ज्यादा महत्त्व दिया जाता था। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आलोचना के ऐतिहासिक और समाजशास्त्राीय स्वरूप की प्रस्तुति की और ‘लोक के भीतर ही कविता क्या किसी भी कला का प्रयोजन और विकास होता है’µके सिद्धान्त का निरूपण किया। उन्होंने आलोचना को व्यवस्थित रूप देने के लिए कुछ निश्चित मापदंड स्थापित किए। यह पुस्तक आचार्य शुक्ल के जीवन, आलोचक के रूप में उनके विकास और उनकी दृष्टि का एक सम्पूर्ण खाका खींचने की कोशिश करती है। उनके प्रामाणिक जीवन- वृत्त, के साथ बीसवीं शताब्दी का काव्यात्मक आन्दोलन (कविता क्या है ?); आचार्य रामचन्द्र शुक्ल; वैचारिक निबन्धों के प्रथम आचार्य; आचार्य रामचन्द्र शुक्ल की आलोचना दृष्टि और उनकी साहित्येतिहास दृष्टिµइन पाँच अध्यायों में विभक्त यह पुस्तक आचार्य शुक्ल को समझने और पढ़ने के नए द्वार खोलती है। इसके अलावा डॉ. पांडेय ने गहन शोध के बाद इस पुस्तक में आचार्य शुक्ल से सम्बन्धित अभी तक अनुपलब्ध कई महत्त्वपूर्ण सूचनाएँ भी जुटाई हैं।

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    Bhavdeo Pandey

    पूर्व हिन्दी प्राध्यापक, के.बी.पी.जी. कॉलेज, मिरजापुर, उत्तर प्रदेश।

    जन्म: वैशाख पूर्णिमा संवत् 1981 (सन् 1924) ग्राम भरामा, जिला गोरखपुर

    शिक्षा: एम.ए. (हिन्दी) पी-एच.डी.

    प्रकाशित पुस्तकें

    अन्धेर नगरी - समीक्षा की नई : द्ष्टि (1995); अंधा युग: अधुनातन समीक्षा : ष्टि (1995); भारतेन्दु हरिश्चन्द्र -  नये परि: श्य (1997); बंग-महिला - नारी मुक्ति का संघर्ष (1999); पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ (2001)।

    विशेष

    सम्मान - विद्या वाचस्पति ‘हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग’, 1996

    पुरस्कार - सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ नामित उ.प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ, 1997

    हिन्दी की लगभग सभी साहित्यिक पत्रिकाओं में आलोचना,  लेख,  संस्मरण,  इंटरव्यू  आदि  निरन्तर प्रकाशित। दूरदर्शन और आकाशवाणी से वार्ता, रेडियो रूपक, कविता आदि प्रसारित।

     

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