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Zamane Mein Hum

Zamane Mein Hum

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  • Pages: 358
  • Year: 2015, 1st Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126727780
  •  
    सुपरिचित आलोचक निर्मला जैन ने 'दिल्ली : शहर दर शहर' जैसे सूपठ संस्मरणात्मक कृति से यह स्पष्ट संकेत दे दिया था कि न तो उनका जीवन एकरेखीय है, न उनकी भाषा और रचनात्मकता का मिजाज केवल आलोचनात्मक है ! 'ज़माने में हम' नामक उनकी यह आत्मकथात्मक कृति उन सकेतो को सच साबित करती है ! 'ज़माने में हम' को निर्मला जी ने आत्मवृत्त कहा है ! उन्होंने आठ दशक पीछे छूट गई जिंदगी को पलटकर यों देखा है कि निजी यादें न केवल उनके रचनात्मक जीवन के इतिहास की निर्मिति का तत्व बन गई हैं, बल्कि हिंदी के लोकवृत्त के निर्माण में भी सहायक साबित होनेवाली हैं ! हालाँकि यह उनके लिए जोखिम-भरा कार्य ही रहा होगा ! क्योंकि उनके जीवन में अनेक रेखाएं एक-दूसरे के सामानांतर-परस्पर टकराती, एक-दूसरे को काटती, उलझती-सुलझती हुई हैं ! उनकी संशिलष्ट बुनावट को तरतीबवार दर्ज करना निःसंदेह दुरूह रहा होगा ! शायद इसीलिए वे अपनी आत्मकथा को 'आधे-अधूरे सत्य से ज्यादा कुछ' होने का दावा नहीं करती ! उनके मुताबिक यह स्थितियों और घटनाओ के पारावार का उनका अपना पाठ है ! वे खुले मन से मानती हैं कि "...जो व्यक्ति उनमें साझीदार रहे हैं, जिन्होंने बराबर से मित्र या शत्रु या तटस्थ भाव से उनमें साझीदारी की है, सत्य का दूसरा सिरा तो उनके हाथ में है !" और यह इस आत्मकथा की बहुत बड़ी विशेषता है कि इसमें लेखिका स्वयं को बिलकुल निष्कवच भाव से प्रस्तुत करती हैं ! स्तब्धकारी साफगोई से लबरेज इस कृति में ऐसी लोकतांत्रिकता इस बात का सुबूत है कि इसमें जीवन-सत्य का उद्घाटन ही मूल उद्देश्य है ! दरअसल जीवट और उम्मीद के अंतर्गुमिफ्त सत्य से संचालित जीवन की यह अविस्मरणीय कथा जीवन की रणनीति का पाठ भी है ! मनुष्य की अपराजेयता में विश्वास जगानेवाली एक प्रेरक कृति है ज़माने में हम !

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    Dr. Nirmala Jain

    हिन्दी की जानी-मानी आलोचक निर्मला जैन का जन्म सन् 1932 में दिल्ली के व्यापारी परिवार में हुआ। बचपन में ही पिता की मृत्यु हो जाने के कारण आरम्भिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा। इसके बावजूद उन्होंने दिल्ली में ही शिक्षा पूरी की और वर्षों कत्थक गुरु अच्छन महाराज (बिरजू महाराज के पिता) से नृत्य की शिक्षा प्राप्त की। विवाह से पहले बी.ए. तक और विवाह के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय से ही उन्होंने एम.ए., पी-एच.डी. और डी.लिट् की उपाधियाँ प्राप्त कीं।

    लेडी श्रीराम कॉलेज (1956-70) और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग (1970-96) में अध्यापन करके सेवानिवृत्त होने के बाद भी, वे विशेष आमंत्रित रूप से दस वर्ष तक अध्यापन करती रहीं। इस दौरान वे हिन्दी विभाग की अध्यक्ष (1981-84) और अनेक वर्ष तक दक्षिण-परिसर में विभाग की प्रभारी प्रोफेसर रहीं।

    अध्यापन के दौरान उन्होंने बड़ी संख्या में शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। साथ ही अनेक महत्त्वपूर्ण आलोचना कृतियों की रचना की और प्रसिद्ध कृतियों के अनुवाद किए। महादेवी और जैनेन्द्र की रचनावलियों के अतिरिक्त कई पुस्तकों का संचयन और सम्पादन भी किया। इन मौलिक, अनूदित और सम्पादित रचनाओं की संख्या तीस से अधिक है। अपने जीवन और समय का जायज़ा उन्होंने अपनी आत्मकथा ‘ज़माने में हम’ में लिया है।

    निर्मला जैन एक ऐसा सुपरिचित नाम हैं जिन्होंने अपनी वस्तुनिष्ठ आलोचना-दृष्टि और बेबाक अभिव्यक्ति से हिन्दी के पुरुष-प्रधान आलोचना-परिदृश्य में उल्लेखनीय जगह बनाई है। उनके अनेक शिष्य महत्त्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

    खास बात यह है कि आज भी वे पूरी लगन और निष्ठा से अध्ययन और रचना-कर्म में संलग्न हैं और साहित्यिक गतिविधियों में सक्रिय योगदान दे रही हैं।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna
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