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Upanivesh Mein Stree

Upanivesh Mein Stree

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  • Pages: 231p
  • Year: 2014, 4th Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126706815
  •  
    यह किताब जीवन के दो पक्षों के बारे में है ! एक स्त्री का और दूसरा अपनिवेश का ! न इस उपनिवेश को समझना आसान है और न स्त्री नो ! अगर यह उपनिवेश वही होता जिससे बीसवीं सदी के मध्य में कई देशों और सभ्यताओं ने मुक्ति पाई थी तो शायद हम इसे राजनितिक और आर्थिक परतंत्रता की संरचना करार दे सकते थे ! अगर यह उपनिवेश वही होता जिससे लड़ने के लिए राष्ट्रवादी क्रांतिय की गई थी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की अवधारणा पेश की गई थी तो शायद हम इसके खिलाफ उपनिवेशवाद विरोधी प्रत्यय की रचना आसानी से कर सकते थे ! यह नवुप्निवेश के नाम से परिभाषित हो चुकी अन्तराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी की अप्रत्यक्ष हुकूमत भी नहीं है ! यह तो अन्तराष्ट्रीय वित्तीय पूँजी, पितृसत्ता, इतरलिंगी यौन चुनाव और पुरुष-वर्चस्व की ज्ञानमीमांसा का उपनिवेश है जिसकी सीमाएँ मनोजगत से व्यवहार-जगत तक और राजसत्ता से परिवार तक फैली हैं ! दूसरे पक्ष में होते हुए भी स्त्री पाले के दूसरी तरफ नहीं है ! वह उपनिवेश के बीच में कड़ी है ! उपनिवेश के खिलाफ संगर्ष उसका आत्म-संघर्ष भी है और यही स्थिति स्त्री को समझने की मुश्कलों के कारण बनी हुई है ! स्त्री मुक्ति-कामना से छटपटा रही है लेकिन उपनिवेश के वर्चस्व से उसका मनोजगत आज भी आक्रांत है ! गुजरे जमानों के उपनिवेशवाद विरोधी संघर्षों की तरह औरत की दुनिया के सिपहसालार उपनिवेश के साथ हाथ भर का वह अन्तराल स्थापित नहीं कर पाए हैं जो इस लड़ाई में कामयाबी की पहली शर्त है ! ‘उपनिवेश में स्त्री : मुक्ति-कामना की दस वार्ताएं’ इस अन्तराल की स्थापना की दिशा में किया गया प्रयास है ! ये वार्ताएं कारखाने और दफ्तर में काम करती हुई स्त्री, लिखती-रचती हुई स्त्री, प्रेम के द्वन्द में उलझी हुई स्त्री, मानवीय गरिमा की खोज में जुटी हुई स्त्री, बौद्धिक बनती हुई स्त्री और भाषा व् विमर्श के संजाल में फंसी हुई स्त्री से सम्बंधित हैं !

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    Prabha Khetan

    प्रभा खेतान
    जन्म : 1 नवम्बर, 1942
    शिक्षा : एम–ए– पी–एच–डी– (दर्शनशास्त्र)
    प्रकाशित कृतियाँ
    उपन्यास : आओ पेपे घर चलें !, छिन्नमस्ता, पीली आँधी, अग्निसंभवा, तालाबंदी, अपने–अपने चेहरे ।
    कविता : अपरिचित उजाले, सीढ़ियाँ चढ़ती हुई मैं, एक और आकाश की खोज में, कृष्ण धर्मा मैं, हुस्न बानो और अन्य कविताएँ, अहल्या ।
    चिंतन : उपनिवेश में स्त्री सार्त्र का अस्तित्ववाद, शब्दों का मसीहा : सार्त्र, अल्बेयर कामू : वह पहला आदमी ।
    अनुवाद : साँकलों में कैद कुछ क्षितिज (कुछ दक्षिण अफ्रीकी कविताएँ), स्त्री : उपेक्षिता (सीमोन द बोउवार की विश्व–प्रसिद्ध कृति ‘द सेकंड सेक्स’) ।
    संपादन : एक और पहचान, ‘हंस’ का स्त्री विशेषांक भूमंडलीकरण : पितृसत्ता के नये रूप ।
    निधन : 20 सितम्बर, 2008 ।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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