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यात्रा-वृत्तान्त | Travelogue

Showing 10 books of 21 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Aazadi Mera Brand

    Aazadi Mera Brand

    Regular Price: Rs. 450

    Special Price Rs. 338

    25%

    जितनी बड़ी दुनिया बाहर है, उतनी ही बड़ी एक दुनिया हमारे अन्दर भी है, अपने ऋषियों मुनियों की कहानियां सुनकर लगता है कि वे सिर्फ भीतर ही चले होंगे ! यह किताब इन दोनों दुनियाओं को जोड़ती हुई चलती है ! यह महसूस कराते हुए कि भीतर की मंजिलों को हम बाहर चलते हुए भी छू सकते हैं, बशतें अपने आप को लादकर न चले हों ! उतना ही एकांत साथ लेकर निकले हों जितना एकांत ऋषि अपने भीतर की यात्रा पर लेकर निकला होगा ! अनुराधा बेनीवाल की इस एकाकी यात्रा में आप ज्ञान से भारी नहीं होते, सफ़र से हलके होते हैं ! न उसने कहीं ज्ञान जुटाने की ज्यादा कोशिश की, और न पाठक को वह थाती साँपकर अमर होने की ! इसीलिए शायद यह पुस्तक यात्रा-वृतांत नहीं, खुद एक यात्रा हो गई है ! एक सामाजिक, संस्कृतिक यात्रा, और एक प्रश्न-यात्रा जो शुरू हो इस सवाल से होती है कि आखिर कोई भारतीय लड़की ‘अच्छी भारतीय लड़की’ के खांचों-सांचों की पवित्र कुंठाओं के जाल को क्यों नहीं तोड़ सकती ? सुदूर बाहर की इस यात्रा में वह भीतर के कई दुर्लभ पड़ावों से गुजरती है, और अपनी संस्कृति, समाज और आध्यात्मिकता को लेकर कुछ इस अंदाज में प्रश्नवाचक होती है कि अपनी हिप्पोक्रेसियों को देखना हमारे लिए यकायक आसान हो जाता है ! जिंदगी के अनेक खुशनुमा चेहरे इस सफ़र में अनुराधा ने पकडे हैं ! और उत्सव की तरह जिया है ! इनमे सबसे बड़ा उत्सव है निजता का ! निजी स्पेस के सम्मान का जो उसे भारत में नहीं दिखा ! अपने मन का कुछ कर सकने लायक थोड़ी-सी खुली जगह, जो इतने बड़े इस देश में कहीं उपलब्ध नहीं है ! औरतों के लिए तो बिलकुल नहीं !
  2. Ghat Ghat Ka Pani

    Ghat Ghat Ka Pani

    Regular Price: Rs. 350

    Special Price Rs. 263

    25%

    घाट-घाट का पानी कहते है कि यात्राएँ हमें पुनर्जीवन देती हैं ! शहरों में बसने और वहां की दैनिक आवाजाही में अनेक लोगों को पता ही नहीं चल पाटा कि जीवन कब बीत गया और कितनी बड़ी धरती उनकी कल्पना से भी अछूती रह गई ! वे सौभाग्यवान होते हैं जिन्हें जीवन अवसर भी देता है और हौसला भी कि वे रोजमर्रा की चक्की को रोककर बीच-बीच में कभी प्रकृति के विशाल वैभव से एकाकार हो जाएँ और कभी सुदूर नगरों में ही अपने ही जैसे लेकिन भिन्न ढंग से जीते-मरते लोगों से अपने सुख-दुख बाँट आएँ ! इस पुस्तक के लेखक उन्हीं सौभाग्यवान और हौसलामन्द लोगों में हैं ! घूमने का संस्कार उन्हें बचपन में ही मिल गया था जिसका निर्वाह वे अब तक कर रहे हैं ! देश के लगभग हर हिस्से में हो आए हैं ! यह पुस्तक उनकी उन्हीं यात्राओं का लेखा-जोखा है ! अपनी सहज और अनुभवों से पकी भाषा में यहाँ वे अपने शुद्ध यात्री-रूप में उपस्थित हैं ! उनकी इस यात्राओं को पढ़ते हुए उन लोगों को बी अपनी पहुँच से बाहर पड़ी उस विशाल प्रकृति, उस विराट जीवन का अनुभव होगा जो अब तक बस सोचते रहे हैं कि यार, कहीं घूम आया जाए ! इस पुस्तक को पढ़कर वे अपने इरादों को और स्थगित नहीं कर पाएँगे !
  3. Aazadi Mera Brand

    Aazadi Mera Brand

    Regular Price: Rs. 199

    Special Price Rs. 149

    25%

    "लोग कहते हैं कि बचपन के दिन सबसे ख़ास होते हैं, कोई टीन-एज खास बताता है तो कोई ट्वेंटीज़! मुझे तो ये वाली उम्र सबसे खास लगती है, जिसमे मैं हूँ। तीस को टच करती, सहज-सी, छुपी-सी, आसान-सी उम्र। हार्मोन्स रह-रह के उबाल नहीं मारते, नए-नए क्रश रात-रात भर नहीं जगाते, ब्रेक-अप्स रात-रात भर नहीं रुलाते। कहने को आप बोरिंग कह सकते हैं, लेकिन मुझे बहुत खास लगती है यह उम्र। किताब पढ़ते हैं तो बस पढ़ते ही जाते हैं, बिना कोई मिस्ड कॉल या बैकग्राउंड में किसी की याद लिए। अपना पैसा थोड़ा कमा लिया है, तो पूरी आज़ादी लगती हैं— घूमने की, पहनने की, बोलने की, फ़िरने की।" -अनुराधा बेनीवाल
  4. Are Yayavar Rahega Yaad?

    Are Yayavar Rahega Yaad?

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    कोई भी यात्रा मात्र व्यक्ति की यात्रा नहीं होती ! अगर वह जिस रस्ते पर चल रहा है वह रास्ता भी यात्रा में शामिल है तो-और रस्ते शामिल हैं तो क्या कुछ नहीं शामिल ! ‘अरे यायावर रहेगा याद’ अज्ञेय का एक ऐसा ही यात्रा-संस्मारत है जिसमें रस्ते शामिल हैं ! इसलिए यह पुस्तक अपने काल के भीतर और बहार एक प्रक्रिया, एक विचार और एक विमर्श भी है ! बगैर उद्घोष की यात्रा प्रकृति और भूगोल से गुजरती हुई संस्कृति, समाज और सभ्यता से भी गुजर रही होती है ! अज्ञेय की यह पुस्तक इस मायने में एक कालातीत मिसाल लगती है कि इसके बहाने द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर पुरे हिंदुस्तान की आजादी तक का वह भूगोल और कालखंड सामने आते हैं जहाँ जितने अधिक सपने थे उतने ही यातनाओं के मंजर भिया ! यह पुस्तक एक व्यक्ति के विपरीत नहीं, बल्कि समक्ष एक नागरिक और उसके एक मनुष्य होने की भी यात्रा-पुस्तक है ! अज्ञेय अपने यात्रा में लाहोर, कश्मीर, पंजाब, औरंगाबाद, बंगाल, असं आदि प्रदेशों की प्रकृति और भूमि से गुजरते हुए अपनी कथात्मक शैली और भाषा की ताजगी से सिर्फ सौंदर्य को ही नहीं रचते बल्कि सदियों हम जिनके गुलाम रहे उनके इतिहास के पन्ने भी पलटते हैं ! वैज्ञानिकता और आधुनिकता के परिप्रेक्ष्य में उनके विकास, विस्तार और विध्वंस के गणित को हल करने का द्वन्द और अकथ उद्यम इस पुस्तक को वायरल कृति बनाते हैं ! पुस्तक में एलुर, अलिफंता, कन्याकुमारी, हिमालय आदि की यात्रा करते मिथकों, प्रतीकों और मूर्तियों की राचन को अपने यथार्थ और यथार्थ के केंद्र में देखा-परखा गया हैं जहाँ लेखक को पुराणों और इतिहास की वह सच्चाई नजर आती है जो युगों तक गाढे रंगों के पीछे रही ! अनदेखे और अछूते को यात्रा की अभिव्यक्ति और उसकी कला में मूर्त करना कोई सीखे तो अज्ञेय से सीखे ! अज्ञेय की यह दृष्टि ही थी कि यात्रा, भ्रमण के बजाय एक ऐसी घटना बन सकी जिसकी क्रिया-प्रतिक्रिया में अपना कुछ अगर खो जाता है तो बहुत कुछ मिल भी जाता है ! अपना बहुत कुछ खोने, पाने और सृजन करने का नाम है-‘अरे यायावर रहेगा याद ?’ !

    Out of stock

  5. Lahor Se Lucknow Tak

    Lahor Se Lucknow Tak

    Regular Price: Rs. 225

    Special Price Rs. 169

    25%

    "लखनऊ से लाहौर तक" में श्रीमती प्रकाशवती पाल ने ऐसी अनेक ऐतिहासिक घटनाओं और व्यक्तियों के संस्मरण प्रस्तुत किये है जिनसे उनका प्रत्यक्ष और सीधा संपर्क रहा है ! संस्करण क्रम-बद्ध रूप में 1929 से शुरू होते हैं ! उस वर्ष सरदार भगत सिंह ने देहली एसेम्बली में बम फैंका था ! लाहौर कांग्रेस में आजादी का प्रस्ताव भी उसी वर्ष पास हुआ था ! क्रांतिकारी आन्दोलन में प्रकाशवती ही किशोरावस्था ही में शामिल हो गयीं थीं ! अनेक संघर्षों और खतरनाक स्थितियों के बीच में चंद्रशेखर आजाद, भगवतीचरण, यशपाल आदि क्रांतिकारियों के निकट संपर्क में आयीं ! एक अभूतपूर्व घटना के रूप में 1936 में उनका विवाह बंदी यशपाल से जेल के भीतर समपन्न हुआ ! इन और ऐसी अनेक स्मृतियों को समेटते हुए ये संस्मरण आजादी की लड़ाई और बाद के अनेक अनुभवों को ताजा करते हैं, साथ ही अनेक राजनीतिज्ञों, क्रांतिकारियों और प्रसिद्ध साहित्यकारों के जीवन पर सर्वथा नया प्रकाश डालते हैं ! यह पुस्तक पिछले पैसठ वर्ष के दौरान राजनीति और साहित्य के कई अल्पविदित पक्षों का आधिकारिक, अत्यंत महत्त्पूर्ण और पठनीय दस्तावेज हैं !
  6. Mahatirth Ke Antim Yatri

    Mahatirth Ke Antim Yatri

    Regular Price: Rs. 375

    Special Price Rs. 281

    25%

    सन 1956 में तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिए लगभग बंद हो चूका था और राजनैतिक कारणों से भारत के साथ तिब्बत का संपर्क भी लगभग टूट चूका था ! उन्ही दिनों, बिना किसी तैयारी के, बिमल दे घर से भगा और नेपाली तीर्थयात्रियों के एक दल में सम्मिलित हो ल्हासा तक जा पहुंचा ! उस समय उनकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष थी ! यात्रियों में वह नवीन मौनी बाबा ! ल्हासा में उसने तीर्थयात्रियों का दल छोड़ा, और वहां से अकेले ही कैलास खंड की ओर कुंच कर गया ! 'महातीर्थ के अन्तिम यात्री' में उसी रोमांचक यात्रानुभाव का वर्णन है ! बिमल दे ने स्वयं इसे एक भिखमंगे की डायरी कहा है ! कितु इस पुस्तक में मिलगा तिब्बत का दैनन्दिन जीवन तथा महातीर्थ का पूर्ण विवरण !
  7. Main Hun Kolkata Ka Foreign Return Bhikhari

    Main Hun Kolkata Ka Foreign Return Bhikhari

    Regular Price: Rs. 400

    Special Price Rs. 300

    25%

    होश सँभालते ही खुद को सियालदह स्टेशन परिसर में भिखारी के रूप में पाया ! किसी शरणार्थी परिवार में जन्मे उस बालक को अपने माता-पिता की याद नहीं थी, स्टेशन के बाहर पड़े ड्रेन-पाइप में वह रातें गुजारता ! उसकी दुनिया रलवे स्टेशन, ड्रेन-पाइप और आसपास की झ्ग्गी-झोपड़ियों तक सिमित थी ! उसका कोई नाम नहीं था ! राहगीरों द्वारा फेंके गये बीडी की टोटी उठाकर फूंकने की आदत के कारन लोग उसे बीडी कहकर पुकारते ! एक उस्ताद से पाकिटमारी, उठाईगीरी आदि सीखकर इस कला को आजमाने के प्रयास में वह पहले दिन ही पकड़ा गया ! उसे कुछ दिनों तक परखने के बाद अपने घरेलू नौकर के रूप में रख लिया ! वहां उसने रसोई का काम सीखा ! एक शिक्षक ने उसे पढ़ने की जिम्मेदारी ली ! दाआबू अकसर अपने काम से अमेरिका या यूरोप के दौरे पर चले जाते, तब बीडी के पास ख़ास काम ण रहता ! वह या तो कहीं जाकर भीख मांगने बैठता या किसी बांग्लादेशी के रेस्तरां में पार्ट-टाइम काम करता या पार्क में बैठकर बीडी फूंकता ! ऐसे में दाआबू ने उसे डायरी लिखने को कहा, बोले कि वह रोज के अनुभवों को अपनी भाषा में लिखना शरू करे ! हां, उसे एत्रिस नाम की एक सुंदरी अंग्रेज युवती से प्रेम भी हो गया था, जिसमें दाआबू को आपत्ति नहीं थी ! भारतीय और पाश्चात्य समाज व्यवस्था में अंतर, वहां का रहन-सहन, उन्मुक्त प्रेम, ड्रग का कहर, स्कूल ड्राप आउट्स, बेकार भत्ता, अमीरों का कुत्ता प्रेम, आवारागर्द युवा वर्ग का जीवन, शराब, सेक्स, एक्स-मॉस पर्व, बड़े क्लुबों की डिनर पार्टी....कुल मिलकर बहुत कुछ था बीडी के पास लिखने के लिए !...
  8. Mahatirth Ke Antim Yatri

    Mahatirth Ke Antim Yatri

    Regular Price: Rs. 160

    Special Price Rs. 120

    25%

    सन 1956 में तिब्बत का दरवाजा विदेशियों के लिए लगभग बंद हो चूका था और राजनैतिक कारणों से भारत के साथ तिब्बत का संपर्क भी लगभग टूट चूका था ! उन्ही दिनों, बिना किसी तैयारी के, बिमल दे घर से भगा और नेपाली तीर्थयात्रियों के एक दल में सम्मिलित हो ल्हासा तक जा पहुंचा ! उस समय उनकी उम्र मात्र पंद्रह वर्ष थी ! यात्रियों में वह नवीन मौनी बाबा ! ल्हासा में उसने तीर्थयात्रियों का दल छोड़ा, और वहां से अकेले ही कैलास खंड की ओर कुंच कर गया ! 'महातीर्थ के अन्तिम यात्री' में उसी रोमांचक यात्रानुभाव का वर्णन है ! बिमल दे ने स्वयं इसे एक भिखमंगे की डायरी कहा है ! कितु इस पुस्तक में मिलगा तिब्बत का दैनन्दिन जीवन तथा महातीर्थ का पूर्ण विवरण !

    Out of stock

  9. Yashpal Ka Yatra Sahitya Aur Katha Natak

    Yashpal Ka Yatra Sahitya Aur Katha Natak

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 225

    25%

  10. Lohe Ki Deewar Ke Dono Or

    Lohe Ki Deewar Ke Dono Or

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 221

    25%

    प्रस्तुत पुस्तक 'लोहे की दीवार के दोनों ओर' में सोवियत देश और पूंजीवादी देशो के जीवन और व्यवस्था का आँखों देखा तुलनात्मक विवरण प्रस्तुत किया गया है ! यशपाल जी ने व्यक्तिगत जानकारी के आधार पर सब बातों का विवरण और विश्लेषण करने की चेष्टा की है ! लेकिन उन्होंने "संस्मरणों के व्यक्तिगत होने पर भी... केवल स्मृति पर ही भरोसा नहीं किया है ! यथासंभव स्मृति को प्रमाणिक आधारों, तत्कालीन अदालती दस्तावेजों और समाचारपत्रों द्वारा सही कर लेने की भी कोशिश की है ! " साथ ही उन्होंने पूर्ववर्ती सामग्री के बारे में यह भी स्पष्ट कर दिया कि "अब तक क्रन्तिकारी प्रयत्नों के विषय में इतिहास के नाम से जो कुछ लिखा गया है वह अधिकांश में अफवाहों, कुछ अनर्गल कल्पनाओं के आधार पर भी लिखा गया है !

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