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Sone Ki Sikri : Roopa Ki Nathiya

Sone Ki Sikri : Roopa Ki Nathiya

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  • Pages: 115p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 8126710098
  •  
    सोने की सिकड़ी संताल आदिवासी समुदाय नवसृजित झारखंड राज्य की आबादी का एक मुख्य हिस्सा है। यहाँ के तेजी से बदलते सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में संताल लोगों की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती जा रही है। संताल परगना के प्रमण्डलीय मुख्यालय दुमका को झारखण्ड की ‘उप-राजधानी’ का दर्जा दिया गया है जो इसकी महत्ता को स्वतः उजागर करता है। आज की बदली हुई स्थिति में संताल आदिवासियों के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन के विभिन्न पहलुओं पर गहन शोध एवं अध्ययन की आवश्यकता प्रबल होती जा रही है। संताल आदिवासियों के बीच अलग-अलग मौसम, त्योहार और अवसरों के लिए अलग-अलग गीतों के विधान हैं। दोङ अर्थात् विवाह गीतों के अतिरिक्त सोहराय, दुरूमजाक्, बाहा, लांगड़े रिजां मतवार, डान्टा और कराम संताल परगना के प्रमुख लोकगीत हैं। बापला अर्थात् विवाह संताल आदिवासियों के लिए मात्र एक रस्म ही नहीं, वरन् एक वृहत् सामाजिक उत्सव की तरह है जिसका वे पूरा-पूरा आनन्द उठाते हैं। इसके हर विधि-विधान में मार्मिक गीतों का समावेश है। इन गीतों में जहाँ आपको आदिवासी जीवन की सहजता, सरलता, उत्फुल्लता तथा नैसर्गिकता आदि की झलकें मिलेंगी, वहीं उनके जीवन-दर्शन, सामाजिक सोच और मान्यता, जिजीविषा तथा अदम्य आतंरिक शक्ति से भी अनायास साक्षात्कार हो जाएगा। परम्परागत संताली जीवन विविधतापूर्ण है जिसकी एक झलक प्रस्तुत करने की दिशा में हमने यह प्रयास किया है।

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    Padamsri Chittoo Tudu

    पद्मश्री चितू टुडू
    जन्म : 31 दिसम्बर, 1929, ग्राम–साहूपोखर, श्यामबाजार, बांका । शिक्षा : मैट्रिक, किन्तु स्वा/याय से हिन्दी, अंग्रेजी, बंगला एवं आदिवासी भाषाओं में दक्ष । सम्प्रति % संयुक्त जन–सम्पर्क निदेशक पद से अवकाश प्राप्त कर सामाजिक सांस्कृतिक कार्यों से संलग्न । प्रकाशन : ‘पंडित जवाहर लाल नेहरू’ (संताल), ‘जावांयधति (संताली लोक–गीत संग्रह), विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में कई रचनाएँ प्रकाशित, आकाशवाणी से प्रसारित । योगदान : आदिवासी लोक–संस्कृति तथा साहित्य का संरक्षण–संवर्द्धन, दिल्ली मेें आयोजित मुख्य गणतंत्र दिवस समारोह में दस वर्षों तक आदिवासी लोकनर्त्तक दल का नेतृत्व, संताली क्षेत्र में शिक्षा प्रसार हेतु समर्पित, संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली के पाँच वर्षों तक सदस्य मनोनीत । सम्मान : बिहार राजभाषा विभाग द्वारा वर्ष 86 में एवं भारत सरकार द्वारा सन् 1992 में पद्मश्री से सम्मानित ।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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