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Shrinaresh Mehta Rachanawali (Vol. 1-11)

Shrinaresh Mehta Rachanawali (Vol. 1-11)

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Special Price Rs. 9,900

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  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9788180316531
  •  
    श्रीनरेश मेहता अपनी परम्परा के प्रति ‘आत्मविस्मृत आधुनिकों’ में नहीं, बल्कि उन आधुनिक कवियों में हैं, जो तमाम आयातित विचारों और प्रवृत्तियों के लिए खुले रहते हुए भी उनकी अधीनता स्वीकार नहीं करते । इतना ही नहीं, सतत एक आधुनिक भारतीय कवि की उपस्थिति भी दर्ज कराते हैं । वे निषेध नहीं करते, वरन् अपरिहार्य हो उठे आयातित विचारों और विचारधाराओं के बीचोबीच अपनी ही संस्कारगत प्रज्ञा से नयी लपट उठाते हैं, अपने भीतर से विचारों और मूल्यों का सन्धान करते हैं, जो वैकल्पिक या ‘प्रति’ नहीं हैं, स्वयं संकल्प हैं, जिनकी सन्दर्भवत्ता भी है, प्रासंगिकता भी और सनातनता भी । भाषा के नये प्रयोगों और अन्वेषणों की दृष्टि से श्रीनरेश मेहता का आधुनिक युग में भी कोई सर्जक उल्लंघन नहीं कर सका है । उसका कारण उनका वैदिक, औपनिषदिक, सांस्कृतिक परम्परा में प्रयुक्त भाषा में नवार्थ भरना हैय भागवत, वृन्दावन, प्रार्थना, ऋचा, मन्त्र, गायत्री, अनुष्टुप, शिवत्व, उपनिषद्, वैष्णवता, उत्सव, यज्ञ, बिल्व–पत्र, यज्ञोपवीत, अश्वत्थ–जैसे पचासों शब्दों और उनके विभिन्न रूपों का सिर्फ प्रयोग ही नहीं, इनमें नया अर्थ भरना सर्वथा भाषा का मौलिक अन्वेषण है । इसके अलावा मालवा के लोक–शब्द, बांग्ला–शब्द आदि का भरपूर प्रयोग श्रीनरेशजी की भाषा में मिलता हैय और कहना न होगा कि वह सर्जक वास्तव में बहुत बड़ा होता है जो भाषा का सन्धान करता है । श्रीनरेश मेहता के काव्य में प्रकृति की महत् भूमिका है । प्रकृति से उनका बड़ा घरोपा है । उनके भीतर के तार उससे जुड़े हैं । यहाँ तक कि उनका स्वयं का जीवन प्रकृत रहा–अकृत्रिम, सहज । प्रकृति के अनेक रूप, रंग, बिम्ब, सम्बन्ध श्रीनरेश मेहता के काव्य में आद्यन्त खिले हुए हैं । वह उनके सोच और अभिव्यक्ति की सहयात्री है । ग्यारह खंडों में प्रकाशित श्रीनरेश मेहता रचनावली का यह पहला खंड है । इस खंड में ‘बनपाखी! सुनो!!’, ‘बोलने दो चीड़ को’, ‘मेरा समर्पित एकांत’, ‘उत्सवा’, ‘तुम मेरा मौन हो’, ‘अरण्या’, ‘आखिर समुद्र से तात्पर्य!’ शीर्षक काव्य–संकलन शामिल हैं ।

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    Prabhakar Shrotriya

    प्रख्यात आलोचक, नाटककार, निबन्धकार। प्रखर संतुलित : ष्टि। सर्जनात्मक भाषा और विवेचना की मौलिक भंगिमा। नई कविता का सौन्दर्यशास्त्र, नई और समकालीन  कविता  का  प्रामाणिक  मूल्यांकन, साहित्येतिहास का पुनर्मूल्यन, छायावाद, द्विवेदी-युग, प्रगतिवाद इत्यादि का नव विवेचन। दो दर्जन मौलिक और एक दर्जन सम्पादित ग्रंथ।

    प्रमुख प्रकाशन: कविता की तीसरी आँख, रचना एक यातना है, जयशंकर प्रसाद की प्रासंगिकता, संवाद (नई कविता-आलोचना), कालयात्री है कविता, अतीत के हंस: मैथिलीशरण गुप्त, प्रसाद साहित्य में प्रेमतत्त्व, हिन्दी कविता की प्रगतिशील भूमिका, शमशेर बहादुर सिंह, नरेश मेहता, सुमन: मनुष्य और सृष्टा, रामविलास शर्मा: व्यक्ति और कवि तथा धर्मवीर भारती  (संपा.), कविता की तीसरी आँख का अंग्रेजी अनुवाद ज्ीम फनपदजमेेमदबम व िच्वमजतल। नाटक: इला, साँच कहूँ तो..., फिर से जहाँपनाह। इला का ग्यारह भारतीय भाषाओं में अनुवाद (प्रक्रिया में)।

    सम्मान व पुरस्कार: अखिल भारतीय आचार्य रामचन्द्र शुक्ल पुरस्कार (उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान), अ.भा. रामकृष्ण बेनीपुरी पुरस्कार (बिहार सरकार, भाषा विभाग), आचार्य नंददुलारे वाजपेयी पुरस्कार (मध्य प्रदेश साहित्य परिषद), रामेश्वर गुरु पत्रकारिता पुरस्कार, श्री शरद सम्मान, आदि।

    पूर्व कार्य: निदेशक भारतीय भाषा परिषद, कोलकाता; सम्पादक: वागर्थ, साक्षात्कार, अक्षरा, सदस्य केन्द्रीय साहित्य अकादमी।

    विदेश यात्रा: नार्वे।

    सम्प्रति: निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली; संपादक ‘नया ज्ञानोदय’।

    सदस्य: विद्या परिषद महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय।

    परामर्शदाता: केन्द्रीय साहित्य अकादेमी (हूज. हू. हिंदी), नेशनल बुक ट्रस्ट, दिल्ली लक्ष्मीदेवी ललित कला अकादमी, कानपुर।

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