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Sahityalochan

Sahityalochan

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  • Pages: 256
  • Year: 2017, 1st Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Lokbharti Prakashan
  • ISBN 13: 9789352211890
  •  
    ‘साहित्यालोचन’ का प्रकाशन 1922 में हुआ था। हिन्दी भाषा के अध्ययन-अध्यापन और विकास के लिए बाबू श्यामसुन्दर दास ने जो प्रयास किए थे, उनमें इस पुस्तक का विशिष्ट स्थान है। यह पुस्तक साहित्य और अन्यान्य कलाओं की मूल अवधारणाओं का निरूपण करते हुए, कला के भिन्न-भिन्न रूपों, और विशेष रूप से साहित्य की विभिन्न श्रेणियों के आस्वादन और तदनुरूप उनके विवेचन की आधारशिला रखनेवाली कृति है। गौरतलब है कि बीसवीं सदी के आरम्भिक दशकों में जब हिन्दी की रचनात्मकता अपने शास्त्र की खोज ही कर रही थी, इस पुस्तक की मूल प्रस्थापनाओं में इस बात को रेखांकित करना उन्हें आवश्यक लगा था कि आलोचना-समीक्षा अथवा शास्त्र का काम साहित्य-रचना के लिए नियमों का निर्धारण नहीं है, बल्कि उसके साथ चलते हुए अपनी भी दृष्टि का विस्तार करना है। लेकिन आज भी आलोचना अक्सर इस भ्रम में भटक जाती है कि वह रचना को रास्ता दिखानेवाली कोई मशाल है। इस पुस्तक को पढ़ते हुए हम जान पाते हैं कि हमारी भाषा का वह युग सत्य और तर्क को लेकर कितना सजग था और आज भी हमें उस दृष्टि की कितनी आवश्यकता है। कहने की जरूरत नहीं कि गत लगभग एक सदी से यह पुस्तक अपनी उपयोगिता को बरकरार रखे हुए है, और आज भी न सिर्फ छात्रों के लिए बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए उपादेय है जो हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रति गम्भीर है।

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    Dr. Shyam Sundar Das

    डॉ. श्यामसुंदर दास

    जन्म : सन 1875 ई. काशी में !

    शिक्षा : 1897 ई. में बी. ए. पास किया था !

    गतिविधियाँ : 1899 ई. में हिन्दू स्कूल में कुछ दिनों तक अध्यापक थे ! उसके बाद लखनऊ के कालीचरण स्कूल में बहुत दिनों तक हेडमास्टर रहे ! सन 1921 ई. में काशी हिन्दू विश्व विद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष पद पर नियुक्त हुए !

    प्रारंभ से ही हिंदी के प्रति आपकी अनन्य निष्ठां थी ! नागरी प्रचारिणी सभा की स्थापना (16 जुलाई, सन 1893 ई.) आपने विद्यार्थी-काल में ही अपने डॉ सहयोगियों रामनारायण मिश्र और ठाकुर शिवकुमार सिंह की सहायता से की थी ! काशी हिन्दू विश्विद्यालय में आने के पूर्व आपने हिंदी-साहित्य की सर्वतोमुखी समृद्धि के लिए न्यायालयों में हिंदी-प्रवेश का आन्दोलन (1900 ई.) हस्तलिखित ग्रंथों की खोज (1899) ई.), हिंदी शब्द सागर' का संपादन (1907) ई.) आर्य भाषा पुस्तकालय की स्थापना (1903) ई.), प्राचीन महत्त्वपूर्ण ग्रंथों का संपादन सभा-भवन का निर्माण (1902 ई.) 'सरस्वती' पत्रिका का संपादन (1900 ई.) तथा शिक्षस्तर के अनुरूप पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण-कार्य आरम्भ कर दिया था ! आप आजीवन एक गति में साहित्य-सेवा में रत रहे !

    साहित्य सेवा : 'नागरी वर्णमाला', 'हिंदी हस्तलिखित ग्रंथों का वार्षिक खीज विवरण' 'हिंदी हस्लिखित ग्रंथो की खीज' का प्रथम त्रैवार्षिक विवरण' 'हिंदी कोविद रत्नमाला' भाग 1, 2, 'साहित्यालोचन', 'भाषा विज्ञान', 'हिंदी भाषा का विकास', हस्तलिखित हिंदी ग्रंथों का संशिप्त विवरण', 'गध्य कुसुमावली', 'भारतेंदु हरिश्चंद्र', 'हिंदी भाषा और साहित्य', गोस्वामी तुलसीदास, 'रूपक रहस्य', 'भाषा रहस्य' भाग 1, 'हिंदी गद्य के निर्माता' भाग 1,2, 'मेरी आत्म कहानी' !

    निधन : सन 1945 ई. !

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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