• (011) 23274463
  • Help
INR
 
Shopping Cart (0 item)
My Cart

You have no items in your shopping cart.

You're currently on:

Rajgondon Ki Vanshgatha

Rajgondon Ki Vanshgatha

Availability: In stock

-
+

Regular Price: Rs. 600

Special Price Rs. 540

10%

  • Pages: 480p
  • Year: 2011
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126721627
  •  
    राजगोंडों की वंशगाथा गोंड राजवंश का उदय कलचुरियों या हैहयवंशी राजवंश के अस्त होने पर हुआ। गोंड राजवंश के प्रारम्भिक राजा स्वतंत्र राजा थे। इनका राजकाल के ऐतिहासिक साक्ष्य तब से मिलने प्रारंभ होते हैं जब भारत में लोदीवंश का शासन था। इन प्रारम्भिक स्वतंत्र गोंड राजाओं का जीवन चरित लेखक ने राजकमल प्रकाशन द्वारा वर्ष 2008 में प्रकाशित ग्रन्थ ‘चरितानि राजगोंडानाम्’ में लिपिबद्ध किया था। करद राजाओं का जीवन चरित ‘राजगोंडों की वंशगाथा’ ग्रन्थ के रूप में प्रस्तुत है। इस वृत्तान्त में गढ़ा कटंगा राज्य की उन सभी पीढ़ियों के राजाओं की जिजीविषा की कहानियाँ हैं, जिन्होंने मुगलकाल के पश्चात मराठा काल तक राज्य किया। ये गाथाएँ मानवीय विश्वास, संवेदना और कर्मठता के अतिरिक्त चार से अधिक शताब्दियों की कालावधि में हुए मानवीय विकास की कथाएँ हैं। ये जनजातीय राजे अपने विकासक्रम में निरक्षर, अपढ़ या गंवार नहीं रहे, न ही ये सर्वथा ऐकान्तिक रहे वरन् इनमें से अनेक साहित्यानुरागी, कलाप्रेमी और समकालीन राजनीति के खिलाड़ी भी रहे। ऐसे राजाओं में हृदयशाह का नाम उल्लेखनीय है। ग्रन्थ के पूर्वार्द्ध में राजगोंड कुलभूषण हृदयशाह की दो आगे की और दो पीछे की पीढ़ियों का वर्णन है। इन सभी पीढ़ियों में उनका व्यक्तित्व बेजोड़ है। यह पुस्तक निश्चित ही न तो इतिहास विषय का ग्रन्थ है और न ही सामाजिक शोध प्रबन्ध, अतः इसकी अकादमिक उपयोगिता को बढ़ाने से सम्बन्धित किसी प्रयास की चर्चा बेमानी है। प्रयास यह रहा है कि कहानियों में ऐतिहासिकता अक्षुण्ण रहे, कल्पना प्रसूत पात्र एवं घटनाएँ यथासम्भव कम से कम हों। प्रत्येक ऐतिहासिक घटना को अलग-अलग इतिहासकार अपने नजरिये से देखते हैं, परन्तु कहानी में घटना को किसी एक ही नजरिये से देखा जा सकता है यह उसकी सीमा है और आवश्यकता भी। सामान्य तौर पर कथाओं में वे घटनाएँ चुनी गई हैं जिनसे सर्गों की सूत्रबद्धता कायम रहे परन्तु साथ ही वे सम्बन्धित राजाओं के जीवन की मुख्य घटनाएँ हों।

    Customer Reviews

    There are no customer reviews yet.

    Write Your Own Review

    Shiv Kumar Tiwari

    शिवकुमार तिवारी

    जन्म: जबलपुर, 1941

    विश्वविद्यालयीन परीक्षाएँ (बी.ए., एम.ए.) विशेष योग्यता के साथ प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण, ‘नेशनल मैरिट स्कॉलरशिप’, जैवभूगोल में शोधकार्य एवं डॉक्टरेट की उपाधि। 25 वर्षों तक भूगोल विषय के सहायक प्राध्यापक पदों पर रहकर शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालयों में अध्यापन-कार्य। भूगोल, मानव विज्ञान, पर्यावरण, जनजातीय संस्कृति एवं चिकित्सा भूगोल पर 24 ग्रन्थ तथा अनेक शोध-पत्र। 1990 से 2003 तक रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय में जनजाति अध्ययन विभाग में अध्यक्ष। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, भारतीय सामाजिक विज्ञान परिषद तथा मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद जैसी संस्थाओं तथा भारत सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय द्वारा अनुदान प्राप्त क्षेत्रीय शोध परियोजना के निदेशक। हिन्दी भाषा में भूगोल व जनजाति विषय पर सात पुस्तकों का प्रकाशन।

    प्रकाशित कृतियाँ: अंग्रेजी में ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन ट्राइबल्स’, ‘इनसाइक्लोपीडिया ऑफ वाइल्डलाइफ सेंक्चुरिज एंड नेशनल पार्क’, ‘एनीमल किंगडम ऑफ दी वर्ल्ड’ (2 भाग), ‘एटलस ऑफ इंडियन वाइल्डलाइफ’, ‘ट्राइबल हिस्ट्री ऑफ सेंट्रल इंडिया’, ‘बैगाज़ ऑफ सेंट्रल इंडिया’, ‘रिडिल्स ऑफ राकशेल्टर पेंटिंग्स’, ‘ट्राइबल रूट्स ऑफ हिन्दुइज़्म’, ‘जूज्याग्रॉफी ऑफ इंडिया एंड साउथ ईस्ट एशिया’, ‘जूज्याग्रॉफी ऑफ इंडियन एंफीबियंस’, ‘मेडिकल ज्यॉग्रॉफी ऑफ इंडियन ट्राइबल्स’ तथा ‘ज्याग्रॉफिक बायोज्याग्रॉफी’ (2007)।

    अंग्रेजी और हिन्दी भाषा में सतत् लेखन एवं चित्रकारी में रुचि।

     

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

    Location

    Address:1-B, Netaji Subhash Marg,
    Daryaganj, New Delhi-02

    Mail to: info@rajkamalprakashan.com

    Phone: +91 11 2327 4463/2328 8769

    Fax: +91 11 2327 8144