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Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Uttararddha

    Uttararddha

    Regular Price: Rs. 400

    Special Price Rs. 300

    25%

    जीवन, जमीन और प्रकृति के अदभुत कवि है अशोक कुमार महापात्र ! अनुभूति की ऐसी सघन यात्रा के कवि कि संवेदना अपनी रिक्तता में भी मुखर हो उठती है ! संघर्ष और सपने अपनी सम्पूर्णता के लिए पूरी जिजीविषा के साथ अपनी क्रियात्मकता में घटित होते प्रतीत होते हैं ! अपने काव्य-वितान के लिए एक ऐसे विजन का कवि जिसके पास मनुष्य और उसकी पीड़ा को रचने के लिए हजारों रंग हैं ! 'उत्तरार्द्ध' जितना काल भीतर, उतना ही काल बाहर देखने और रचने का काव्य-कर्म है ! यथार्थ से टकराने में जिस तरह आस्था, उसी तरह स्मृतियाँ भी साथ, ताकि सैम के केंद्र में विषम के गाढ़ापन को गहरे जाना जा सके और मिथ्या मानने से इनकार किया जा सके ! कवि भूख को जब भूख की आँखों से देखता है, तब अपने आंतरिक ब्रह्माण्ड की गति का हिस्सा होता है, तभी तो 'माया-लोक' में ऋतुओं के 'छाया-लोक' को रच पाटा है ! भौतिकता में अपनी दृष्टि का तब एक और गहरा परिचय देता है कवि, जब जन और तंत्र के बीच शतरंज के गणित को हल करते ताल को आत्मसात करता है; और संबंधों को जीवन की आंच के साथ संजोता है ! तेजी से बदलती हुई इस दुनिया में पीढ़ियों का द्वन्द मनो म्नात साक्ष्य, लेकिन यह कवि की कुशलता ही है कि इसे भी एक नए रूप में रच लेता है ! रच लेता है जैसे-सृष्टि के सौन्दर्य के साथ प्रेम का बृहद आख्यान ! अपने बीते-अन्बीते को बार-बार देखने और देखे हुए को कला और उसकी गति में जीने का कविता-संग्रह है-'उत्तरार्द्ध'!
  2. Nacohus

    Nacohus

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    'किस दुनिया के सपने देखे, किस दुनिया तक पहुंचे...' इन बढ़ते, घुटन-भरे अंधेरों के बीच रोशनी की कहीं कोई गुंजाइश बची है क्या ? इसी सवाल से जूझते हमारे तीनों नायक-सुकेत, रघु और शम्स-कहाँ पहुंचे... "तीनों? करुणा क्यों नहीं याद आती तुम्हें? औरत है ! इसलिए?" नकोहस तुम्हारी जानकारी में हो या न हो, तुम्हारे पर्यावरण में है... टीवी ऑफ़ क्यों नहीं हो रहा ? सोफे पर अधलेटे से पड़े सुकेत ने सीधे बैठ कर हाथ में पकडे रिमोट को टीवी की ऐन सीध में कर जोर से ऑफ़ बटन दबाया...बेकार...वह उठा, टीवी के करीब पहुँच पावर स्विच ऑफ किया... हर दीवार जैसे भीमकाय टीवी स्क्रीन में बदल गई है, कह रही है : "वह एक टीवी बंद कर भी दोगे, प्यारे...तो क्या...हम तो हैं न..." टीवी भी चल रहा है... और दीवारों पर रंगों के थक्के भी लगातार नाच रहे हैं...सुकेत फिर से टीवी के सामने के सोफे पर वैसा ही...बेजान... टीवी वालों को फोन करना होगा ! कम्प्लेंट कैसे समझाऊंगा? लोगों के सेट चल कर नहीं देते, यह सेट साला टल कर नहीं दे रहा...
  3. Dharm, Satta Aur Hinsa

    Dharm, Satta Aur Hinsa

    Regular Price: Rs. 650

    Special Price Rs. 488

    25%

    बीते वर्षों के दौरान साम्प्रदायिकता का उभार भारतीय राजनीति में एक बड़े दावेदार के रूप में हुआ है ! सो भी इतने जोर-शोर से कि हमारे संवैधानिक ढाँचे के लिए खतरा बनता दिखाई दे रहा है ! अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी उत्तरोत्तर धार्मिक शब्दावली का प्रयोग ज्यादा दिखने लगा है ! विश्व के भी मानवाधिकार आन्दोलन इसको एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं ! इस पुस्तक में शामिल सत्रह मौलिक आलेखों की पृष्ठभूमि यही है जिसमें अमेरिका पर सितम्बर 11 का हमला, अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी आक्रमण, दुनिया-भर में इस्लाम का शैतानिकरण और भारत के मुंबई व् गुजरात के दंगो को खास तौर पर रेखांकित किया गया है ! ये आलेख बताते हैं कि भीड़ को धर्म के नाम पर भड़काकर वंचित समूहों के भीतर किसी भी विद्रोह की सम्भावना को कैसे असंभव कर दिया जाता है और धर्म-आधारित राजनीति किस तरह आज उदारीकरण, भुमडलीकरण और निजीकरण के साथ गठजोड़ करके चल रही है ! यह पुस्तक मुस्लिम पिछड़ेपन के मिथक, हिन्दुत्व की विभाजनकारी राजनीति को आप्रवासियों की आर्थिक मदद आदि मुददों पर भी तथ्याधारित विचार करती है और अब आदिवासी, दलित और स्त्रियों के साथ अन्य अल्पसंख्यक समूह कैसे उसके निशाने पर आ रहे हैं यह भी बताती है ! हिन्दुत्व पर लगभग हर कोण से विस्तृत परिदृश्य में प्रश्नवाचक समीक्षा करनेवाली यह पुस्तक राजनीति, समाजविज्ञान, इतिहास और धर्म आदि सभी क्षेत्र के अध्येताओं के लिए पठनीय है !
  4. Dharm, Satta Aur Hinsa

    Dharm, Satta Aur Hinsa

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 221

    25%

    बीते वर्षों के दौरान साम्प्रदायिकता का उभार भारतीय राजनीति में एक बड़े दावेदार के रूप में हुआ है ! सो भी इतने जोर-शोर से कि हमारे संवैधानिक ढाँचे के लिए खतरा बनता दिखाई दे रहा है ! अंतर्राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भी उत्तरोत्तर धार्मिक शब्दावली का प्रयोग ज्यादा दिखने लगा है ! विश्व के भी मानवाधिकार आन्दोलन इसको एक बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं ! इस पुस्तक में शामिल सत्रह मौलिक आलेखों की पृष्ठभूमि यही है जिसमें अमेरिका पर सितम्बर 11 का हमला, अफगानिस्तान और इराक पर अमेरिकी आक्रमण, दुनिया-भर में इस्लाम का शैतानिकरण और भारत के मुंबई व् गुजरात के दंगो को खास तौर पर रेखांकित किया गया है ! ये आलेख बताते हैं कि भीड़ को धर्म के नाम पर भड़काकर वंचित समूहों के भीतर किसी भी विद्रोह की सम्भावना को कैसे असंभव कर दिया जाता है और धर्म-आधारित राजनीति किस तरह आज उदारीकरण, भुमडलीकरण और निजीकरण के साथ गठजोड़ करके चल रही है ! यह पुस्तक मुस्लिम पिछड़ेपन के मिथक, हिन्दुत्व की विभाजनकारी राजनीति को आप्रवासियों की आर्थिक मदद आदि मुददों पर भी तथ्याधारित विचार करती है और अब आदिवासी, दलित और स्त्रियों के साथ अन्य अल्पसंख्यक समूह कैसे उसके निशाने पर आ रहे हैं यह भी बताती है ! हिन्दुत्व पर लगभग हर कोण से विस्तृत परिदृश्य में प्रश्नवाचक समीक्षा करनेवाली यह पुस्तक राजनीति, समाजविज्ञान, इतिहास और धर्म आदि सभी क्षेत्र के अध्येताओं के लिए पठनीय है !
  5. Dhan Ki Khan-Khan

    Dhan Ki Khan-Khan

    Regular Price: Rs. 75

    Special Price Rs. 56

    25%

  6. Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya

    Kuchh Ishq Kiya Kuchh Kaam Kiya

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 135

    10%

    सिनेमा और थिएटर के अन्तरिक्ष में विधाओं के आर-पार उडनेवाले धूमकेतु कलाकार पीयूष मिश्रा यहाँ, इस जिल्द के भीतर सिर्फ एक बेचैन शब्दकार के रूप में मौजूद हैं ! ये कविताएँ उनके जज्बे की पैदावार हैं जिसे उन्होंने अपनी कामयाबियों से भी कमाया है, नाकामियों से भी ! हर अच्छी कविता की तरह ये कविताएँ भी अपनी बात खुद कहने की कायल हैं, फिर भी जो ख़ास तौर पर सुनने लायक है वह है इनकी बेचैनी जो इनके कंटेंट से लेकर फार्म तक एक ही रचाव के साथ बिंधी है ! दूसरी ध्यान रखने लायक बात ये कि इनमें से कोई कविता अब तक न मंच पर उतरी है, न परदे पर ! यानी यह सिर्फ और सिर्फ कवि-शायर पीयूष मिश्रा की किताब है !
  7. Aazadi Mera Brand

    Aazadi Mera Brand

    Regular Price: Rs. 199

    Special Price Rs. 149

    25%

    "लोग कहते हैं कि बचपन के दिन सबसे ख़ास होते हैं, कोई टीन-एज खास बताता है तो कोई ट्वेंटीज़! मुझे तो ये वाली उम्र सबसे खास लगती है, जिसमे मैं हूँ। तीस को टच करती, सहज-सी, छुपी-सी, आसान-सी उम्र। हार्मोन्स रह-रह के उबाल नहीं मारते, नए-नए क्रश रात-रात भर नहीं जगाते, ब्रेक-अप्स रात-रात भर नहीं रुलाते। कहने को आप बोरिंग कह सकते हैं, लेकिन मुझे बहुत खास लगती है यह उम्र। किताब पढ़ते हैं तो बस पढ़ते ही जाते हैं, बिना कोई मिस्ड कॉल या बैकग्राउंड में किसी की याद लिए। अपना पैसा थोड़ा कमा लिया है, तो पूरी आज़ादी लगती हैं— घूमने की, पहनने की, बोलने की, फ़िरने की।" -अनुराधा बेनीवाल
  8. Varshavan Ki Roopkatha

    Varshavan Ki Roopkatha

    Regular Price: Rs. 250

    Special Price Rs. 188

    25%

    'सुन्दरता ही संसार को बचायेगी'-यह टिपण्णी हर समय, हर समाज, हर देश और हरेक भाषा के वास्ते महान साहित्यकार दोस्तोयेव्स्की की है ! सुन्दरता का आशय मात्र किसी महारूपा स्त्री या महारूपा प्रकृति से ही नहीं है ! सुन्दरता का मतलब ठेठ 'अगुम्बेपन' से भी है ! प्रेम का चिरंतन आनंद, उसकी अटूट शक्ति और विह्वल करूणा भी विशुद्ध अगुम्बेपन में ही है ! अंग्रेजी के उदभट लेखक आर. के. नारायण लिखित 'मालगुडी डेज' पर सीरियल बनाने का निर्णय लेकर इस काल्पनिक ग्राम को साकार करने का स्वप्न सँजोए शंकर नाग जब घुमते-भटकते अगुम्बे पँहुचे, तो उन्हें छूटते हुए लगा कि यही तो है नारायण का अदभुत मालगुडी ! घने जंगल, पहाड़ और बादलों की अहर्निश मधुर युगलबंदी के बीच स्थित मलनाड अंचल के इस गाँव के सरल-सहज लोगों से मिलकर शंकर नाग को लगा कि शूटिंग के लिए यहाँ उन्हें अलग से कोई सेट लगाने की भी जरूरत नहीं ! पूरा गाँव ही इस सीरियल का कुदरती सेट है ! शूटिंग के दौरान आर. के. नारायण भी जब एक बार अगुम्बे आए, तो बिस्मित हुए बिना न रह सके ! बहरहाल, 'मालगुडी डेज' सीरियल के बने वर्षो बीत चुके हैं पर अगुम्बे अभी भी मालगुडी को अपनी आत्मा के आलोक में बड़े दुलार से बसाए हुए है ! और यह यों ही नहीं है ! बाजारवाद के इस भीषण पागल समय में यह गाँव मनुष्यता का एक ऐसा दुर्लभ हरित मंडप है, जहाँ के विनोदप्रिय निष्कलुष लोग समस्त कामनाओं और आतप को हवा में फूंककर उड़ाते हुए मौन उल्लास की सुरभि में निरंतर मधुमान रहते हैं ! जीवनानंद के पराग से पटी पड़ी है अगुम्बे की धरती ! अगुम्बे की ख्याति दुनिया में 'किंग कोबरा' के एकमात्र मुख्यालय के रूप में भी है ! आलोड़ित कर्नाटक के इस गाँव की जैसी धारासार तन्मय गाथा एक हिंदी भाषी लेखक द्वारा लिखी गई है, वह पृष्ठ-दर-पृष्ठ चकित करती हुई साधारण मनुष्य के जीते-जागते स्वप्नजगत में अदभुत रमण कराती है !
  9. Nabhinal

    Nabhinal

    Regular Price: Rs. 250

    Special Price Rs. 188

    25%

    धीमी आंच पर धरती की मोटी सतह के भीतर हलके-हलके खदबदाता कुछ-फट पड़ने की तरफ एक-एक कदम रखता हुआ ! रवीन्द्र भारती की इन कविताओं की तुलना में अगर कोई बिम्ब गढ़ना चाहें तो वह कुछ ऐसा होगा ! जो मन इन कविताओं में न्यस्त है ! यह मुंडेर पर खड़ा चीखता हुआ मन नहीं है, यह गली के कोलाहल को परत-परत छील चूका और उसके परदे में छिपी तमाम मामूलियत को पहचान चूका मन है, और अब बदलाव को उतनी ही गहराई और सच्चाई से शुरू होते देखना चाहता है जितने गहरे उसकी बेचैनी खदबदा रही है ! बिलकुल हमारे आसपास के संदर्भो में एकदम सहज तत्वों और तथ्यों को वे तिनके की तरह उठाते हैं, एक दुर्लभ शांत तन्मयता के साथ इशारों में ही उनको स्पर्श करते हैं, और हमें मालूम भी नहीं होता कि हमारी सोई संवेदना कतई भिन्न-आलोक में जाग पड़ती है !उनकी कविताओं में प्रतीकों का एक अनंत विस्तार है जिसकी पहुँच प्रकृति, अन्तरिक्ष और सृष्टि के आदि-अंत तक है! ये कविताएँ हमें कभी बहुत ऊँचे से, लगभग किसी सिद्ध भिक्षु की तरह संबोधित करती हैं और कभी ठीक हमारे सामने आकर किसी संगी-साथी की तरह, ऐसा साथी जो हमसे ज्यादा अक्लमंद है लेकिन उस अक्लमंदी को भी जिसने अपनी अर्जित अनाक्रमकता की पवित्र तहों में कहीं पिरो लिया है ! इस नजरिए से वे अब भी एक ताजा कवी हैं, जो हमें हमारे अभ्यस्त पुरानेपन की जद से बाहर ले जाते हैं और चीजों को देखने की नई दृष्टि देते हैं जिससे हमारा आंतरिक स्पेस रचनात्मक हो उठता है ! कहना होगा कि हिंदी कविता के कुछ तत्व जो बहुप्रतीक्षित थे, इन कविताओं में प्रकट होते हैं !
  10. Chand Ke Paar Ek Chabhi

    Chand Ke Paar Ek Chabhi

    Regular Price: Rs. 199

    Special Price Rs. 149

    25%

    कोई भी विधा जितना कथ्य होती है, उससे कुछ ज्यादा फॉर्म होती है ! फॉर्म से ही पता चलता है कि रचनाकार ने सामाजिक के रूप में अपने समय में खुद को कहाँ स्थित किया है ! अवदेश प्रीत का कहानीकार अपने कथ्य को एक संतुलित दूरी से देखता और उसका अंकन करता है जिसके बल ही शायद उनकी कहानी भी पाठक को अपने आनंद में डुबो लेने के बजाय एक खास दूरी पर खड़ा रखकर अपने कथ्य को वस्तुगत ढंग से देखने को बाध्य करती है ! इसी संग्रह में शामिल शीर्षक कहानी 'चाँद के पार एक चाभी' जाति की जड़ और विकत संरचना, उसके सम्मुख प्रेम की असहायता और असम्भवता, और साथ ही आधुनिकता के साथ जगती उम्मीदों के नए अंकुरों की कहानी है ! यह कहानी आंसुओं की बाढ़ ला सकती थी, लेकिन अगर नहीं लाती और पढने के बाद डूबने के बजाय चिंता में डाल देती तो यह उसके शिल्प के चलते है ! शिल्प का यह जादू वे भाषा के प्रयोग में खास तौर पर साधते हैं ! उनका किस्सागो दृश्य को बखानने की प्रक्रिया में चीजों को देखने का एक नजरिया पाठक को देता चलता है जो गुदगुदाता भी है और कहानी के साथ-साथ पात्रों के चरित्र की रेखाओं को भी उभारना चलता है ! अवदेश प्रीत जाने-माने कथाकार हैं ! लगातार पढ़े जाते रहे हैं ! मनुष्यता के हामी किसी भी लेखक को समाज में जिन चीजों से विचलित होना चाहिए, उन सबको ईमानदारी से देखने के साक्ष्य इन कहानियों में भरे पड़े हैं !

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