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Mohan Gata Jayega

Mohan Gata Jayega

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  • Pages: 275p
  • Year: 2004
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8171198775
  •  
    मोहन गाता जाएगा ‘लेकिन इन पहाड़ों में मानव जीवन विकट है।...मैं इस विकट पहाड़ में रम-बस गया। इसे छोड़कर कहीं भाग जाने की बात नहीं सोची। अपनी रचनाओं में मैं इस पहाड़ की सीमाओं के अन्दर घिरा रहा। टिहरी से बाहर नहीं निकला। निकलूँगा भी नहीं।’ (इसी पुस्तक में लेखक के वक्तव्य का अंश)। ‘मोहन गाता जाएगा’ में कथा- शिल्पी विद्यासागर नौटियाल ने पहाड़ के जीवन, टिहरी की ज़िन्दगी के दर्द, उससे लगाव, अपने छात्र-जीवन, जन-आंदोलन, राजनीतिक सक्रियता, मानवीय संबंधों और मित्रता की ऊष्मा को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा, व्यापक अनुभव, सजग दृष्टि के साथ टुकड़े-दर-टुकड़े, हरफ़- ब-हरफ़ अद्भुत सांगीतिक गद्य में कहने का सहज प्रयास किया है। उन्नीस सौ छप्पन से दो हजार तक चार दशक से ऊपर के समय में टिहरी, काशी, लखनऊ, देहरादून में लिखी और उपलब्ध ये रचनाएँ महज़ ‘यत्र-तत्र’ टिप्पणियाँ, वक्तव्य, वृत्तांत या आत्मपरक रचना-अंश नहीं हैं बल्कि अपने समय के सामाजिक जीवन का अलग-अलग प्रसंगों में निजी स्पर्श भी हैं। ‘मोहन गाता जाएगा’ दरअसल विद्यासागर नौटियाल का ‘आदमीनामा’ है, जिसमें वे रचनाकार की संवेदना और उसकी चेतना, उसकी ज़िन्दगी में आए लोगों, पढ़ी-लिखी गई रचनाओं, राजनीतिक गतिविधियों, यात्राओं, डायरी और संबोधनों आदि के माध्यम से अपने विलक्षण मिथ-कथनों में अपनी स्मृतियों, विचारों और आकांक्षाओं को बेहद जीवंत, आत्मीय, रोचक और प्रामाणिक ढंग से अतिरिक्त प्रासंगिकता देते हैं। - मुहम्मद हम्माद फ़ारूकी फ्लैप जाँ निसार अख़्तर एक बोहेमियन शायर थे। उन्होंने अपनी पोइट्री में क्लासिकल ब्यूटी और मार्डन सेंसब्लिटी का ऐसा सन्तुलन किया है कि उनके शब्द ख़ासे रागात्मक हो गए हैं। उन्होंने जो भी कहा ख़ूबसूरती से कहा - उजड़ी-उजड़ी सी हर एक आस लगे ज़िन्दगी राम का वनवास लगे तू कि बहती हुई नदिया के समान तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे जाँ निसार अख़्तर के बेशतर अश्आर लोगों की ज़बान पर थे और हैं भी। अदबी शायरी के अलावा उन्होंने फ़िल्मी शायरी भी बड़ी अच्छी की है जो अदबी लिहाज़ से भी निहायत कामयाब रहे। जैसे - आँखों ही आँखों में इशारा हो गया बैठे-बैठे जीने का सहारा हो गया या अय दिल-ए-नादाँ आरजू़ क्या है जुस्तजूश् क्या है अय दिल-ए-नादाँ फ़िल्मी दुनिया में दो तरह के शायर मिलते हैं। एक तो वो जिन्हें फ़िल्म जगत शायर बना देता है दूसरे वो जो ख्शुद शायर होते हैं और अपने दीवान के साथ फ़िल्म इंडस्ट्री ज्वाइन करते हैं। जाँ निसार दूसरे तरह के शायर थे। फ़िल्म जगत में आने से पहले ही न सिर्फ़ वो एक स्थापित शायर थे बल्कि उनकी कई किताबें और कई नज़्में-ग़ज़लें मशहूर हो चुकी थीं। 1935-36 में तरक़्क़ीपसन्द आन्दोलन से जुड़े एक अहम शायर थे जाँ निसार अख़्तर। उनके समकालीनों में सरदार जाफ़री, फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ और साहिर लुधियानवी प्रमुख थे। जाँ निसार उसी पाये के शायर थे। उनकी एक नज़्म है ‘आखि़री मुलाक़ात’ जिसके बारे में मेरा अपना ख़्याल है कि ये पिछले 50 सालों में उर्दू में लिखी गई एक बेहद आउट स्टेंडिंग नज़्म है - मत रोको इन्हें पास आने दो ये मुझसे मिलने आए हैं (शेष दूसरे फ़्लैप पर...) (पहले फ़्लैप का शेष) मैं ख्शुद न जिन्हें पहचान सकूँ कुछ इतने दधँुधले साये हैं शायर के हर इशारे के पीछे उसके जीवन का एक वाक़िया छिपा है। यही इस नज़्म की ख़ूबसूरती है और ऐसी नज़्म उर्दू में सिर्फ़ जाँ निसार अख़्तर ही के पास है। जाँ निसार अख़्तर साहब कमाल अमरोहवी की ‘रज़िया सुल्तान’ के सोलो सांग राइटर थे। मगर ज़िन्दगी ने उनके साथ बेवफ़ाई की और फ़िल्म के पूरी होने से पहले ही वो ज़िन्दगी से रुख़सत हो गए। तब जाकर कमाल साहब ने मुझे बुलाया और मैंने उस फ़िल्म के आखि़री दो नग़मे लिखे। जाँ निसार अख़्तर की बेगम सफ़िया अख़्तर भी बहुत अच्छी राइटर थीं। उन्होंने एक बहुत अच्छा आर्टिकल भी लिखा था अपने शौहर जाँ निसार पर ‘घर का भेदी’ नाम से। उसमें उन्होंने लिखा था कि, ‘जाँ निसार, ज़्यादा लिखना और तेज़ी से लिखना बुरा नहीें है, उस्तादोंवाली बात है लेकिन मैं चाहती हूँ कि तुम रुक-रुक के और थम-थम के लिखो।’ एक बात और, तरक़्क़ीपसन्द शायरों को आप दो-तीन कैटगरीज़ में बाँट सकते हैं। एक में सरदार जाफ़री, कैफ़ी आज़मी और नियाज़ हैदर टाइप शायर हैं। दूसरी में साहिर लुधियानवी और सलाम मछली शहरी टाइप शायर। लेकिन तीसरी कैटगरी में कुछ ऐसे पोइट हैं जो निहायत म्यूज़िकल भी हैं जैसे मजाज़, जज़्बी और यही जाँ निसार अख़्तर। यही वजह है कि जाँ निसार फ़िल्मों में इतने कामयाब रहे। वो मध्यप्रदेश के एक बहुत ही रागात्मक क्षेत्र तानसेन की बस्ती ग्वालियर के निवासी थे। उनके शब्दों के ढलाव और सजाव में उस नगर की रागात्मकता ही नहीं है, हिन्दी और उर्दू के क्लासिकल काव्य परम्परा के जुड़ाव भी हैं। अपनी ज़िन्दगी अपने तौर पर जी और अपनी ही शर्तों पर साहित्य की रचना की जाँ निसार अख़्तर ने। मैं विजय अकेला को बहुत-बहुत बधाई देता हूँ जिन्होंने इस किताब को संपादित करके फ़िल्म जगत के एक महत्त्वपूर्ण गीतकार को पाठकों तक पहुँचाया है और इस ओर भी इशारा किया है कि गीतकारिता में अगर साहित्य भी मिल जाए तो फ़िल्म-गीत भी लम्बी उम्र पा लेते हैं जैसे जाँ निसार के इस गीत ने पाई है - ये दिल और उनकी निगाहों के साये मुझे घेर लेते हैं बाँहों के साये - निदा फ़ाज़ली

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    Vidya Sagar Nautiyal

    विद्यासागर नौटियाल

    29 सितम्बर 1933 को उत्तर भारत के एक सामन्ती राज्य टिहरी-गढ़वाल में भागीरथी के तट पर बसे प्रसिद्ध गाँव मालीदेवल में वन-अधिकारी पिता नारायणदत्त तथा माता रत्ना के द्वितीय पुत्र तथा तृतीय संतान के रूप में जन्म। इस गाँव ने प्रसिद्ध सन्त स्वामी रामतीर्थ को अपनी ओर आकर्षित किया था और उन्होंने अपने स्थायी निवास के लिए यहाँ कुटिया का निर्माण करवाया था। बाद में स्वतंत्रता सेनानी काका कालेलकर ने भी अपने भूमिगत जीवन के छः माह इसी गाँव में बिताए थे।

    शिक्षा: प्राथमिक शिक्षा माता-पिता से, रियासत के विद्यालयविहीन सुदूर जंगलों में अपने घर पर। बाद में टिहरी, देहरादून तथा काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में।

    प्रजामंडल के सामंतविरोधी आंदोलन में सक्रियता के कारण भारत की आज़ादी के बाद पहली गिरफ्तारी 18 अगस्त, 1947 को टिहरी रियासत में। पचास वर्षों में फैला हुआ रचना-कर्म और जन-आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी। 1958 में ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के उदयपुर अधिवेशन में राष्ट्रीय अध्यक्ष निर्वाचित। 1980 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के प्रत्याशी के रूप में देवप्रयाग टिहरी-गढ़वाल से उत्तर प्रदेश विधानसभा सदस्य। 1969 से 1995 तक वकालत।

    कृतियाँ: पहली कहानी मूक बलिदान 1949 में लिखी। भैंस का कट्या 1954 में कल्पना में प्रकाशित। उपन्यास:  उलझे रिश्ते 1958, भीम अकेला 1995, सूरज सबका है 1997 तथा उत्तर बायाँ है 2003 में प्रकाशित। कथा-संग्रह: टिहरी की कहानियाँ 1984 में, टिहरी की कहानियाँ 2000 में तथा सुच्ची डोर 2003 में प्रकाशित। यात्रा-वृत्तांत, संस्मरण, डायरी अंश तथा वैचारिक लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित।

    सम्प्रति: स्वतंत्र रचना-कर्म।

    सम्पर्क: डी-8, नेहरू कालोनी, धर्मपुर, देहरादून, उत्तराखंड-248 001

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