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Masooma

Masooma

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  • Pages: 136p
  • Year: 2017, 4th Ed.
  • Binding:  Paperback
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126718153
  •  
    मासूमा -इस्मत चुग़ताई यह उपन्यास एक मासूम लड़की के बारे में है जिसका नाम भी उसकी माँ ने मासूमा ही रखा था, लेकिन ज़माने ने जिसे बाद में नाम दिया-नीलोफ़र, और जो औरत होने से पहले ही ऐसी कुछ हो गई कि जो ख्शुद उसकी भी समझ से परे था। इस्मत चुग़ताई की सधी क़लम का यह शाहकार अपने वक़्त की उस औरत की अक्काशी करता है जिसके पास अगर ख्शूबसूरत जिस्म न हो, उसे चाहनेवाले पतिंगे न हों, तो वह कुछ नहीं रह जाती और अगर हों तो भूखे-भेड़ियों की हवस की गेंद बनकर रह जाती है। इस्मत इस उपन्यास में औरत की यह हौलनाक़ तस्वीर खींचकर जैसे हर युग की औरतों को चेता रही हैं और कहने की ज़रूरत नहीं कि इक्कीसवीं सदी की चमक-दमक से चौंधियाई हमारी असंख्य उदास, नीम अँधेरी गलियों में आज भी ऐसी मासूम रूहें परवान चढ़ रही हैं, जिनको अगर एक मज़बूत चारदीवारी नसीब न हो तो वे जाने किस राह पर लावारिस पत्थर का टुकड़ा होकर जा रहें, जहाँ कोई भी आता-जाता उनसे खेले और ठुकराकर चलता बने। नीलोफ़र होने के बाद मासूमा जिस मर्द-समाज के हवाले होती है, उसका रवैया औरत को लेकर आज भी वही है जो उत्तर-आधुनिकता और वैश्वीकरण के हड़बोंग से पहले था। इसलिए यह उपन्यास आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना उर्दू में प्रकाशित होने के समय था। इसके अलावा इस्मत आपा की क़िस्सागोई समाज और आदमी की गहरी पहचान, ज़बान की मास्टरी और अपने पात्रों की तस्वीर-निगारी की महारत भारतीय साहित्य की कालजयी विरासत है, जो इस उपन्यास में भी अपने शबाब पर है।

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    Ismat Chugtai

    जन्म : 21 जुलाई, 1915, बदायूँ (उत्तर प्रदेश)।

    इस्मत ने निम्न मध्यवर्गीय मुस्लिम तबक़े की दबी-कुचली-सकुचाई और कुम्हलाई लेकिन जवान होती लड़कियों की मनोदशा को उर्दू कहानियों व उपन्यासों में पूरी सच्चाई से बयान किया है।

    इस्मत चुग़ताई पर उनकी मशहूर कहानी लिहाफ़ के लिए लाहौर हाईकोर्ट में मुक़दमा चला, लेकिन ख़ारिज हो गया। गेन्दा उनकी पहली कहानी थी जो 1949 में उर्दू साहित्य की सर्वोत्कृष्ट साहित्यिक पत्रिका 'साक़ी’ में छपी। उनका पहला उपन्यास जि़द्दी 1941 में प्रकाशित हुआ। मासूमा, सैदाई, जंगली कबूतर, दिल की दुनिया, अजीब आदमी और बांदी उनके अन्य उपन्यास हैं। कलियाँ, चोटें, एक रात, छुई-मुई, दो हाथ दोज़ख़ी, शैतान आदि कहानी-संग्रह हैं। हिन्दी में कुँवारी व अन्य कई कहानी-संग्रह तथा अंग्रेजी में उनकी कहानियों के तीन संग्रह प्रकाशित जिनमें काली काफ़ी मशहूर हुआ। कई फि़ल्में लिखीं और जुनून में एक रोल भी किया। 1943 में उनकी पहली फि़ल्म छेड़-छाड़ थी। कुल 13 फि़ल्मों से वे जुड़ी रहीं। उनकी आखि़री फि़ल्म गर्म हवा (1973) को कई अवार्ड मिले।

    साहित्य अकादमी पुरस्कार के अलावा उन्हें 'इक़बाल सम्मान’, 'मख़दूम अवार्ड’ और 'नेहरू अवार्ड’ भी मिले। उर्दू दुनिया में 'इस्मत आपा’ के नाम से विख्यात इस लेखिका का निधन 24 अक्टूबर, 1991 को हुआ। उनकी वसीयत के अनुसार मुम्बई के चन्दनबाड़ी में उन्हें अग्नि को समर्पित किया गया।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
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