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Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna

Marxvadi, Samajshastriya Aur Aitihasik Alochna

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Special Price Rs. 360

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  • Pages: 173p
  • Year: 1992
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 10: 8171190685
  • ISBN 13: 9788171190683
  •  
    साहित्‍य की आलोचना केवल अन्तर्लक्ष्यी (Intrinsic) अथवा पाठ-केन्द्रित (Text Centered) आलोचना नहीं होती, अपितु वैसी बहिर्लक्ष्यी (Extrinsic) आलोचना भी होती है, जो पाठ से बाहर-पाठ के सम्यक् अवबोध के लिए - रचनाकार के जीवनवृत्त, उसके जीवन-दृष्टिकोण, उसके युग, उसके सामाजिक यथार्थ, उसकी परम्परा, उसकी संस्कृति आदि को सामाजिक सन्दर्भों में रखकर देखती- परखती और साहित्य का मूल्यांकन करती है । ऐसी आलो- चना शब्दों के जोड़-मात्र से बनी वैसी हर रचना को, जिसके पीछे ठोस वास्तविकता नहीं होती, वायवीय मानती है- 'शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्प:' (योगसूत्र) । हिन्दी में अब तक इसके सिद्धान्त पर तात्विक विवेचन और सार्थक बहस प्रस्तुत करने वाली एक भी पुस्तक नहीं है । ऐसे में पाश्चात्य साहित्य-सिद्धान्त के प्रति डा० शीतांशु के वर्षों के गहरे लगाव, सम्यक् अध्ययन और अनवरत चिन्तन से परिणामित उनकी यह पुस्तक हिन्दी में पहली बार बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों का तथ्यपूर्ण, प्रामाणिक उप- स्थापन करती क्रमश: मार्क्सवादी, समाजशास्त्रीय, साहित्‍ये- तिहास बनाम ऐतिहासिक और ऐतिहासिक आलोचना की स्वरूपगत मान्यताओं का समीचीन विवेचन प्रस्तुत करती है । पूर्वग्रहहीन सैद्धान्तिक निरूपण के साथ-साथ प्रतिमानों और निदर्शनों की बोध-व्याख्या इस पुस्तक की विशेषता है, जिससे बहुमुख अनुप्रयोग की दिशा भी सहज ही उजागर हो उठी है । प्रस्तुत पुस्तक यदि एक ओर मार्क्सवादी आलोचनात्मक चिंतन को रूढ़िवादी विवेचन-सीमा से आगे लाकर उसके उत्तरपक्षीय सैद्धान्तिक स्वरूप तक को निरूपित-व्यवस्थित करती है, तो दसरी ओर समाज में साहित्य की स्थितिगत पहचान वाली चकाचौंध से निकल कर समाजशास्त्रीय आलोचना के बतौर साहित्य मे निरूपित समाज की पहचान- प्रक्रिया की भी गंभीर विवेचना करती है; यदि एक ओर साहित्येतिहास बनाम ऐतिहासिक आलोचना की प्रकृति, सैद्धान्तिकी और प्रकार्य-प्रक्रिया को आलोिचत-प्रत्यालोचित करती है, तो दूसरी ओर उस ऐतिहासिक आलोचना को भी सावयव और सप्रमाण उपस्थापित करती है, जिसे कभी हिंदी के एक वरिष्ठ आलोचक ने फतवा देते हुए आलोचना के क्षेत्र से ही खारिज कर दिया था । तथ्यत: 'बहिर्लक्ष्यी आलोचना-सिद्धान्तों को जानने, पहचानने और मापने; साथ ही साहित्य को समझने और समझाने की दृष्टि से डॉ. शीतांशु की यह पुस्तक एक अनिवार्य पठनीय पुस्‍तक है, जिससे हिन्दी के एक बड़े अभाव की महत्वपूर्ण पूर्ति हो जाती हए ।

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    Pandey Shashibhushan Shitanshu

    पाण्डेय शशिभूषण 'शीतांशु'
    जन्म : 13 मई 1941
    शिक्षा : पी-एच. डी. (हिन्दी), डी. लिट् (भाषा- विज्ञान), स्नातकोत्तर डिप्लोमा (अनुवाद) ।
    व्यक्तित्व : सैद्धान्तिक और सर्जनात्मक आलोचक । साहित्य-सिद्धान्त, साहित्य-विश्लेषण और प्रत्यालोचन के लिए सिद्ध-प्रसिद्ध । व्यापक, गहन अध्ययन एवं मौलिक संदृष्टि से सम्पन्न भाषाविज्ञानी । प्रखर, तार्किक वक्ता एवं लेखक ।
    वृत्ति : अध्यापन 1961 - 77 भागलपुर विश्वविद्यालय सेवा में व्याख्याता । 1977- 85 गुरुनानकदेव विश्वविद्यालय (अमृतसर) में हिन्दी के वरिष्ठ रीडर । 1985 पूना विश्वविद्यालय (पुणे) में हिन्दी भाषा के प्रोफेसर । कुछ ही समय बाद 1985 में गुनाके, विश्वविद्यालय में हिन्दी के प्रोफेसर । 1986-  1989 वहीं हिन्दी विभाग में प्रोफेसर-अध्यक्ष ।  1992 - 1994 वहीं भाषा-संकाय के अधिष्ठाता ।  1992, 95 भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद भारत सरकार (नयी दिल्ली) द्वारा क्रमश: त्रिनिदाद और पेइचिंग के लिए विजिटिंग प्रोफेसर पद पर चयनित । फरवरी 200 -जनवरी 2007 महात्मा गाँधी अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय (वर्धा) में विजिटिंग प्रोफेसर । सम्पादन : 01 फरवरी 2007-30 अप्रैल  2008 वहीं वरिष्ठ अतिथि सम्पादक के बतौर तुलनात्मक साहित्य विश्वकोश (1350 पृष्ट) तैयार किया । जुलाई 2008 में विश्वकोश प्रकाशित ।
    उच्चतर शोध एवं शोध-निर्देशन : यूजीसी. (नई दिल्ली) द्वारा संभरित दो बृहत् शोध-परियोजनाएँ ससम्पन्न-1गुरुमुखी लिपि में उपलब्ध हिन्दी साहित्य : समाज-सांस्कृतिक अध्ययन, 2. रामचरितमानस : संकेत- विसंरचनात्मक शैलीवैज्ञानिक सन्दर्भ । अब तक 48 पी-एच. डी. एवं 57 एम.फिल. शोधार्थियों को अपने ससफल निर्देशनमें उउपाधि दिलायी।
    अवकाश-ग्रहण : 30 जून, 2001
    लेखन : अब तक प्रकाशित 300 से अधिक शोधपत्र एवं  26 पुस्तकें ।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna
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