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Madhya Prant Aur Barar Mein Adivasi Samsyayen

Madhya Prant Aur Barar Mein Adivasi Samsyayen

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  • Pages: 575p
  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126715190
  •  
    मध्यप्रांत और बरार के आदिवासियों की समस्या जनजातीय समाज की अवहेलना सदियों से की जाती रही है और मौजूदा समय में भी बरकरार है, जिनकी अनगिनत समस्याओं को दरकिनार कर उनकी जमीनों के मालिकाना हकों को उनसे सरकारी या गैर-सरकारी तरीकों से हड़पा जाता रहा है। उनकी कठिनाइयों और समस्याओं का सूक्ष्म दृष्टि से आकलन करता यह दस्तावेज हमारे सम्मुख उस जीवन-दृश्य को प्रस्तुत करता है, जो नारकीय है। प्रस्तुत पुस्तक मध्यप्रान्त और बरार में रहने वाले जनजातीय समाज की उन विषम समस्याओं से हमें अवगत कराती है कि कैसे समय-समय पर उनकी जमीनों, परम्पराओं, भाषाओं से अलग-थलग करके उन्हें ‘निम्न’ जाँचा गया है और कैसे उन्हें साहूकारी के पंजों में फँसाकर बँधुआ मजदूरी के लिए बाध्य किया गया है। यहाँ उनकी समस्याओं का एक गम्भीर विश्लेषण है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पशु-चिकित्सा आदि के नाम पर उन पर जबरन एक ‘सिस्टम’ थोपा गया जिससे उनकी समस्याएँ कम होने की बजाय और बढ़ी हैं। डब्ल्यू.वी. ग्रिग्सन की अंग्रेजी पुस्तक से अनूदित यह पुस्तक जहाँ एक तरफ जनजातीय समस्याओं पर केन्द्रित हिन्दी पुस्तकों के अभाव को दूर करती है, वहीं दूसरी ओर शोधकर्त्ताओं और समाज के उत्थान में जुटे कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन भी करती है।

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    W. V. Grigson

    डब्ल्यू. वी. ग्रिग्सन

    डब्ल्यू. वी. ग्रिग्सन एक आई.सी.एस. अधिकारी थे। वे सेंट्रल प्राविंसेज और बरार (अविभाजित मध्य प्रदेश का तत्कालीन नाम) में एबोरीजनल ट्राइब्स इंक्वायरी ऑफिसर बनाए गए थे और सन् 1940 से 42 तक इस पद पर रहे। उन्हें आदिम जातियों के बारे में जो कार्य-सूची दी गई थी वह बहुत लम्बी थी, जिसमें इन आदिम जातियों के संरक्षण, उनकी आर्थिक, शैक्षणिक, भौतिक और राजनीतिक कमियों का आकलन और उनका उपचार, भूमि धारण के उनके अधिकार, बंधक प्रथा, रसद, बेगार और मामूल जैसे शोषण, इन जनजातियों पर इंडियन पीनल कोड (भारतीय दंड संहिता) द क्रिमिनल एंड सिविल प्रोसीजर आदि का प्रभाव और उनके हितों के संरक्षण जैसे सन्दर्भ शामिल थे।

    ग्रिग्सन की छपी हुई रिपोर्ट के पृष्ठ पर सेसिल रोड्स का छोटा-सा उद्घोष वाक्य है, ‘‘कितना कम किया है, कितना अधिक बाकी है।’’ यह वाक्य अभी भी आदिवासियों के सन्दर्भ में उसी तीव्रता से लागू होता है।

    डब्ल्यू. वी. ग्रिग्सन उन लोगों में से एक थे जिन्होंने अपनी रिपोर्टों को सन्दर्भ ग्रन्थ के रूप में स्थापित  किया। इसकी उपयोगिता और प्रामाणिकता आज तक बरकरार है।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna
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