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भाषा-विज्ञान | Linguistics

Showing 10 books of 56 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Manav Aur Sanskriti

    Manav Aur Sanskriti

    Regular Price: Rs. 650

    Special Price Rs. 585

    10%

  2. Hindi Bhasha Ka Samajshastra

    Hindi Bhasha Ka Samajshastra

    Regular Price: Rs. 650

    Special Price Rs. 488

    25%

    प्रो. रविंद्रनाथ श्रीवास्तव भारतीय भाषा-समुदायों, विशेषकर हिंदी भाषा-समुदाय की संरचना को व्याख्यायित करने की ओर उन्मुख विद्वानों में अग्रणी रहे हैं ! 'हिंदी भाषा का समाजशास्त्र' पुस्तक की योजना ही नहीं, इसकी पूर्ण रूपरेखा भी उन्होंने अपने जीवन-काल में ही निर्मित कर ली थी ! प्रस्तुत पुस्तक हिंदी भाषा और उसकी बोलियों को व्यापक सामाजिक घटकों से सम्बद्ध करके देखती है ! यह अध्ययन निश्चित ही हिंदी भाषा-समुदाय से जुड़े अनेक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करता है ! अल्प-संख्यक भाषा-समुदायों की भाषाओँ का मिश्रण, स्थिर बहुभाषिकता का विकास, भाषा का मानकीकरण और आधुनिकीकरण, भाषा-विकास में भाषा-नियोजन की भूमिका आदि कुछ ऐसे ही प्रश्न हैं, जिन्हें हिंदी भाषा-समाज को केंद्र में रखकर प्रो. श्रीवास्तव ने उठाया है और उनकी विवेचना-व्याख्या की है ! पाठकों के सम्मुख यह पुस्तक रखते हुए हमें दुःख और संतोष दोनों का अहसास हो रहा है ! दुःख इस बात का कि यह पुस्तक उनके जीवनकाल में प्रकाशित न हो सकी, और संतोष यह है कि उनका यह महत्तपूर्ण अध्ययन पाठकों तक पहुँच पा रहा है ! आशा है, यह पुस्तक तथा इस श्रृंखला की अन्य पुस्तकें भी प्रो. श्रीवास्तव के भाषा-चिंतन को प्रभावशाली ढंग से अध्येताओं तक पहुंचाएगी और हिंदी भाषा के प्रति स्नेह एवं लगाव रखनेवाले मनीषी भाषाविद प्रो. रविंद्रनाथ श्रीवास्तव की स्मृति को ताजा रखेंगी !

    Out of stock

  3. Hindi Urdu Aur Hindustani

    Hindi Urdu Aur Hindustani

    Regular Price: Rs. 195

    Special Price Rs. 175

    10%

    प्रस्तुत पुस्तक हिन्दी, उर्दू और हिन्दुस्तानी भाषा समस्या पर लेखक के विचारों का संकलन है । हिन्दी उर्दू या हिन्दुस्तानी के नामभेद और स्वरूपभेद के कारणों पर विचार हो चुका । इनकी एकता और उसके साधनों का निर्देश भी किया जा चुका । जिन कारणों से भाषा में भेद बढ़ा, उनका दिग्दर्शन भी, संक्षेप और विस्तार के साथ हो गया । हिन्दी और उर्दू के सम्बन्ध में दोनों पक्ष के बड़े-बड़े विद्वानों की सम्मतियाँ सुन चुके । इन सब बातों का निष्कर्ष यही निकला कि प्रारम्भ में हिन्दी उर्दू दोनों एक ही थीं, बाद को जब व्याकरण, पिसल, लिपि और शैली भेद आदि के कारण दो भिन्न दिशाओं में पड़कर यह एक दूसरे से बिलकुल पृथक् होने लगीं, तो सर्वसाधारण के सुभीते और शिक्षा के विचार से इनका विरोध मिटाकर इन्हें एक करने के लिए भाषा की इन दोनों शाखाओं का संयुक्त नाम हिन्दुस्तानी' रखा गया । हिन्दी उर्दू का भण्डार दोनों जातियों के परिश्रम का फल है । अपनी-अपनी जगह भाषा की इन दोनों शाखाओं का विशेष महत्व है । दोनों ही ने अपने-अपने तौर पर यथेष्ट उन्नति की है । दोनों ही के साहित्य भण्डार में बहुमूल्य रत्न संचित हो गए हैं और हो रहे है । हिन्दी वाले उर्दू साहित्य से बहुत कुछ सीख सकते है । इसी तरह उर्दू वाले हिन्दी के खजाने से फायदा उठा सकते हैं । यदि दोनों पक्ष एक दूसरे के निकट पहुँच जाएँ और भेद बुद्धि को छोड्‌कर भाई-भाई की तरह आपस में मिल जाएँ तो वह गफलत फहमियाँ अपने आप ही दूर हो जाएँ, जो एक से दूसरे को दूर किए हुए हैं । ऐसा होना कोई मुश्किल बात नहीं है । सिर्फ मजबूत इरादे और हिम्मत की जरूरत है, पक्षपात और हठधर्मी को छोडूने की आवश्यकता है । बिना एकता के भाषा और जाति का कल्याण नहीं ।
  4. Hindi Bhasha Ka Udgam Aur Vikas

    Hindi Bhasha Ka Udgam Aur Vikas

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 450

    25%

    हिंदी भाषा का उद्गम और विकास प्रस्तुत पुस्तक 'हिंदी भाषा का उद्गम और विकास' में हिंदी का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण उपस्थित किया गया है ! विवेचन के लिए परिनिष्ठित हिंदी के रूप को लिया गया है ! हिंदी की विभिन्न बोलियों के सम्बन्ध में अब तक अल्प सामग्री ही प्रकाश में आई है ! पुस्तक को दो भागों में विभक्त किया गया है ! पूर्व पीठिका में भारोपीय से लेकर अपभ्रंश तथा संक्रतिकालीन भाषा की समग्री दी गयी है और उत्तरपीठिका में केवल हिंदी भाषा का ऐतिहासिक तथा तुलनात्मक व्याकरण दिया गया है ! पुस्तक की पूर्व पीठिका में भारोपीय वादिक संस्कृति, पालि-प्रकृत आदि के सम्बन्ध में जो समग्री दी गयी है उसे जाने बिना भाषा-विज्ञानं का अध्ययन करना व्यर्थ का परिश्रम करना है ! यह समग्री केवल हिंदी के भाषा विज्ञानं के अध्ययन करने वालों के लिए ही आवश्यक नहीं है अपितु पालि, प्राकृत तथा अपभ्रंश के भी प्रारंभिक अध्ययन के लिए आवश्यक है ! आशा है हिंदी के अतिरिक्त संस्कृत एवं पालि-प्रकृत के विद्यार्थी भी इससे लाभ उठायेंगे !
  5. Bhartiya Puralipi

    Bhartiya Puralipi

    Regular Price: Rs. 295

    Special Price Rs. 221

    25%

    भारतीय पुरालिपि लेखक : राजबली पाण्डेय पुरालिपि-शास्त्र बड़ा ही रोचक विषय है। यह लिपि के विकास का अध्ययन सम्मुख रहता है। श्री डब्ल्यू. जी. बुहलर और महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा के बाद पुरालिपि के क्षेत्र में अनेक महत्त्वपूर्ण खोज हुए हैं। मोहनजोदड़ों और हड़प्पा की खुदाइयों के बाद इस क्षेत्र में क्रान्तिकारी और नयी स्थापनाएँ हुई हैं। इन स्थानों से प्राप्त सामग्रियों से भारतीय लेखन-कला की प्राचीनता और उसकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में बड़ा विवाद उठ खड़ा हुआ है। इस हालत में भारतीय पुरालिपि पर एक ऐसी पुस्तक की बड़ी उपयोगिता है। इस पुस्तक ने पुरालिपि क्षेत्र के तीस वर्षों का व्यवधान पाटने का काम किया है। प्रस्तुत पुस्तक में प्राचीन काल से सन् १२०० ई. तक भारतीय लेखन-कला का इतिहास प्रस्तुत है। विषय को सुगम बनाने के लिए क्रमबद्ध प्रकरणों में उसका विवेचन प्रस्तुत है। अंत में आवश्यक सारणियाँ भी दी गयी हैं। पुरालिपि-शास्त्र के छात्रों, भावी शोधकर्ताओं और अनुसंधित्सु पाठकों के लिए यह ग्रंथ विशेष उपयोगी है।

    Out of stock

  6. Sarkari Karyalayo Mein Hindi Ka Prayog

    Sarkari Karyalayo Mein Hindi Ka Prayog

    Regular Price: Rs. 350

    Special Price Rs. 263

    25%

    सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग गोपीनाथ श्रीवास्तव यह पुस्तक तीन भागों में विभाजित है¬—पहले भाग में सैद्धान्तिक रूप से टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त-लेखन, मुद्रण-फलक-शोधन विषयों पर सविस्तार विचार प्रकट किये गये हैं। दूसरे भाग में, नमूनों द्वारा शुभ टिप्पणी, प्रालेख लिखने की विधि को बताया गया है। साथ में यह भी बताया गया है कि बहुधा अशुद्धियाँ किन-किन स्थलों पर होती हैं और क्यों होती हैं। प्रत्येक अवसर पर प्रयुक्त होने वाले पत्रों के प्रतिमित प्रपत्र भी पुस्तक में दे दिये गये हैं। इनके प्रयोग से कर्मचारियों का बहुत कुछ नैत्यक प्रकार का कार्य सुगमता से सम्पन्न हो सकेगा। तीसरे भाग में, सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिये गये हैं। प्रस्तुत पुस्तक ‘सरकारी कार्यालयों में हिन्दी का प्रयोग’ तीन भागों में विभाजित किया गया है। पहले भाग में टिप्पण, प्रालेखन, संक्षिप्त लेखन और मुद्रण-फलक-शोधन पर सविस्तार प्रकाश डाला गया है। दूसरे भाग में परिशिष्ट है जिसमें दोषयुक्त और शुद्ध टिप्पणी के नमूने, विभिन्न प्रकार के प्रालेखों के नमूने, संक्षिप्त-लेखन के नमूने, मुद्रण-शोधन के नमूने, कतिपय प्रतिमित प्रालेख, प्रपत्र और सन्देश आदि दिये गये हैं। तीसरे भाग में सरकारी कार्य में व्यवहृत विदेशी भाषाओं के वाक्यांश और उनके हिन्दी पर्याय दिये गये हैं। मुझे आशा है कि यह पुस्तक उपयोगी और राजकीय कार्यों में हिन्दी की प्रगति बढ़ाने में सहायक सिद्ध होगी।
  7. Prayojanmoolak Hindi

    Prayojanmoolak Hindi

    Regular Price: Rs. 460

    Special Price Rs. 415

    10%

    स्वतंत्र भारत में हिंदी विविध रूपों में प्रयुक्त होती है ! इस पहलू का अध्ययन 'प्रयोजनमूलक अध्ययन' कहलाता है ! बम्बइया बाजार में ग्राहक दूकानदार से कहता है-"हम को फ्रेश भाजी मांगता है !" यह भी हिंदी है ! स्वस्थ्य-विज्ञान का निम्नलिखित वाकया भी हिंदी है-"मानव का रक्तचाप संतुलित रखना स्वस्थ्य के लिए आवश्यक है !" हिंदी भाषा के ऐसे विविध प्रयोजनों में अब प्रशासन सबसे महत्तपूर्ण हो गया है ! स्वतंत्र भारत की सरकार ने हिंदी को राजभाषा का पद दिया तो उसके प्रशासनिक स्वरुप का अध्ययन जोरों से होने लगा ! इसी के फलस्वरूप अब प्रकाशन-क्षेत्र में प्रयोजनमूलक हिंदी पर कई पुस्तके मिलती हैं ! डॉ. लता की यह पुस्तक इस दिशा की नवीनतम रचना है ! लता वर्षों से प्रयोजनमूलक हिंदी सिखाती रही है ! अतएव उसने बहुत से प्रमाणिक ग्रंथो का मनन-मंथन करके यह नवनीत निकाला है ! अनुभवी प्राध्यापिका ने छात्रों की जरूरत पहचानकर उनसे न्याय किया है ! उसकी भाषा स्पष्ट व् सरल है ! तकनिकी लेखन की यह पहली शर्त है !
  8. Rashtrabhasha Hindi Samasyaen Aur Samadhan

    Rashtrabhasha Hindi Samasyaen Aur Samadhan

    Regular Price: Rs. 275

    Special Price Rs. 206

    25%

    राष्ट्रभाषा हिन्दी समस्याएँ और समाधान हिन्दी राष्ट्रभाषा बन गई, राजभाषा का दर्जा भी पा गयी, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि स्वतन्त्रता के साठ वर्ष बाद भी उसकी राह के रोड़े और समस्याएँ कमोबेश बनी हुई हैं। समस्याएँ अन्दरूनी भी हैं और बाह्य भी। अन्दरूनी समस्याओं का समाधान ढूँढ़ना तो भाषाविज्ञानियों और विद्वानों का ही है किन्तु बाह्य समस्याओं का समाधान पूरे राष्ट्र की मानसिक जागरूकता पर निर्भर करता है। भारत जैसे बहुजातीय, बहुभाषी देश में राष्ट्रभाषा की राह में रोड़े आना अस्वाभाविक नहीं है किन्तु जागरूक राष्ट्र के लिए उन्हें हल कर लेना भी कठिन नहीं है। प्रस्तुत पुस्तक के विद्वान् लेखक देवेन्द्र नाथ शर्मा ने राष्ट्रभाषा हिन्दी की सभी समस्याओं पर बड़ी गहराई से अध्ययन करके उनका समाधान खोजने का स्तुत्य प्रयास किया है। उन्होंने समस्याओं पर चिन्तन करने के पूर्व भाषा, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीयता के अन्तर्सम्बन्ध पर गहन विचार करने के पश्चात् हिन्दी के महत्त्व का गहराई से विवेचन किया है, जिससे इस भाषा के राष्ट्रभाषा का स्वरूप और उसकी अनिवार्यता पूरी तरह स्थापित हो जाती है। इसी सन्दर्भ में विद्वान् लेखक ने हिन्दी भाषा की सरलता का विवेचन किया है। किसी भाषा के राष्ट्रभाषा बनने के लिए उसका सरल होना एक अनिवार्य शर्त है। इस सम्बन्ध में विचार करते समय हिन्दी के और अधिक सरलीकरण पर भी विचार किया गया है।
  9. Anuvad Ki Samasyaen

    Anuvad Ki Samasyaen

    Regular Price: Rs. 495

    Special Price Rs. 445

    10%

    हिन्दी तथा विश्व की अन्य महत्वपूर्ण भाषाओं के बीच अनुवाद की भाषागत समस्याओं के बारे में यह द्विभाषी (हिन्दी अंग्रेजी) पुस्तक एक अन्तर्राष्ट्रीय परिचर्चा के रूप में पत्राचार द्वारा संकलित की गयी है । पुस्तक की परिकल्पना तथा परिचर्चा का आयोजन मुख्य रूप से कालीकट विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रो. जी. गोपीनाथन ने किया तथा इसके सह- सम्पादन में वहीं के अंग्रेजी विभाग के प्रो. एस. कंदास्वामी ने योग दिया । पुस्तक में 36 शोधपत्र हैं जिनमें अनुवाद के सिद्धान्त और व्यवहार से उत्पन्न होने वाली समस्याओं की विस्तृत चर्चा है और हिन्द तथा विश्व की अन्य प्रमुख भाषाओं के बीच अनुवाद कार्य पर विशेष बल दिया गया है । भारत में अनुवाद विभिन्न प्रकार की जिन व्यावहारिक कठिनाइयों का सामना करते हैं उनकी भी विस्तृत चर्चा इसमें शामिल है । हिन्दी भारत की सम्पर्क भाषा और भारत की मिली-जुली संस्कृति के सम्प्रेषण के माध्यम के रूप में तेजी से विकास कर रही है । हिन्दी तथा अन्य भाषाओं के बीच अनुवाद कार्य पिछले कुछ दशकों से गतिशील हुआ है । प्रस्तुत अध्ययन अनुवाद कार्य को बढ़ावा देने और अनुवाद के क्षेत्र में विकसित अध्ययन तथा शोध के सिलसिले में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक रूप से सहायक सिद्ध होगा । एशियाई भाषाओं में अनुवाद संबंधी अध्ययन एक नया विकसित होता क्षेत्र है और प्रस्तुत अध्ययन व्यावहारिक भाषा विज्ञान तथा साहित्यिक शोध के इस क्षेत्र में एक पहलकदमी है ।
  10. Hindi Pathanusandhan

    Hindi Pathanusandhan

    Regular Price: Rs. 250

    Special Price Rs. 188

    25%

    'हिंदी पाथानुसंधान' का यह दूसरा संस्करण है ! ऐसे शुष्क विषय की पुस्तक का दूसरा संस्करण होना इस बात का प्रमाण है कि यह पुस्तक पाठानुसंधान के क्षेत्र के विद्यार्थियों द्वारा पसंद की गयी ! कई विश्वविद्यालयों में एम्. ए. के विशेष प्रश्न-पत्र में पाठालोचन पढाया जाता है तथा हिंदी एम्.फिल में इसका एक अनिवार्य प्रश्न-पत्र है ! इस शोध-ग्रन्थ में हिंदी संपादन का इतिहास मुद्रण के पूर्व से आधुनिक काल तक दिया गया है ! पांडुलिपियों के लेखक भी अपने ढंग से कई प्रतियों का मिलान और पाठांतर देते थे ! मुद्रण प्रारंभ होने पर पहले तो पाण्डुलिपि को जैसा का तैसा छाप देना प्रारंभ हुआ और बाद में विद्वानों ने उपलब्ध सभी प्रतियों में से सबसे उपयुक्त लगने वाला पाठ देते थे ! ग्रियर्सन के समय से यह कार्य परिश्रमपूर्वक संपादन में देखा गया और बहुत सी कृतियाँ सुन्दर पाठ की सामने आई ! 1942 से डॉ. माता प्रसाद गुप्त ने पश्चिमी देशों की वैज्ञानिक पद्दति से पाठ-संपादन का कार्य शुरू किया और अनेक विद्वानों ने इसे अपनाया भी ! इन सभी महत्वपूर्ण संपादनों का आलोचनात्मक अध्ययन इस पुस्तक में किया गया है ! आचार्य विश्नाथ प्रसाद मिश्र ने इसके सम्बन्ध में लेखक को पत्र लिखा था कि इस दिशा में हिंदी में बहुत कम काम हुआ है, आपने एक अभाव की पूर्ति की है !

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