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कानून | Law

Showing 8 books of 8 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Bachapan Se Balatkar

    Bachapan Se Balatkar

    Regular Price: Rs. 350

    Special Price Rs. 263

    25%

    बचपन से बलात्कार- महिला कानूनों के जानकर और समाज तथा अदालत दोनों जगह स्त्री-सम्मान की सुरक्षा पर पैनी और सतर्क निगाह रखनेवाले लेखक व् न्यायविद अरविन्द जैन यह पुस्तक बलात्कार के सामाजिक, वैधानिक और नैतिक पहलुओ को गहरी और मुखर न्याय-संवेदना के साथ देखती है! इस किताब की मुख्य चिंता यह है कि समाज के सांस्कृतिक चौखटे में जड़ी स्त्री-देह घरों और घरों से बाहर जितनी वध्य है, दुर्भाग्य से बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद कानुक की हिफाजत में भी उससे कुछ ज्यादा सुरक्षित नहीं है ! न सिर्फ यह कि समाज के पुरुष-वर्चस्व की छाया कानूनी प्रावधानों में भी न्यस्त है, बल्कि उनको कार्यान्वित करनेवाले न्यायालयों, जजों, वकीलों आदि की मनो-सांस्कृतिक संरचना में भी जस की तस काम करती दिखाई देती है ! पुस्तक में पंद्रह आलेख है ! परिशिष्ट में कुछ जरूरी जानकारियां है ! विशेषता यह है कि अरविन्द जैन ने पूरी सामग्री को व्यापक स्त्री विमर्श से जोड़ा है ! न्याय और अस्मिता रक्षा के लिए प्रतिबद्ध उनकी विचारधारा भाषा को नया तेवर देती है !
  2. Bachapan Se Balatkar

    Bachapan Se Balatkar

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    बचपन से बलात्कार महिला कानूनों के जानकर और समाज तथा अदालत दोनों जगह स्त्री-सम्मान की सुरक्षा पर पैनी और सतर्क निगाह रखनेवाले लेखक व् न्यायविद अरविन्द जैन यह पुस्तक बलात्कार के सामाजिक, वैधानिक और नैतिक पहलुओ को गहरी और मुखर न्याय-संवेदना के साथ देखती है! इस किताब की मुख्य चिंता यह है कि समाज के सांस्कृतिक चौखटे में जड़ी स्त्री-देह घरों और घरों से बाहर जितनी वध्य है, दुर्भाग्य से बलात्कार की शिकार हो जाने के बाद कानुक की हिफाजत में भी उससे कुछ ज्यादा सुरक्षित नहीं है ! न सिर्फ यह कि समाज के पुरुष-वर्चस्व की छाया कानूनी प्रावधानों में भी न्यस्त है, बल्कि उनको कार्यान्वित करनेवाले न्यायालयों, जजों, वकीलों आदि की मनो-सांस्कृतिक संरचना में भी जस की तस काम करती दिखाई देती है ! पुस्तक में पंद्रह आलेख है ! परिशिष्ट में कुछ जरूरी जानकारियां है ! विशेषता यह है कि अरविन्द जैन ने पूरी सामग्री को व्यापक स्त्री विमर्श से जोड़ा है ! न्याय और अस्मिता रक्षा के लिए प्रतिबद्ध उनकी विचारधारा भाषा को नया तेवर देती है !
  3. Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

    Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

    Regular Price: Rs. 200

    Special Price Rs. 150

    25%

    सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस सांप्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए । हाल के वर्षों में इस विषय पर एक व्यापक समझ तैयार करने में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी व प्रतिष्ठित लेखक विभूति नारायण राय का यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है । श्री राय ने यह अध्ययन नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के लिए एक वर्ष के गहन परिश्रम के बाद पूरा किया था । दुर्भाग्य से, इसकी कुछ स्थापनाओं को छिपाने–दबाने की कोशिश भी की गई । इसको प्रकाश में लाने का श्रेय नेशनल अकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी को जाता है, जिसने इसे सबसे पहले प्रकाशित किया । मेरी राय है कि प्रशासन और पुलिस के तमाम अधिकारियों के लिए इस पुस्तक का पठन–पाठन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए । µपदम रोशा, पुलिस महानिदेशक (सेवानिवृत्त) सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस–व्यवहार पर यह एक ठोस, विश्वसनीय और आधिकारिक अध्ययन है–––लेखक का यह कहना एकदम सही है कि पुलिस में काम करने वाले लोग उसी समाज से आते हैं जिसमें सांप्रदायिकता के विषाणु पनपते हैं, उनमें वे सब पूर्वग्रह, घृणा, संदेह और भय होते हैं जो उनका समुदाय किसी दूसरे समुदाय के प्रति रखता है । पुलिस में भर्ती होने के बावजूद वे खुद को अपने ‘सहधार्मिकों’ के ‘हम’ में शामिल रखते हैं और दूसरे समुदाय को ‘वे’ मानते रहते हैं । µए–जी– नूरानी (फ्रंटलाइन में) गृह मंत्रालय और पुलिस ब्यूरो ऑफ रिसर्च एंड डेवलेपमेंट तथा अपने सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित यह शोध बताता है कि प्रत्येक दंगे के 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम होते हैं और जो लोग गिरफ्“तार किए जाते हैं उनमें भी लगभग 90 प्रतिशत अल्पसंख्यक ही होते हैं । श्री राय के अनुसार, ‘‘यह तर्क–विरुद्ध है । अगर 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम हैं तो होना यह चाहिए कि गिरफ्“तार लोगों में 70 प्रतिशत हिंदू हों । लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है ।’’ µसिबल चटर्जी (आउटलुक में)
  4. Upbhokta Adaltein Swaroop Evam Sambhavnaen

    Upbhokta Adaltein Swaroop Evam Sambhavnaen

    Regular Price: Rs. 225

    Special Price Rs. 169

    25%

    उपभोक्ता अदालतें: स्वरूप एवं संभावनाएँ अपार सम्भावनाओं से भरा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लगभग एक समानान्तर न्याय व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। उपभोक्ता इस कानून से अनभिज्ञ नहीं रह गया है तथापि इन अदालतों के स्वरूप, न्याय- प्रक्रिया आदि की विधिवत जानकारी के लिए अभी अपेक्षित पद्धति विकसित नहीं हो पाई है। कुछ गैर- सरकारी संस्थाएँ इस दिशा में मुखर हैं व इस अधिनियम के दैनंदिन सशक्तीकरण का बहुत श्रेय इन संस्थाओं को जाता है किन्तु अब स्थिति यह नहीं रही कि केवल जन-जागृति से ही सन्तोष कर लिया जाए। आवश्यकता अब इस बात की भी है कि उपभोक्ता कानूनों की शिक्षा भी अब विधिवत् रूप से शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से दी जाए। इस आवश्यकता को सभी स्तरों पर अनुभव किया जा रहा है। इस पुस्तक के माध्यम से एक छोटा-सा प्रयास किया गया है कि हम उपभोक्ता के पास जा सकें, उन्हें यह सामान्य जानकारी दे सकें कि वास्तव में उपभोक्ता अदालतें हैं क्या? जब हम यह दावा करते हैं कि उपभोक्ता न्यूनतम खर्च करके बिना वकीलों के सहयोग के अपनी बात अपनी भाषा में स्वयं इस अदालत में रख सकता है तो उपभोक्ता के लिए पहली आवश्यकता यह जानने की हो जाती है कि कैसे और कहाँ? इन सभी प्रश्नों के समाधान के लिए इस पुस्तक को कैसे और कहाँ से ही प्रारम्भ किया गया है और फिर क्या- क्या, कितने विषय, कैसी शिकायतें - सब जानकारियों को सिलसिलेवार देने का प्रयास किया गया है।
  5. Upbhokta Adaltein Swaroop Evam Sambhavnaen

    Upbhokta Adaltein Swaroop Evam Sambhavnaen

    Regular Price: Rs. 95

    Special Price Rs. 71

    25%

    उपभोक्ता अदालतें: स्वरूप एवं संभावनाएँ अपार सम्भावनाओं से भरा उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम लगभग एक समानान्तर न्याय व्यवस्था का स्वरूप ग्रहण करता जा रहा है। उपभोक्ता इस कानून से अनभिज्ञ नहीं रह गया है तथापि इन अदालतों के स्वरूप, न्याय- प्रक्रिया आदि की विधिवत जानकारी के लिए अभी अपेक्षित पद्धति विकसित नहीं हो पाई है। कुछ गैर- सरकारी संस्थाएँ इस दिशा में मुखर हैं व इस अधिनियम के दैनंदिन सशक्तीकरण का बहुत श्रेय इन संस्थाओं को जाता है किन्तु अब स्थिति यह नहीं रही कि केवल जन-जागृति से ही सन्तोष कर लिया जाए। आवश्यकता अब इस बात की भी है कि उपभोक्ता कानूनों की शिक्षा भी अब विधिवत् रूप से शिक्षण संस्थाओं के माध्यम से दी जाए। इस आवश्यकता को सभी स्तरों पर अनुभव किया जा रहा है। इस पुस्तक के माध्यम से एक छोटा-सा प्रयास किया गया है कि हम उपभोक्ता के पास जा सकें, उन्हें यह सामान्य जानकारी दे सकें कि वास्तव में उपभोक्ता अदालतें हैं क्या? जब हम यह दावा करते हैं कि उपभोक्ता न्यूनतम खर्च करके बिना वकीलों के सहयोग के अपनी बात अपनी भाषा में स्वयं इस अदालत में रख सकता है तो उपभोक्ता के लिए पहली आवश्यकता यह जानने की हो जाती है कि कैसे और कहाँ? इन सभी प्रश्नों के समाधान के लिए इस पुस्तक को कैसे और कहाँ से ही प्रारम्भ किया गया है और फिर क्या- क्या, कितने विषय, कैसी शिकायतें - सब जानकारियों को सिलसिलेवार देने का प्रयास किया गया है।
  6. Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

    Sampradayik Dange Aur Bhartiya Police

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस सांप्रदायिक दंगों को प्रशासन की एक बड़ी असफलता के रूप में लिया जाना चाहिए । हाल के वर्षों में इस विषय पर एक व्यापक समझ तैयार करने में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी व प्रतिष्ठित लेखक विभूति नारायण राय का यह अध्ययन बहुत महत्त्वपूर्ण है । श्री राय ने यह अध्ययन नेशनल पुलिस अकादमी, हैदराबाद के लिए एक वर्ष के गहन परिश्रम के बाद पूरा किया था । दुर्भाग्य से, इसकी कुछ स्थापनाओं को छिपाने–दबाने की कोशिश भी की गई । इसको प्रकाश में लाने का श्रेय नेशनल अकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन, मसूरी को जाता है, जिसने इसे सबसे पहले प्रकाशित किया । मेरी राय है कि प्रशासन और पुलिस के तमाम अधिकारियों के लिए इस पुस्तक का पठन–पाठन अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए । पदम रोशा, पुलिस महानिदेशक (सेवानिवृत्त) सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस–व्यवहार पर यह एक ठोस, विश्वसनीय और आधिकारिक अध्ययन है–––लेखक का यह कहना एकदम सही है कि पुलिस में काम करने वाले लोग उसी समाज से आते हैं जिसमें सांप्रदायिकता के विषाणु पनपते हैं, उनमें वे सब पूर्वग्रह, घृणा, संदेह और भय होते हैं जो उनका समुदाय किसी दूसरे समुदाय के प्रति रखता है । पुलिस में भर्ती होने के बावजूद वे खुद को अपने ‘सहधार्मिकों’ के ‘हम’ में शामिल रखते हैं और दूसरे समुदाय को ‘वे’ मानते रहते हैं । ए–जी– नूरानी (फ्रंटलाइन में) गृह मंत्रालय और पुलिस ब्यूरो ऑफ रिसर्च एंड डेवलेपमेंट तथा अपने सर्वेक्षण से प्राप्त आँकड़ों के विस्तृत विश्लेषण पर आधारित यह शोध बताता है कि प्रत्येक दंगे के 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम होते हैं और जो लोग गिरफ्“तार किए जाते हैं उनमें भी लगभग 90 प्रतिशत अल्पसंख्यक ही होते हैं । श्री राय के अनुसार, ‘‘यह तर्क–विरुद्ध है । अगर 80 प्रतिशत शिकार मुस्लिम हैं तो होना यह चाहिए कि गिरफ्“तार लोगों में 70 प्रतिशत हिंदू हों । लेकिन ऐसा कभी होता नहीं है ।’’ सिबल चटर्जी (आउटलुक में)
  7. Balatkar Aur Kanoon

    Balatkar Aur Kanoon

    Regular Price: Rs. 75

    Special Price Rs. 56

    25%

    ‘बलात्कार’ और कानून स्त्राी के प्रति किया जाने वाला जघन्य अपराध है। इस अपराध के ज्यादातर मामले दर्ज नहीं होते या दर्ज भी होते हैं तो साक्ष्य के अभाव में अपराधी छूट जाते हैं। यह पुस्तक विधि एवं न्याय के अतिरिक्त सामाजिक तौर पर इस अपराध के खिलाफ जमीन तैयार करती है। बलात्कार से लड़ना है तो सबसे पहले उसके पीछे काम कर रहे मनोविज्ञान से टकराना होगा यानी सवर्ण मानसिकता, पुरुश-सत्ता और वर्गीय सोच, इन तीनों को खुलकर चुनौती देनी होगी। विधि विषेशज्ञ रंजीत वर्मा की इस पुस्तक का उद्देष्य है समाज को इस अपराध के प्रति जागरूक बनाना, पीड़िता के बयान और सच्चाई की जाँच, चिकित्सकीय जाँच में देरी के खतरे, अदालतों के फैसलों से टकराते समाज के फैसले तथा अभियुक्त को उसके किए की सजश दिलाना। साथ ही पीड़िता को आर्थिक, सामाजिक और कानूनी मदद दिलवाना।
  8. Balatkar Hone Par

    Balatkar Hone Par

    Regular Price: Rs. 60

    Special Price Rs. 45

    25%

    बलात्कार होने पर इस पुस्तक का एक मात्रा उद्देश्य है समाज को इस अपराध के प्रति जागरूक बनाना, यह बताना कि खुद का बचाव कैसे किया जाए यदि यह हादसा हो ही जाए किसी के साथ तो, उसकी किस तरह मदद की जाए, उसके आर्थिक, सामाजिक एवं कानूनी पक्ष को कैसे संभाला जाए। इनकी जानकारी के अभाव में हम अपना रुख पीड़िता के विरुद्ध कर लेते हैं, उसी को सजा देते हैं, उसका अपमान करके, उससे किनारा करके जबकि उसे वैसे भी सहारे की जरूरत सबसे ज्यादा होती है। The aim of this book is to make the society aware of this crime. To tell the people how to save them of this crime and if at, all something like this happens to someone how to help her, how to protect her economic, social and legal rights. In absence of knowledge, we turn our back towards the victims, we punish her by insulting her where as we have to take care of an injured person.

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