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Jungle Jungle Loot Machi Hai

Jungle Jungle Loot Machi Hai

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  • Pages: 118p
  • Year: 2005
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 8183610501
  •  
    जंगल जंगल लूट मची है आदिवासी हमारे समाज के, हमारी जमीन के सबसे पुराने, सबसे दमदार और प्रकृति से सबसे अच्छा सम्बन्ध रखकर जीनेवाले लोग हैं। देश में कथित विकास का क्रम जब से शुरू हुआ है उसकी मार सबसे ज्यादा आदिवासियों ने उठाई है। सघन जंगलोें के सिमटने के बावजूद इन आदिवासियों ने हार नहीं मानी है। क्योंकि भारतीय उपमहाद्वीप के आदिवासी चिरंतन बागी और लड़ाकू हैं। पहाड़ों और जंगलों में कुदरती संसाधनों की बदौलत वे ज्यादा अच्छा, समानता भरा और तनावमुक्त जीवन जीते हैं। चूँकि वे प्रकृति सेे ज्यादा करीब हैं, यही वजह है कि वे जल-जमीन-जंगल से अच्छा तालमेल बिठाकर रहते हैं। अमरेन्द्र किशोर की यह पुस्तक जंगल जंगल लूट मची है इन्हीं मुद्दों का विस्तृत लेखा-जोखा है। लेखक का यह मानना है कि कथित विकास का खामियाजा सबसे ज्यादा इन्हीं आदिवासियों को भुगतना पड़ा है। इन वनवासियों की पुश्तैनी जमीन, टोला और वनदेवता लीलने के बाद विकास का तक्षक इनके अस्तित्व को भी डँस रहा है। तभी तो आजादी के बाद हमारे यहाँ के लगभग दो करोड़ आदिवासी विस्थापित होकर नारकीय जीवन जीने को मजबूर हुए हैं। अमरेन्द्र किशोर लम्बे समय से आदिवासियों के प्रति गहरी हमदर्दी से और उनसे जुड़े मुद्दों पर लिखते-पढ़ते रहे हैं। अब अपनी संस्था इन्ट्वाट के माध्यम से काम भी कर रहे हैं। दक्षिण पूर्व एशिया के कई देशों में जाकर वहाँ अपनी सेवाएँ देते रहे हैं - चाहे इण्डोनेशिया के कभी मुंड आखेटक रहे डायक आदिवासी हों या बांग्लादेश के मुरू जनजाति के लोग। बचपन से ही वनवासियों के बीच रह चुके अमरेन्द्र बड़ी संजीदगी से आदिवासी समाज के बारे में सोचते हैं और वैसा ही करते हैं। तभी तो इस समुदाय का ज्यादा पीड़ित हिस्सा अर्थात् औरतें, उनके प्रति लेखक की चिन्ता ज्यादा प्रबल ढंग से आती है। अमरेन्द्र ने कई मुद्दों पर मुल्क के मीडिया को दिशा दी है। खासतौर से उड़ीसा की चालीस हजार अविवाहित किशोरियों के मातृत्व का मुद्दा ऐसा ही है। इस किताब में आए ज्यादातर निबन्ध गहरी भावुकता के साथ लिखे गए हैं। ये लेख आदिवासी जीवन के किसी न किसी नए और अचर्चित हिस्से पर रोशनी डालते हैं। इन्हें एक साथ देखना ज्ञान, समझ और संवेदना बढ़ानेवाला अनुभव है। - अरविन्द मोहन

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    Amrendra Kishore

    जन्म: 8 जून, 1971 को पटना में हुआ। बचपन कैमूर की दुर्गम पहाड़ियों में बीता, क्योंकि इनके पिता श्री कृष्णदेव नारायण पांडेय 1972 से 1980 तक उसी वन्य अंचल के आदिवासी आवासीय विद्यालयों में सेवारत रहे। बाद में अमरेंद्र ने सासाराम के शांति प्रसाद जैन महाविद्यालय से स्नातक (अंग्रेजी) की पढ़ाई पूरी की।

    अमरेंद्र किशोर करीब 23 सालों से जन और वन के अन्योन्य रिश्तों की वकालत कर रहे हैं। ग्रामीण विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जन सहभागिता की विभिन्न गतिविधियों में संलग्न अमरेंद्र ने सामाजिक वानिकी, रोजगारपरक तकनीक और स्थानीय स्वशासन से आम जनता को जोड़ने  में अपना खास योगदान दिया है। देश के दुर्गम इलाकों में सामाजिक लामबंदी और बेहतर आर्थिक स्थिति बहाली के मंसूबे लेकर 175 से ज्यादा परियोजनाओं का कुशल कार्यान्वयन और सफल निष्पादन कर चुके हैं। उड़ीसा की अनब्याही माताओं, झारखंड से महानगरों में भेजे जानेवाली वनपुत्रियों तथा जनजातीय विरोधी सरकारी नीतियों जैसे कई मुद्दों पर अमरेंद्र किशोर ने मुल्क के मीडिया को दिशा दी है। अमरेंद्र को देश के सात राज्यों के अलावा बांग्लादेश के बंदरवन-रंगामाटी और इण्डोनेशिया के कलिमंटन इलाकों में सामाजिक कार्यों का खास अनुभव है।

    अभी तक इनकी छः किताबें आजादी और आदिवासी, सत्ता-समाज और संस्कृति, पानी की आस (सभी निबंध संग्रह), जंगल-जंगल लूट मची है (हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा पुरस्कृत निबंध संग्रह), ये माताएँ अनब्याही (केस स्टडी) और माँ नाराज क्यों है (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके अलावा वन-जन और सामाजिक मुद्दों पर इनके 500 से कहीं ज्यादा लेख-रिपोर्ट और फीचर हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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