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व्याकरण | Grammer

Showing 10 books of 10 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Manak Hindi Ka Vyavharparak Vyakaran

    Manak Hindi Ka Vyavharparak Vyakaran

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 540

    10%

    हिंदी भाषा हिंदी की समस्त बोलियों के समुच्चय की बोधक है। जिस तरह नदी की सहायिकाएँ अपनी अलग सत्ता रखते हुए भी नदी की मुख्यधारा से अपना नित्य संबंध निभाती हैं, उसी तरह भाषा की बोलियाँ भी अपना पृथक अस्तित्व बनाए रखकर भाषा की अंतर्धारा से अपना संबंध सजीव किए रहती हैं। भाषा का मानक रूप एक बहुग्राही सम्मिश्र रूप होता है। उसकी सैर दूर-दूर तक और गलियारों तक में होती है, इसलिए वह हर जगह से कुछ न कुछ ग्रहण करती चलती है। अनेक क्षेत्रों के शब्दादि और विशिष्ट अर्थ प्राय: उसमें प्रविष्ट होते रहते हैं। जिन रूपों और प्रयोगों को सभी लोग शुद्ध मानते हुए उनका केवल एक रूप स्वीकार करते हैं, उनके बारे में कोई भी कह देगा कि वे मानक हैं। लेकिन नए-पुराने तर्कों और रूपों के आधार पर कभी-कभी एकाधिक रूप या प्रयोग भी चलन में होते हैं। विख्यात भाषा वैज्ञानिक रमेश चंद्र महरोत्रा की यह पुस्तक भाषा प्रयोग की ऐसी ही व्यावहारिक समस्याओं पर प्रकाश डालते हुए आम पाठक से लेकर भाषा को माध्यम के रूप में प्रयोग करनेवाले बुद्धिजीवियों तक के लिए एक निर्देशिका के रूप में काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
  2. Hindi Kriyaon Ki Roop-Rachana

    Hindi Kriyaon Ki Roop-Rachana

    Regular Price: Rs. 395

    Special Price Rs. 355

    10%

    हिंदी के आरंभिक व्याकरण यूरोपीय विद्वानों ने लिखे थे ! इन व्याकरणों को लिखने में उन्होंने वही पद्दति अपनायी, जिसमे उनके अपने व्याकरण लिखे गए थे ! लौटिन पद्दति के उन व्याकरणों में पदों का वर्गीकरण अर्थमूलक आधार पर ही होता था ! बाद में जब हिंदी भाषाभाषी विद्वानों ने व्याकरण लिखे तो उन्होंने भी जाने-अनजाने पूर्वलिखित व्याकरणों को आधार बनाया ! भारतीय प्राचीन पद्दति पदों का विवेचन तथा वर्गीकरण उनकी रूप-रचना के आधार पर ही करती थी ! विश्वविख्यात 'अष्टा ध्यायी' इसका ज्वलंत प्रमाण है ! प्रस्तुत पुस्तक में क्रियापदों के सभी वर्गीकरण पदों की रूप-रचना पर ही आधारित हैं ! एकपदीय और द्विपदीय क्रियापद, विकारी और अविकारी क्रियापद, क्रत्रि अनुगामीऔर कर्मादि-अनुगामी क्रियापद, क्रित्रवाच्य और कर्मादिवाच्य क्रियापद आदि सभी वर्गीकरणों का आधार पूर्णतः उनकी रूप-रचना ही है !
  3. Vyakaran Pradeep

    Vyakaran Pradeep

    Regular Price: Rs. 100

    Special Price Rs. 75

    25%

    Out of stock

  4. Hindi Vyakaran

    Hindi Vyakaran

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 540

    10%

    प्रस्तुत पुस्तक 'हिन्दी व्याकरण' में व्याकरण की उपयोगिता और आवश्यकता बतलाई गई है, तथापि यहाँ इतना कहना उचित जान पड़ता है कि किसी भाषा के व्याकरण का निर्माण उसके साहित्य की पूर्ति का कारण होता है और उसकी प्रगति में सहायता देता है । भाषा की सत्ता स्वतन्त्र होने पर भी व्याकरण उसका सहायक अनुयायी बनकर उसे समय और स्थान-स्थान पर जो आवश्यक सूचनाएँ देता है, उससे भाषा का लाभ होता है । यह व्याकरण अधिकांश में, अंग्रेजी व्याकरण के ढंग पर लिखा गया है । इस प्रणाली के अनुसरण का मुख्य कारण यह है कि हिन्दी में आरम्भ ही से इसी प्रणाली का उपयोग किया गया है और आज तक किसी लेखक ने संस्कृत प्रणाली का कोई पूर्ण आदर्श उपस्थित नहीं किया । वर्तमान प्रणाली के प्रचार का दूसरा कारण यह है कि इसमें स्पष्टता और सरलता विशेष रूप से पाई जाती है और सूत्र तथा भाष्य, दोनों ऐसे मिले रहते हैं कि पूरा व्याकरण, विशद रूप में लिखा जा सकता है । इस पुस्तक में अधिकांश में वही पारिभाषिक शब्द रखे गए है, जो हिन्दी में, 'भाषाभास्कर' के द्वारा प्रचलित हो गए हैं । यथार्थ में ये सब शब्द संस्कृत व्याकरण के हैं, जिससे और भी कुछ शब्द लिये गये हैं । थोड़े-बहुत आवश्यक पारिभाषिक शब्द मराठी तथा बंगला भाषाओं के व्याकरणों से लिए गए है और उपर्युक्त शब्दों के अभाव में कुछ शब्दों की रचना लेखक द्वारा स्वयं की गयी है ।
  5. Hindi Vyakaran

    Hindi Vyakaran

    Regular Price: Rs. 130

    Special Price Rs. 117

    10%

    प्रस्तुत पुस्तक 'हिन्दी व्याकरण' में व्याकरण की उपयोगिता और आवश्यकता बतलाई गई है, तथापि यहाँ इतना कहना उचित जान पड़ता है कि किसी भाषा के व्याकरण का निर्माण उसके साहित्य की पूर्ति का कारण होता है और उसकी प्रगति में सहायता देता है । भाषा की सत्ता स्वतन्त्र होने पर भी व्याकरण उसका सहायक अनुयायी बनकर उसे समय और स्थान-स्थान पर जो आवश्यक सूचनाएँ देता है, उससे भाषा का लाभ होता है । यह व्याकरण अधिकांश में, अंग्रेजी व्याकरण के ढंग पर लिखा गया है । इस प्रणाली के अनुसरण का मुख्य कारण यह है कि हिन्दी में आरम्भ ही से इसी प्रणाली का उपयोग किया गया है और आज तक किसी लेखक ने संस्कृत प्रणाली का कोई पूर्ण आदर्श उपस्थित नहीं किया । वर्तमान प्रणाली के प्रचार का दूसरा कारण यह है कि इसमें स्पष्टता और सरलता विशेष रूप से पाई जाती है और सूत्र तथा भाष्य, दोनों ऐसे मिले रहते हैं कि पूरा व्याकरण, विशद रूप में लिखा जा सकता है । इस पुस्तक में अधिकांश में वही पारिभाषिक शब्द रखे गए है, जो हिन्दी में, 'भाषाभास्कर' के द्वारा प्रचलित हो गए हैं । यथार्थ में ये सब शब्द संस्कृत व्याकरण के हैं, जिससे और भी कुछ शब्द लिये गये हैं । थोड़े-बहुत आवश्यक पारिभाषिक शब्द मराठी तथा बंगला भाषाओं के व्याकरणों से लिए गए है और उपर्युक्त शब्दों के अभाव में कुछ शब्दों की रचना लेखक द्वारा स्वयं की गयी है ।

    Out of stock

  6. Navshati Hindi Vyakaran

    Navshati Hindi Vyakaran

    Regular Price: Rs. 350

    Special Price Rs. 263

    25%

    नवशती हिंदी व्याकरण हमारी भाषा की सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि इसमें भाषा को निर्मित और विकसित करने वाले देशज तत्त्वों की घोर उपेक्षा की जाती है। रचनात्मक साहित्य का एक हिस्सा भले ही ऐसा नहीं हो लेकिन, शेष लेखन पर तो अंग्रेजी भाषा का प्रभाव साफ दिखलाई पड़ता है। कहन और शैली ही नहीं, भाषा के स्वरूप का ज्ञान कराने वाला हमारा व्याकरण भी अंग्रेज़ी भाषा के व्याकरणिक ढाँचे से आवश्यकता से अधिक जकड़ा हुआ है। हालांकि, पिछले कुछ दशकों से हिन्दी की प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुरूप व्याकरण प्रस्तुत करने के प्रयास होने लगे हैं। लेखक की इस पुस्तक को इसी प्रयास के क्रम में देखा जाना चाहिए। भाषाविद् तथा कोशकार के रूप में ख्यातिप्राप्त कर चुके बदरीनाथ कपूर ने हिन्दी की स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप व्याकरण की रचना करके यह प्रमाणित किया है कि हिन्दी दुनिया की अन्य विकसित भाषाओं की तुलना में अधिक व्यवस्थित होने के साथ-साथ सरल और लचीली भी है। यह एक मात्र ऐसी भाषा है जिसके अधिकतर नियम अपवादविहीन हैं। इस पुस्तक से गुजरते हुए सहज ही यह एहसास होता है कि व्याकरण नियमों का पुलिंदा भर नहीं होता, वह भाषा-भाषियों की ज्ञान-गरिमा, बुद्धि-वैभव, रचना-कौशल, संदर्भबोध और सर्जनक्षमता का भी परिचायक होता है। हिन्दी का यह सर्वथा नवीन व्याकरण सिर्फ छात्रों के लिए ही उपयोगी नहीं होगा, यह उन जिज्ञासुओं को भी राह दिखाएगा जो भाषा की आत्मा तक पहुँचना चाहते हैं।
  7. Hindi Vyakaran Mimansa

    Hindi Vyakaran Mimansa

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 540

    10%

    व्याकरण छ: वेदांगों में से एक है । वह वेद का मुख है । अत: भारत में उसके अध्ययन की प्राचीनता उतनी ही है जितनी वेदों की । आज से कम से कम अढ़ाई हजार वर्ष पूर्व तो पाणिनि ने उसे पूर्णता तक पहुँचा दिया था । व्याकरण में वर्णों के उच्चारण, शब्दों की रचना और रूप रचना तथा वाक्यों की रूप रचना पर विचार होता है । वह भाषा का उच्चारण और रूप रचनामूलक अध्ययन करता है । दूसरे शब्दों में, वह शब्द-प्रधान है, अर्थ-प्रधान नहीं । इसीलिए उसे शब्दानुशासन या शब्दशास्त्र भी कहते हैं । पश्चिम के ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं । वे वर्णों के तो केवल लिपिगत रूप पर विचार करते हैं । शब्दों का वर्गीकरण उनके अर्थ के आधार पर करते हैं : अमुक बोधक, तमुक वाचक आदि । वाक्य में रूप-रचना का भी ध्यान रखते हैं पर प्रधानता विश्लेषण की ही होती है जो प्रकार्य अर्थ प्रधान होती है-क्रिया, सका कर्ता, कर्म, पूरक आदि । सार यह कि ग्रामर अर्थ-प्रधान होते हैं, व्याकरण शब्द-प्रधान । हिन्दी आदि सीखने के लिए विदेशियों ने ग्रामर बनाए, दुर्भाग्य से उन्हें ही व्याकरण कहा जाने लगा । बाद में ब्‍लूफील्ड आदि ने भाषा के अध्ययन की व्याकरणिक शैली अपनाई पर उसे ग्रामर नहीं कहा, संरचनात्मक भाषिकी आदि कहा । उनकी भाषिकी व्याकरण है । इसीलिए उन्होंने ग्रामर नहीं कहा 1 प्रस्तुत रचना में डी. दीमशिन्स, कामता प्रसाद गुरु और किशोरीदास वाजपेयी के व्याकरणों की समीक्षा के व्यपदेश से व्याकरण का विषय क्षेत्र तो स्पष्ट किया ही गया है, सच्चे हिन्दी व्याकरण की रूपरेखा भी दी गई है; ऐसे व्याकरण बनेंगे तो भाषा अध्ययन की सही दिशा मिलेगी । जो ग्रामरी शैली को ठीक समझें, वे ग्रामर पढ़ें उघैर लिखें भी, पर उन्हें व्याकरण न कहें? व्याकरण की वही परिभाषा रहने दें जो चार-पाँच हजार वर्ष से रही है ।
  8. Abhinav Hindi Vyakaran

    Abhinav Hindi Vyakaran

    Regular Price: Rs. 395

    Special Price Rs. 355

    10%

    यह पुस्तक केवल पुस्तक ही नहीं है बल्कि एक ऐसी व्याकरण अभ्यास-पुस्तिका है जिसे पढ़ने के बाद आप बखूबी समझ जाएँगे कि इसे आप तक पहुँचाने की आवश्यकता क्यों पड़ी । शिरोरेखा किसे कहते हैं; यह क्यों आवश्यक है; नुक्ता क्या है; बिन्दु-चन्द्रबिन्दु का प्रयोग कब-कब किया जाता है; श को कैसे-कब लिखा जाता है; ड/ड़ और ढ/ढ; में क्या अन्तर है; वर्णमाला कैसे याद की जाए; बारहखड़ी से मात्राएँ किस प्रकार सीखी जा सकती हैं; संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया किसे कहते हैं, सन्धि क्या है; समास किसे कहते हैं? -आदि छोटे-छोटे बिन्दुओं की जानकारी के साथ पत्र लिखने की कला पर भी प्रकाश डाला गया है । व्याकरण को गणित के माध्यम से समझने और पढ़ने का तरीका बताया गया है । जैसे- (1) संज्ञा के भेद-3; (2) सर्वनाम के-6 (3X2=6) (3) विशेषण के-4 (6-2=4) आदि । संविधान द्वारा स्वीकृत 18 भाषाओं को वर्ण वर्ग के हिसाब से 3,4,3,5, 3 (=18) में बाँटा गया है । पुस्तक में सर्वत्र मानक वर्तनी का प्रयोग किया गया है ।

    Out of stock

  9. Vakya Sanrachana Aur Vishleshan : Naye Pratiman

    Vakya Sanrachana Aur Vishleshan : Naye Pratiman

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 270

    10%

    वाक्य संरचना और विश्लेषण: नए प्रतिमान हिंदी की प्रकृति और प्रवृत्ति को जानना-समझना डॉ. बदरीनाथ कपूर का व्यसन रहा है। बेसिक हिंदी, परिष्कृत हिंदी व्याकरण, हिंदी व्याकरण की सरल पद्धति तथा नवशती हिंदी व्याकरण आदि पुस्तकें इसी व्यसन की सूचक हैं। नवशती हिंदी व्याकरण में कुछ नई प्रस्थापनाएँ भी की गई थीं जो परम्परा से हटकर थीं। प्रस्तुत पुस्तक क्रियाओं के सम्बन्ध में डेढ़-दो वर्षों में किये गए उनके चिन्तन का सुफल परिणाम है। उनका मानना है कि क्रियापदों में ही ऐसे सूत्र निहित हैं जिनके आधार पर वाक्य की संरचना की जा सकती है। उन्होंने इन सूत्रों को ‘क्रिया-निर्देश’ की संज्ञा दी है। कुल सूत्र चालीस हैं और पाँच-पाँच सूत्रों के इनके आठ सर्ग हैं। इन्हीं के आधार पर इस पुस्तक में हिंदी वाक्यों की - विशेषतः सरल वाक्यों की - संरचना करने का प्रयास किया गया है। इस पुस्तक में वाक्य-संरचना और विश्लेषण दोनों साथ-साथ दिये गए हैं जिससे स्पष्ट हो कि क्रिया- निर्देशों और नवशती हिंदी व्याकरण की स्थापनाओं (दोनों) का उद्देश्य एक है। हिंदी वाक्य-संरचना के नये प्रतिमान प्रस्थापित करने वाली डॉ. बदरीनाथ कपूर की यह महत्त्वपूर्ण पुस्तक हिंदी भाषा की सूत्रबद्धता को स्थापित करती है और सिद्ध करती है कि हिंदी एक सुचिंतित और सुनियोजित भाषा है। हिंदी भाषा की अस्मिता और गरिमा की वृद्धि करनेवाली इस महत्त्वपूर्ण कृति का संयोजन वैज्ञानिक और गणितीय पद्धति पर हुआ है। छात्रों-अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी।
  10. Hindi Bhasha Ka Vrihat Eitihasik Vyakaran

    Hindi Bhasha Ka Vrihat Eitihasik Vyakaran

    Regular Price: Rs. 750

    Special Price Rs. 563

    25%

    हिन्दी भाषा का वृहत ऐतिहासिक व्याकरण आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी साहित्येतिहास के उद्भट विद्वान थे, चार चर्चित उपन्यासों और अनेक निबन्धों की रचना करके उन्होंने स्वयं को एक संवेदनशील रचनाकार के रूप में भी सिद्ध किया, इसके साथ ही भाषा-व्यवहार और विज्ञान पर भी उन्होंने बराबर कार्य किया जिसका प्रमाण यह ग्रन्थ है। आचार्य द्विवेदी का अभी तक अप्रकाशित यह ग्रन्थ व्याकरण पर उनकी एक दीर्घ कार्य-योजना का हिस्सा है। उनकी यह अध्ययन-परियोजना चार खंडों में पूरी हुई थी, लेकिन दुर्भाग्यवश इस खंड के अलावा बाकी तीन खंड फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं जिनकी खोज जारी है। इस ग्रन्थ में आचार्य द्विवेदी ने संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण की सोदाहरण व्याख्या करते हुए उनका वर्गीकरण किया है। विभिन्न कालखंडों के कवियों-रचनाकारों द्वारा किए गए प्रयोगों को उद्धृत करते हुए उन्होंने इस ग्रन्थ में सम्बन्धित विषय को अत्यन्त ग्राह्य शैली में प्रस्तुत किया है। शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों और जिज्ञासु पाठकों के लिए एक आवश्यक ग्रन्थ।

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