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नाट्य-चिन्तन | Drama Studies

Showing 10 books of 21 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Hindi Natak Ke Paanch Dashak

    Hindi Natak Ke Paanch Dashak

    Regular Price: Rs. 550

    Special Price Rs. 413

    25%

    हिंदी रंगमंच की परंपरा सन 1880 में पसरी थिएटर के माध्यम से आरम्भ होकर 1930 में समाप्त मानी जाती है, लेकिन स्वातंत्रयोत्तर हिंदी नाटकों के इतिहास में रंगमंचीय नाटकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है ! स्वातंत्रयोत्तर हिंदी नाटकों का आधुनिक दृष्टि से मूल्यांकन करने के लिए भाव-बोध और शिल्प्बोध, इन दोनों ही पहलुओं का अध्ययन आवश्यक है ! इस पुस्तक में समकालीन रंग-परिदृश्य के सन्दर्भ में स्वातंत्रयोत्तर हिंदी नाटकों में निहित आधुनिकता-बोध का अध्ययन, विवेचन और विश्लेषण किया गया है, और हिंदी रंग-नाटक की विशिष्ट उपलब्धियों एवं संभावनाओं को भारतीय और पाश्चात्य रंगमंचीय संदर्भो में जांचने-परखने की कोशिश भी हा ! आधुनिक हिंदी नाटक की प्रमुख विशेषताओं और प्रवृत्तियों के रेखांकन के साथ अंतिम डॉ अध्यायों में प्रस्तुत 'रंगानुभूति और रंगमंचीय परिवेश ' तथा 'रंग-भाषा की तलाश : उपलब्धि और सम्भावना' जैसे अत्यंत महत्तपूर्ण, प्रासंगिक और जटिल विषयों के विवेचन नाटक के गंभीर अध्येताओं के साथ-साथ शायद रंगकर्मियों के लिए भी उपयोगी सिद्ध होंगे !
  2. Parsi Theater : Udbhav Evam Vikash

    Parsi Theater : Udbhav Evam Vikash

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 540

    10%

    डॉ. सोमनाथ गुज ने सन् 1947 में हिन्दी नाटक साहित्य का इतिहास लिखा था । प्रस्तुत रचना में यथास्थान यह बताया गया है कि विक्टोरिया थियोट्रिकल मण्डली की स्थापना से पहले भी पारसियों और गैर-पारसियों की मण्डलियाँ नाटक किया करती थीं परन्तु बड़े और सुदृढस्‍तर पर नाट्यकला को प्रतिष्ठित करने का श्रेय विक्टोरिया, एलफिनस्‍टन और जोरास्ट्रियन नाटक मण्डलियों को ही था । इनके सम्बन्ध में गुजराती के साप्ताहिक पत्र ' रास्तगोफ्तार ', में थोड़ी-बहुत जानकारी मिलती है । इसके सम्पादक कैखुसरो कावराजी स्वयं नाटककार, निर्देशक और अभिनेता थे । अंग्रेजी के ' बाम्बे टाइम्स ' और ' बाम्बे कूरियर एण्ड टेलिग्राफ ' की पुरानी फाइलें अनेकों सूचनाओं से भरी पड़ी हैं । महाराष्ट्र सरकार के ' आलेख और पुरातत्व विभाग' की सामग्री जीर्ण-शीर्ण है । सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण गुजराती साप्ताहिक ' कैसरेहिन्द ' है । इसी पत्र में धनजी भाई नसरवानजी पटेल के पारसी नाटक सम्बन्धी अनेकों लेख निरन्तर रूप से प्रकाशित हुए थे । इन लेखों में अधिकांशत: पारसी अभिनेताओं की चर्चा है । कुछ नाटक मण्डलियों, उनके मालिकों और निर्देशकों का विवरण भी आ गया है । जहाँगीर खम्बाता की रचना ' मारो नाटकी अनुभव ' भी बड़ी उपयोगी सिद्ध हुई है । सभी नाटक मण्डलियाँ जहाँगीर की अभिनय-कला और निर्देशन शक्ति का लोहा मानती थी । सबसे अधिक उपयोगी और प्रमाणित वे दीबाचे (भूमिकाएँ) है जो किसी-किसी नाटक के आदि में मिलते हैं । इन दीबाचों से यह पता चलता है कि नाटक किसने लिखा? किस नाटक मण्डली के लिए लिखा? कब उसका प्रकाशन हुआ? तथा नाटककार का नाटक-विशेष के लिए क्या दृष्टिकोण है? प्रस्तुत कृति में सभी प्राप्य और दुधार सामग्री का उपयोग किया गया है । ऐसा ग्रंथ हिन्दी में पारसी थियेटर पर नहीं लिखा गया जिसमें मूलभूत स्रोतों पर अवलम्बित इतनी अधिक सामग्री मिलती हो ।
  3. Natakkar Jagdish Chandra Mathur

    Natakkar Jagdish Chandra Mathur

    Regular Price: Rs. 250

    Special Price Rs. 188

    25%

    नाटककार जगदीशचन्द्र माथुर जयशंकर प्रसाद के बाद जगदीशचन्द्र माथुर की नाट्य कृतियाँ एक नई दिशा की ओर संकेत करती हैं । उनकी पहली कृति कोणार्क को आधुनिक नाटक का ऐसा प्रस्थान–बिन्दु माना जाता है जहाँ हिन्दी नाटक एक नए बोध के लिए आकुल हो रहा था । उन पर लिखी गोविन्द चातक की यह पुस्तक माथुर के कृतित्व को कई कोणों से देखने–परखने का एक प्रयास है । जिसमें नाट्य–रचना की मूल प्रेरणा, नाटककार की अनुभूति, युग और समाज– बोध, मानवीय संवेदना और नाटककार का जीवन– दर्शन तथा समकालीन ह्रासोन्मुखी प्रवृत्तियों से जूझने की क्षमता तक पहुँचने की सार्थक कोशिश की गई है । इस दृष्टि में यह पुस्तक पाठक को नाटककार की सर्जनात्मक क्षमता और भावात्मक परिवेश दोनों से अवगत कराती है ।
  4. Hindi Natak

    Hindi Natak

    Regular Price: Rs. 400

    Special Price Rs. 300

    25%

    भारत का राष्ट्रीय आन्दोलन वस्तुत: आम सहमतियों और व्यापक संयुक्त मोर्चों एवं सम्मिलित जन-आन्दोलन को लेकर राजनीतिशास्त्र की दुनिया में एक 'नई गतिकी' को निर्मित करता है, यह विश्व इतिहास में एक नई कड़ी है। गांधी विमर्श तो न केवल भारत में अपितु पूरे विश्व में बड़े दमखम के साथ चल रहा है पर जवाहरलाल के बारे में इस दौर में कुछ ही पुस्तकें बाजार में आ रही हैं, गांधी-नेहरू साझा विमर्श एक देर से ही सही लेकिन निहायत ही मौजूँ सिलसिला है। वैश्वीकरण के आक्रामक दौर में नेहरू जो एक स्वतंत्र वैकल्पिक अर्थतंत्र और राज्य सत्ता के स्थपति थे उन्हें भुला देना अस्वाभाविक नहीं लगता है। इस दौर में मौजूदा राज्य सत्ता से लेकर प्रमुख विपक्ष तक ने वैश्वीकरण और उदारीकरण को स्वीकार कर लिया है। साम्प्रदायिकता की तस्वीर में भी 1992 और 2002 के बाद शताब्दियों से चल रही मुश्तरका संस्कृति में दीमक लग गयी है। गनाटक एक श्रव्य-दृश्य काव्य है, अत: इसकी आलोचना के लिए उन व्यक्तियों की खोज जरूरी है जो इसके श्रव्यत्व और दृश्यत्व को एक साथ उद्घाटित कर सकें। वस्तु, नेता और रस के पिटे-पिटाए प्रतिमानों से इसका सही और नया मूल्यांकन संभव नहीं है और न ही कथा-साहित्य के लिए निर्धारित लोकप्रिय सिद्धांतों–कथावस्तु, चरित्र, देशकाल, भाषा, उद्देश्य से ही इसका विवेचन संभव है। प्रसाद के नाटकों में कुछ लोगों ने अर्थ प्रकृतियों, कार्यावस्थाओं और पंच संधियों को खोजकर नाट्यालोचन को विकृत कर रखा था। यह यंत्रगतिक प्रणाली किसी काम की नहीं है। इस पुस्तक में इन समीक्षा-पद्धतियों को अस्वीकार करते हुए पूर्व-पश्चिम की नवीनतम विकसित समीक्षा-सरणियों का आश्रय लिया गया है। लेखक का केंद्रीय विवेच्य है नाटक की नाट्यमानता। नाटक की भाषा हरकत की भाषा होती है, क्रियात्मकता की भाषा होती है। इसी से नाटक को विशिष्ट रूप मिलता है और वह सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों को उजागर करती है। इसी से नाटककार की ऐतिहासिक विश्वदृष्टि का भी पता चलता है। हिंदी के कुछ शिखरों—अंधेर नगरी, स्कंदगुप्त, ध्रुवस्वामिनी, अंधायुग, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे पर विशेष ध्यान दिया गया है जो आज भी महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं।ांधी को तो वैश्वीकरण के स्टीमरोलर ने बेरहमी से जमींदोज कर दिया है। ऐसे दौर में गांधी-नेहरू के ऐतिहासिक साझा और उनके कृतित्व पर पुन: रोशनी पडऩी चाहिए। प्रस्तुत पुस्तक दो महान स्वप्नद्रष्टाओं की यथार्थसम्मत विचारधारा को सप्रमाण रेखांकित करती है।
  5. Jaishankar Prasad: Rangshrishti-2

    Jaishankar Prasad: Rangshrishti-2

    Regular Price: Rs. 750

    Special Price Rs. 675

    10%

    जयशंकर प्रसाद के नाटक जिस कलात्मक तलाश की ओर संकेत करते हैं, उसमें व्यंजित होनेवाले वादी–विवादी दृश्यात्मक स्वर हमेशा से रंगकर्मियों और नाट्य–अध्येताओं के लिए चुनौती का विषय रहे हैं । अनेक रंगकर्मियों ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए, प्रसाद के समय से आज तक, अपने–अपने तरीके से, प्रायोगिक मंचन द्वारा उनके नाटकों के साथ रचनात्मक रिश्ता बनाने का प्रयास किया है । इन विभिन्न प्रयोगों द्वारा प्रसाद के रंगमंच की एक ऐसी रूपरेखा उभर रही है, जिसको प्रस्थान–बिंदु मानकर आगे का रास्ता तय किया जा सकता है । इसी उद्देश्य से रंग–अध्येता महेश आनंद ने इस पुस्तक में, प्रसाद के नाटकों से संबं/िात अहम सवालों को कुरेदते हुए, उनकी प्रस्तुतियों की प्रामाणिक सूचनाओं एवं महत्त्वपूर्ण प्रस्तुतियों के विस्तृत विवेचन के मा/यम से रंगकर्मियों के प्रयासों के अनेक पड़ावों को रेखांकित किया है । विभिन्न प्रस्तुतियों से जुड़े निर्देशकों के वक्तव्यों, साक्षात्कारों, पत्रों और दुर्लभ समीक्षाओं के मा/यम से प्रसाद की नाट्यकला तथा रंगकर्मियों की अंतर्दृष्टि का एक नया रूप उभरता है । वर्षों के अथक परिश्रम से एकत्रित महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ोंµदृश्य–रचना, वेशभूषा, रंगोपकरणों के रेखांकनों, स्मारिकाओं, प्रस्तुतियों के छायाचित्रों, पोस्टरोंµके द्वारा प्रसाद के नाटकों की रंगयात्रा की पहचान कराई गई है । एक तरह से यह सामग्री प्रसाद के मंचित नाटकों के रंग–इतिहास के साथ–साथ शौकिया मंडलियों की एक अंतरंग झलक भी प्रस्तुत करती है । हिंदी में प्रकाशित यह पहली पुस्तक है, जिसमें किसी नाटककार की रंगसृष्टि के विविध रूपों से साक्षात्कार करने की प्रक्रिया में प्रलेखन (डॉक्यूमेंटेशन) का महत्त्व दिखाया गया है । पुस्तक के पहले भाग जयशंकर प्रसाद % रंगदृष्टि में प्रसाद के रंग–परिवेश तथा रंग–चिंतन का विश्लेषण करते हुए उनके नाटकों के शिल्प और रंग–संभावनाओं को रेखांकित किया गया है ।

    Out of stock

  6. Rangmanch ke Siddhant

    Rangmanch ke Siddhant

    Regular Price: Rs. 600

    Special Price Rs. 450

    25%

    रंगमंच के सिद्धान्त हिन्दी में एक ऐसी पुस्तक की लम्बे समय से प्रतीक्षा थी जो पूर्व और पश्चिम में प्रचलित नाट्य सिद्धान्तों को एक स्थान पर और सुग्राह्य भाषा में उपलब्ध कराती हो। ‘रंगमंच के सिद्धान्त’ इसी उद्देश्य की पूर्ति करती है। समकालीन रंगमंच के अध्येता महेश आनन्द तथा रंगकर्म के व्यावहारिक और सैद्धान्तिक पक्षों का एक-सी निष्ठा के साथ निर्वाह करते आ रहे सुपरिचित रंगकर्मी देवेन्द्र राज अंकुर के कुशल संपादन में तैयार इस पुस्तक में अरस्तू से लेकर भारतेन्दु और फिर बादल सरकार तक के रंग सिद्धान्तों का विवेचन अधिकारी विद्वानों और रंगकर्मियों द्वारा किया गया है। यह पुस्तक बताती है कि रंगमंच केवल किसी नाट्य कृति को अभिनेताओं द्वारा मंच पर खेल देना भर नहीं होता। समाज, मनुष्य, उसकी मनोरचना और नियति के साथ रंगमंच के सम्बन्ध को लेकर हर युग में चिन्तक और रंगकर्मी चिन्तन-मनन करते रहे हैं और मानव-जीवन की एक अधिकाधिक विश्वसनीय प्रतिकृति के रूप में रंगकर्म को स्थापित करने के लिए नई-नई शैलियाँ ढूँढ़ते और विकसित करते रहे हैं। उन तमाम सिद्धान्तों-शैलियों को प्रस्तुत करने की कोशिश की गई है जो अपने समय में रंगकर्म के लिए दिशा-निर्देशक बने और आज भी हमारी सोच को उत्तेजित करते हैं। जिन विचारकों के सिद्धान्तों का विश्लेषण किया गया है, वे हैं: अरस्तू, स्तानिस्लाव्स्की, मेयरहोल्ड, आर्तो, ब्रेष्ट, क्रेग, माइकेल चेख़व, ग्रोतोव्स्की, पीटर ब्रुक, ज़ेआमि, भरत, भारतेन्दु, प्रसाद और बादल सरकार।
  7. Rangmanch Ka Soundyashastra

    Rangmanch Ka Soundyashastra

    Regular Price: Rs. 250

    Special Price Rs. 188

    25%

    रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र देवेन्द्र राज अंकुर देवेन्द्र राज अंकुर ने अपनी इस पुस्तक में रंगमंच को सौन्दर्यशास्त्रीय दृष्टि से देखा है। यह पुस्तक रंगमंच के सौन्दर्यशास्त्र को व्याख्यायित करनेवाली हिन्दी में अपने ढंग की पहली पुस्तक है। यह सच है कि हिन्दी रंगमंच के प्रसिद्ध आलोचक नेमिचन्द्र जैन ने नाट्य-आलोचना पर केन्द्रित अपनी कृतियों में नाटक के सौन्दर्य-शास्त्र की अवधारणा को विकसित करने में मत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई लेकिन देवेन्द्र राज अंकुर की इस पुस्तक में ही सर्वप्रथम रंगमंच के सौन्दर्यशास्त्र को ठोस आधार मिला और इसकी सर्वांगीण विवेचना हुई। ‘रंगमंच का सौन्दर्यशास्त्र’ ऐसी पुस्तक है जो प्रमाणित करती है कि नाटक और रंगमंच के सौन्दर्यशास्त्रीय प्रतिमान किसी दूसरे कला-माध्यम का मिश्रित रूप नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र और पृथक अस्तित्ववाला सौन्दर्यशास्त्र है। यह पुस्तक प्रकारान्तर से यह सवाल भी उठाती है कि नाटक और रंगमंच में लिखित आलेख और उसकी प्रस्तुति का क्या कोई अलग-अलग सौन्दर्यशास्त्र होना चाहिए? अथवा दोनों के लिए एक शास्त्र से काम चल सकता है? नाटक व उसकी प्रस्तुति से पहले रंगमंच के सौन्दर्यशास्त्र पर एक संवाद आरम्भ करने की कोशिश भी है यह पुस्तक।
  8. Padhte Sunte Dekhte

    Padhte Sunte Dekhte

    Regular Price: Rs. 400

    Special Price Rs. 300

    25%

    पढ़ते सुनते देखते यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि हिन्दी परिदृश्य में देवेन्द्र राज अंकुर हमारे समय के सबसे विश्वसनीय और सक्रिय रंग-चिंतक हैं। वे जिस दृष्टि से समकालीन रंगकर्म को देख रहे हैं, वह कहीं से उधार ली हुई नहीं, उनके अपने रंगानुभव से अर्जित की हुई है। अपनी बात को वे आम पाठक के, तक़रीबन बातचीत के, मुहावरे में कहते हैं। शायद यही कारण है कि रंगमंच के छात्र, रंगकर्मी, दर्शक और सामान्य पाठक - सभी उन्हें बड़े प्रेम और भरोसे के साथ पढ़ते रहे हैं। हिन्दी में रंगमंच विषयक अच्छी और समकालीन सरोकारों से लैस पुस्तकों के अभाव को भी उन्होंने काफ़ी हद तक पूरा किया है। यह पुस्तक नाटक के पाठ को पढ़ने, नाटककार की ज़बानी उसे सुनने और अंत में निर्देशक के हाथों से गुज़रने के बाद देखने - इन तीनों चरणों से होकर गुज़रती है। कोई संवादपरक पाठ नाटक कैसे बनता है, अभिनेताओं द्वारा खेले गये किसी खेल को कब एक सफल प्रस्तुति कहा जाए, मंच के लिए अव्यावहारिक मानी जाती रही नाट्य रचनाएँ कैसे किसी कल्पनाशील निर्देशक के हाथों में आकर यादगार मंच रचनाएँ हो गईं और किन-किन व्यक्तियों ने बाक़ायदा संस्थाओं की हैसियत से भारतीय रंगमंच को नई पहचान व अस्मिता दी, उनकी रचना-प्रक्रिया क्या रही - यह सब पढ़ते सुनते देखते की विषयवस्तु है। इधर कई विश्वविद्यालयों में थिएटर को एक विषय के रूप में भी पढ़़ाया जाना शुरू किया गया है। इस लिहाज से यह पुस्तक विशेष महत्त्व रखती है। हमें पूरा विश्वास है कि सिद्धान्त और व्यवहार के बीच से अपना रास्ता तलाश करती यह पुस्तक उन सबके लिए उपादेय साबित होगी जो वर्तमान हिन्दी रंगमंच की सम्यक् समझ हासिल करना चाहते हैं।
  9. Ekatra : Asankalit Rachnayen

    Ekatra : Asankalit Rachnayen

    Regular Price: Rs. 550

    Special Price Rs. 495

    10%

    यह पुस्तक मोहन राकेश की कुछ आरम्भिक-अज्ञात कुछ अल्प-ज्ञात, कुछ आधी-अधूरी और कुछ पूरी-परिपक्व एवं चर्चित, किंतु पुस्तक रूप में अब तक अप्रकाशित, लगभग सम्पूर्ण रचनाओं का अनूठा संकलन है । इसमें छपे आत्म-कथ्य, साक्षात्कार, नाट्‌य-लेख, एकांकी उपन्यास, कहानी, संस्मरण, डायरी, पत्र, फिल्मालेख, ध्वन्यावलोकन-प्रयोग, निबंध, समीक्षा, कविता और बाल-साहित्य के माध्यम से राकेश के बहुआयामी व्यक्तित्व एवं कृतित्व के अनेक पहलू पहली बार एक साथ उद्‌घाटित हुए हैं । यह पुस्तक राकेश के रोमांचक जीवन-वृत्त के प्रामाणिक प्रस्तुतीकरण के साथ-साथ 1941 में लिखे उनके सर्वप्रथम एकांकी समझ का फेर' से लेकर 1 97०- 72 में नेहरू फैलोशिप के दौरान लिखे गए शोध-लेख शब्द और ध्वनि' तथा यात्रा-संस्मरण मकबरे और आज ' तक उनके लगभग सम्पूर्ण रचना-जीवन का व्यापक प्रतिनिधित्व करती है । कश्मीर की रोमानी पृष्ठभूमि पर आधारित राकेश का चर्चित किंतु अप्रकाशित उपन्यास काँपता हुआ दरिया' झेलम के माँझियों के संघर्षपूर्ण जीवन का रोचक वास्तविक और मार्मिक चित्र प्रस्तुत करता है तो उनकी डायरियों. एवं फाइलों से प्राप्त अछूती सामग्री उनकी जटिल रचना-प्रक्रिया को समझने में सहायक सिद्ध हो सकती है । हमें विश्वास है कि एकत्र' की बहुरंगी रचनाएँ प्रबुद्ध पाठकों, आलोचकों, शोधार्थियों एवं साहित्य के इतिहासकारों को आधुनिक हिंदी साहित्य की ऐसी दुर्लभ, मनोरंजक और महत्वपूर्ण सामग्री उपलब्ध कराएंगी, जिससे राकेश के कृति-व्यक्तित्व का सम्पूर्ण और सच्चा आकलन एवं पुनर्मूल्यांकन किया जा सकेगा ।

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