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डायरी | Diary

Showing 10 books of 22 books
Banyan Tree Books Lokbharti Prakashan Radhakrishna Prakashan Rajkamal Prakashan

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  1. Thalchar

    Thalchar

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    ''यह एक मारक क्षण है। इस बार अधिक सख्त और बेधक निगाहों के साथ। मैं इसके सामने हूँ। इसके निशाने पर। यह क्षण एक निर्णायक फैसला चाहता है। यह एक अपराजेय क्षण है। मेरे भीतर से ही निकला हुआ। शक्तिशाली और अबोधता से भरा। यह किसी उलझन में नहीं है। यह मैं हूँ जो इसे उलझन में डालने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह भुलावे में नहीं आ रहा है। 'जैसा मैं हूँ और जो मुझे होना चाहिए' को यह तेज़ धार से काटकर, दो टूक और दो भागों में कर देना चाहता है। यह क्रूर होते हुए भी आकर्षक है और अकाट्य भी। यह खुद एक तर्क है, अपने आपमें एक औचित्य। एक स्वयंसिद्ध काया और विचार। इसका सम्मोहन ज़बर्दस्त है। जानता हूँ यह अवसाद नहीं है। निराशा नहीं है। खिन्नता तो कतई नहीं। यह एक आदिम आकांक्षा है जो अब अपना आधिपत्य चाहती है। यह हरेक सर्जक में प्रसुप्त रहती है। जब वह जागती है तो पूरा जीवन माँगती है। अपना ही रक्त चाहती है। रचनाकार एक तरह की अस्वस्थता में, बुखार में और अपने रक्त में कैंसर की कोशिकाएँ लिए ही, सक्रिय और व्यथित रहने के लिए अभिशप्त है। जैसे वह तेज़ गति से मृत्यु की तरफ यात्रा कर रहा है लेकिन उसकी चाल में एक उफान है और शमित न हो सकनेवाला उद्वेग। अपने भीतर टाइम-बम को छिपाए हुए, जिसमें लगी घड़ी की टिक-टिक आवाज़ उसे सुनाई देती है लेकिन नहीं पता कि उसके पास कितना समय है। वह बस इतना जानता है कि उसका अन्त एक विस्फोट में होगा। इससे अधिक सांघातिक और क्या हो सकता है। यह पल मुझे साथ लेकर जीवन की किसी नई यात्रा पर ले जाने की जि़द पर अड़ गया है। इसका बढ़ा हुआ हाथ मेरे सामने है। —इसी संग्रह से
  2. Thalchar

    Thalchar

    Regular Price: Rs. 350

    Special Price Rs. 263

    25%

    ''यह एक मारक क्षण है। इस बार अधिक सख्त और बेधक निगाहों के साथ। मैं इसके सामने हूँ। इसके निशाने पर। यह क्षण एक निर्णायक फैसला चाहता है। यह एक अपराजेय क्षण है। मेरे भीतर से ही निकला हुआ। शक्तिशाली और अबोधता से भरा। यह किसी उलझन में नहीं है। यह मैं हूँ जो इसे उलझन में डालने की कोशिश कर रहा हूँ। लेकिन यह भुलावे में नहीं आ रहा है। 'जैसा मैं हूँ और जो मुझे होना चाहिए' को यह तेज़ धार से काटकर, दो टूक और दो भागों में कर देना चाहता है। यह क्रूर होते हुए भी आकर्षक है और अकाट्य भी। यह खुद एक तर्क है, अपने आपमें एक औचित्य। एक स्वयंसिद्ध काया और विचार। इसका सम्मोहन ज़बर्दस्त है। जानता हूँ यह अवसाद नहीं है। निराशा नहीं है। खिन्नता तो कतई नहीं। यह एक आदिम आकांक्षा है जो अब अपना आधिपत्य चाहती है। यह हरेक सर्जक में प्रसुप्त रहती है। जब वह जागती है तो पूरा जीवन माँगती है। अपना ही रक्त चाहती है। रचनाकार एक तरह की अस्वस्थता में, बुखार में और अपने रक्त में कैंसर की कोशिकाएँ लिए ही, सक्रिय और व्यथित रहने के लिए अभिशप्त है। जैसे वह तेज़ गति से मृत्यु की तरफ यात्रा कर रहा है लेकिन उसकी चाल में एक उफान है और शमित न हो सकनेवाला उद्वेग। अपने भीतर टाइम-बम को छिपाए हुए, जिसमें लगी घड़ी की टिक-टिक आवाज़ उसे सुनाई देती है लेकिन नहीं पता कि उसके पास कितना समय है। वह बस इतना जानता है कि उसका अन्त एक विस्फोट में होगा। इससे अधिक सांघातिक और क्या हो सकता है। यह पल मुझे साथ लेकर जीवन की किसी नई यात्रा पर ले जाने की जि़द पर अड़ गया है। इसका बढ़ा हुआ हाथ मेरे सामने है। —इसी संग्रह से
  3. Awarn Mahila Constable Ki Diary

    Awarn Mahila Constable Ki Diary

    Regular Price: Rs. 200

    Special Price Rs. 150

    25%

    'अवर्ण महिला कान्स्टेबल की डायरी' उपन्यास के क्षेत्र में नीरजा माधव असाधारण सिद्धि-सम्पन्न लेखिका हैं। उनकी विचार-विदग्धता, भाव-प्रवणता, अनछुए विषयों का वैविध्य उन्हें अपने समय के अन्य रचनाकारों से अलग रेखांकित करता है। उनके एक-एक शब्द में एक संस्कृति, जीवन-शैली अथवा सुख-दुख की आकृति सिमटी होती है जिसे दृष्टि-ओझल करते ही कथा-सूत्र के छूट जाने का भय होता है। यहाँ पर वे उन लेखकों से बिलकुल भिन्न हैं जो एक ही दृश्य के लम्बे, उबाऊ और शब्दों के मकड़जाल में पाठकों को उलझाए रखने का व्यापार करते हैं। नीरजा माधव के उपन्यासों में अपने युग की व्यापक बेचैनी, वेदना और सार्थक प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति दिखलाई पड़ती है। दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श के प्रचलित मुहावरों से बिलकुल पृथक् वे अपना मुहावरा स्वयं गढ़ती हैं और इस प्रकार अपनी राह भी। कुछ क्षण के लिए शिराओं में झनझनाहट पैदा करने वाला साहित्य देने के पक्ष में वे कभी नहीं रहीं। इस उपन्यास की भूमिका में भी वे लिखती हैं - ‘साहित्य का लक्ष्य मनुष्य के भीतर प्रेम, संयम, समर्पण और त्याग की उदात्त भावनाओं को जाग्रत करना है। ऐसे में यदि साहित्यकार भी मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति को ही उत्तेजित करने का व्यापार करने लगेगा तो यह सृजन तो नहीं ही हुआ।’ एक अनछुए विषय पर लिखा गया अप्रतिम और पठनीय उपन्यास है: अवर्ण महिला कान्स्टेबल की डायरी। आस्था पर हमलों और धार्मिक संघर्षों का इतिहास प्राचीन होते हुए भी नित नये विकृत रूपों में समाज को प्रभावित कर रहा है। ऐसे ही एक प्राचीन धार्मिक स्थल की सुरक्षा में लगी अवर्ण महिला कान्स्टेबल अपनी कर्तव्यनिष्ठा का निर्वहन करते हुए आसपास के परिवेश को अपनी पैनी दृष्टि से देखती है और इतिहास तथा वर्तमान की अपनी व्याख्या करती है। नायिकाप्रधान यह उपन्यास अतीत की विसंगतियों के साथ वर्तमान में भी जड़ें जमाए अनेक कुंठाओं एवं आग्रहों के साथ दलित-विमर्श के कई अनछुए पक्षों को रेखांकित करता चलता है।
  4. Ye Shahar Lagai Mohe Ban

    Ye Shahar Lagai Mohe Ban

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 225

    25%

    इस किताब के आखिरी सफहे पर यह इबारत दर्ज है- ‘कहते हैं, रूहों की आँखें हमेशा सलामत होती हैं ! उनकी याददाश्त कभी फिना नहीं होती ! वो सिर्फ गैब से आनेवाली किसी मोतबर आवाज की मुन्तजिर होती हैं !’ अपनी पिछली तमाम तहरीरों से बिलकुल अलग, इस किताब में, जाबिर हुसेन ने अपने पात्रों के नाम नहीं लिए ! उस बस्ती का नाम लेने से भी परहेज किया, जिसकी बे-चिराग गलियों में इस लम्बी कथा-डायरी की बुनियाद पड़ी ! एक बिलकुल नए फ्रेम में लिखी गई यह कथा-डायरी कुछ लोगों को जिन्दा रूहों की दास्ताँ की तरह लगेगी ! लेकिन इस दास्ताँ की जड़ें किसी पथरीली जमीं की गहराइयों में छिपी हैं ! जाबिर हुसेन ने इस पथरीली जमीन की गहराइयों में उतरने का खतरा मोल लिया है ! जिन जिन्दा रूहों को उन्होंने इस तहरीर में अपना हमसफ़र बनाया है, वो अगर उनसे खू-बहा तलब करें, तो उनके पास टूटे ख्वाबों के सिवा देने को क्या है ! जाबिर हुसेन जानते हैं, ये टूटे ख्वाब उनके लिए चाहे जितने कीमती हों, बस्ती की जिन्दा रूहों के सामने उनकी कोई वक्अत नहीं !
  5. Anam Yogi Ki Diary

    Anam Yogi Ki Diary

    Regular Price: Rs. 65

    Special Price Rs. 49

    25%

  6. Ret Par Khema

    Ret Par Khema

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 225

    25%

    एक दिन, तेज बहने वाली इन हवाओं ने, आधी रात, मेरे दरवाजे पर दस्तक दी थी, मुझे नाम से पुकारा था ! मेरे सहज भाव से दरवाजा खोल देने पर, इन हवाओं ने मेरे सीने पर जहर-बुझे खंजरों से हमला कर दिया था ! खून से तर-ब-तर मेरा बदन मेरे कमरे के फर्श पर बरसों-बरस लोटता रहा था ! बरसों-बरस, गर्द-व्-ख़ाक में डूबा रहा था ! आज फिर ये हवाये चक्रवात बनकर उभरी हैं, और मुझे अपने तूफानी बहाव में समेट लेना चाहती हैं ! मेरे दिल में इन हवाओं के लिए कोई शिकायत नहीं हैं ! मुझे इनके प्रति कोई गिला नहीं है ! कभी-कभी मैं सोचता हूँ, ये हवायें ही मेरे वजूद की जड़ों को मजबूती देती हैं, और मेरा इम्तेहान भी लेती रहती हैं ! मुझे हिला-डुला कर, मुझे हिचकोले दे-देकर ये हवाये इत्मीनान कर लेना चाहती हैं कि मैं जिन्दा हूँ ना, हालात की गोद में कभी न टूटने वाली नींद सो तो नहीं गया ! हवाओं, तेज बहो, और तेज बहो ! आँधियों और चक्रवात की मानिंद बहो ! मेरे पहले से ही लहूलुहान सीने पर अपने जहरीले तीरों की बारिश करो ! हवाओं, मुझे लील जाओ, ताकि खुदा की बनाई इस धरती पर कहीं मेरे वजूद का कोई निशान बाकी न रहे ! हवाओं, बहो, तेज बहो ! और तेज बहो ! हमारे और तुम्हारे लिए एक-दूसरे को आजमाने का इससे बेहतर मौसम और कब आयेगा !
  7. Ek Kishori Ki Dairy

    Ek Kishori Ki Dairy

    Regular Price: Rs. 150

    Special Price Rs. 113

    25%

    Out of stock

  8. Dastambu

    Dastambu

    Regular Price: Rs. 200

    Special Price Rs. 150

    25%

    मिर्जा असद-उल्लाह खां ग़ालिब का नाम भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के महँ कवियों में शामिल है ! मिर्जा ग़ालिब ने 1857 के आन्दोलन के सम्बन्ध में अपनी जो रूदाद लिखी है उससे उनकी राजनीतिक विचारधारा और भारत में अंग्रेजी राज के सम्बन्ध में उनके दृष्टिकोण को समझने में काफी मदद मिल सकती है ! अपनी यह रूदाद उन्होंने लगभग डायरी की शक्ल में प्रस्तुत की है ! और फारसी भाषा में लिखी गई इस छोटी-सी पुस्तिका का नाम है-दस्तंबू ! फारसी भाषा में 'दस्तंबू' शब्द का अर्थ है पुष्पगुच्छ, अर्थात बुके (Bouquet) ! अपनी इस छोटी-सी किताब 'दस्तंबू' में ग़ालिब ने 11 मई, 1857 से 31 जुलाई, 1857 तक की हलचलों का कवित्वमय वर्णन किया है ! 'दस्तंबू' में ऐसे अनेक चित्र हैं जो अनायास ही पाठक के मर्म को छू लेते हैं ! किताब के बीच-बीच में उन्होंने जो कविताई की है, उसके अतिरिक्त गद्य में भी कविता का पूरा स्वाद महसूस होता है ! जगह-जगह बेबसी और अंतर्द्वंद की अनोखी अभिव्यक्तियाँ भरी हुई हैं! इस तरह 'दस्तंबू' में न केवल 1857 की हलचलों का वर्णन है, बल्कि ग़ालिब के निजी जीवन की वेदना भी भरी हुई है ! 'दस्तंबू' के प्रकाशन को लेकर ग़ालिब ने अनेक लम्बे-लम्बे पत्र मुंशी हरगोपाल 'ताफ्तः' को लिखे हैं ! अध्येताओं की सुविधा के लिए सारे पत्र पुस्तक के अंत में दिए गए हैं ! भारत की पहली जनक्रांति, उससे उत्पन्न परिस्थितियां और ग़ालिब की मनोवेदना को समझने के लिए 'दस्तंबू' एक जरूरी किताब है ! इसे पढने का मतलब है सन 1857 को अपनी आँखों से देखना और अपने लोकप्रिय शाइर की संवेदनाओं से साक्षात्कार करना !
  9. Zinda Hone ka Sabut

    Zinda Hone ka Sabut

    Regular Price: Rs. 300

    Special Price Rs. 225

    25%

    जिन्दा होने का सबूत लोग कहते हैं, सूरज को अं/ेरी खाई में गिरते देखना अशुभ है ।’ ‘अं/ेरी खाई में कहां गिरता है सूरज! वह तो बस एक करवट लेकर हरे–भरे खेतों में उगी प़फसलों के बीच छिप जाता है, कुछ घंटों के बाद दोबारा अपना सप़फर शुरू करने के लिए ।’ एक बार, आसमान पर छाये बादलों के एक आवारा टुकड़े ने खेतों की गोद में गिरते सूरज को पूरी तरह अपनी मुट्ठियों में बंद कर लिया था । हम दोनों कुछ लम्हों के लिए कांप गए थे । हमारे शहर का सूरज डूबने के पहले ही काले /ब्बों की ओट में छिप गया था । मुझे नहीं मालूम, उस दिन और क्या हुआ था, पर मेरी और तुम्हारी आंखों ने कुछ लम्हों के बाद ही देखा कि सूरज आवारा बादलों की मुट्ठी से निकलकर दोबारा आसमान और ज़मीन जहां मिलते हैं, वहां दूर–दूर तक पैफल गया और इसकी लाल–सुर्ख़्ा किरणों ने पूरे क्षितिज को अपने विशाल दायरे में समेट लिया । जिन पाठकों ने जाबिर हुसेन की पिछली डायरियां पढ़ी हैं, उन्हें इस संकलन का नया कथा–शिल्प ज़रूर पसंद आएगा । आवरण पर मक़बूल पि़फदा हुसेन की प्रसि( कला–कृति ‘सप़फदर हाशमी’ साभार प्रकाशित की जा रही है ।
  10. Ateet Ka Chehra

    Ateet Ka Chehra

    Regular Price: Rs. 195

    Special Price Rs. 175

    10%

    जाबिर हुसेन अपनी डायरी के इन पन्नों को बेखाब तहरीसे' का नाम देते हैं । वो इन्हे अपने 'वसीयतनामे का आखिरी बाब' भी कहते है। ये तहरीरें उनकी डायरी में दर्ज इबारतें हैं । इबारतें, जो समय की रेत पर अनुभूतियों की एक व्यापक दुनिया उकेरती हैं। इबारते, जो किसी रचनाकार की कलम को उसकी जिंदगी के तल्ख आयामो से दूर ले जाती हैं । खुले आकाश तले, लंबे, ऊंचे पेड़ों के अंतहीन सिलसिलों की अजनबी अपनाइयत की ओर, जिससे निकलनेवाली रौशनी की किरणे उसे अपने जिस्म की गहराइयों में उतरती महसूस होती है। किरणें, जो उसे आत्म-सम्मान और वफादारी के साथ जिंदा रहने का हौसला देती हैं । जाबिर हुसेन अपनी रचनाओं में किसी काल्पनिक समाज की अच्छाइयां नहीं उभारते। वो अपने आस-पास के किरदारो, देखे-समझे, अनुभव की तपिश में परखे, लोगों की बाबत लिखते हैं । उनके सामाजिक सरोकार उनकी तमाम तहरीरों से बखूबी झलकते हैं । इंसानी रिश्तों के बीच पैदा होने वाली दरारे, रंग और नस्ल की पहचान, सत्ता के अवजार के रूप मे पुलिस का इस्तेमाल, जैसी कुछ सच्चाइयों से जाबिर हुसेन अपनी तहरीरों का शिल्प तैयार करते है । शिल्प, जो डायरी की सामान्य परिभाषा से कहीं अलग है । और जो अपने प्रतीक और बिंब के कारण मर्मस्पर्शी, बल्कि रोमांचकारी बन जाता है । इस शिल्प में जिंदगी की उदासियां भी विश्वास का संकेत बनकर उभरती हैं । तो फिर जाबिर हुसेन की ये तहरीरें उनके बेखाब वसीयतनामे' का आखिरी बाब कैसे हैं? अतीत का चेहरा इस सवाल की परतें खोलता है ।

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