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Bhagwaticharan Verma Rachanawali (Vols. 1-14)

Bhagwaticharan Verma Rachanawali (Vols. 1-14)

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Regular Price: Rs. 8,400

Special Price Rs. 7,560

10%

  • Year: 2008
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126716128
  •  
    भगवतीचरण वर्मा ने अपने प्रथम उपन्यास पतन की रचना अपने कॉलेज के दिनों में की थी जो गंगा पुस्तक माला के अन्तर्गत प्रकाशित हुआ था। इस उपन्यास को वे अपनी अपरिपक्व रचना मानते थे और उन्होंने इसे अपनी रचनाओं में गम्भीरता से नहीं लिया। सन् 1932 में भगवती बाबू ने पाप और पुण्य की समस्या पर अपना प्रसिद्ध उपन्यास चित्रलेखा लिखा जो हिन्दी साहित्य में एक क्लासिक के रूप में आज भी प्रख्यात है। तीन वर्ष उनका प्रथम सामाजिक उपन्यास है जो एक प्रेमकथा है। सन् 1948 में उनका प्रथम वृहत उपन्यास टेढे़-मेढ़े रास्ते आया जिसे हिन्दी साहित्य के प्रथम राजनीतिक उपन्यास का दर्जा मिला। इसी शृंखला में उन्होंने आगे चलकर वृहत राजनीतिक उपन्यासों की एक शृंखला लिखी जिनमें भूले-बिसरे चित्र, सीधी-सच्ची बातें, प्रश्न और मरीचिका, सबहिं नचावत राम गोसाईं और सामर्थ्य और सीमा प्रमुख हैं। भगवतीचरण वर्मा के सभी उपन्यासों में एक विविधता पाई जाती है। उन्होंने हास्य-व्यंग्य, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक, सभी विषयों पर उपन्यास लिखे। कवि और कथाकार होने के कारण वर्मा जी के उपन्यासों में भावनात्मकता और बौद्धिकता का सामंजस्य मिलता है। चित्रलेखा में भगवती बाबू का छायावादी कवि-रूप स्पष्ट दिखता है जबकि टेढ़े-मेढ़े रास्ते को उन्होंने अपनी प्रथम शुद्ध बौद्धिक गद्य-रचना माना है। इस खंड में भगवतीचरण वर्मा के तीन प्रसिद्ध उपन्यासों सबहिं नचावत राम गोसाईं, चित्रलेखा, युवराज चूण्डा को लिया गया है। सबहिं नचावत राम गोसाईं की विषयवस्तु आजादी के बाद के भारत में कस्बाई मध्यवर्ग की महत्त्वाकांक्षाओं के विस्तार और उनके प्रतिफलन पर रोचक कथासूत्रों के माध्यम से प्रकाश डालती है। चित्रलेखा की कथा पाप और पुण्य की समस्या पर आधारित है। युवराज चूण्डा की रचना चित्तौड़ के राणा लाखा के ज्येष्ठ पुत्र युवराज चूण्डा के विलक्षण व्यक्तित्व को केन्द्र में रखकर की गई है।

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    Bhagwati Charan Verma

    भगवतीचरण वर्मा

    जन्म: 30 अगस्त, 1903

    जन्मस्थान: उन्नाव जिले (उ.प्र.) का शफीपुर गाँव, इलाहाबाद से बी.ए., एल.एल.बी.। प्रारंभ में कविता- लेखन। फिर उपन्यासकार के नाते विख्यात। 1933 के करीब प्रतापगढ़ के राजा साहब भदरी के साथ रहे। 1936 के लगभग फिल्म कार्पोरेशन, कलकत्ता में कार्य। कुछ दिनों ‘विचार’ नामक साप्ताहिक का प्रकाशन-संपादन। इसके बाद बंबई में फिल्म-कथालेखन तथा दैनिक ‘नवजीवन’ का संपादन। फिर आकाशवाणी के कई केन्द्रों में कार्य। बाद में, 1957 में मृत्यु-पर्यंत स्वतंत्र साहित्यकार के रूप में लेखन। ‘चित्रलेखा’ उपन्यास पर दो बार फिल्म-निर्माण और ‘भूले-बिसरे चित्र’ साहित्य अकादमी से सम्मानित। पद्मभूषण तथा राज्यसभा की मानद सदस्यता प्राप्त।

    प्रकाशित पुस्तकें: अपने खिलौने, पतन, तीन वर्ष, चित्रलेखा, भूले-बिसरे चित्र, टेढ़े-मेढ़े रास्ते, सीधी सच्ची बातें, सामर्थ्य और सीमा, रेखा, वह फिर नहीं आई, सबहिं नचावत राम गोसाईं, प्रश्न और मरीचिका, युवराज चूण्डा, धुप्पल (उपन्यास); प्रतिनिधि कहानियाँ, मेरी कहानियाँ, मोर्चाबंदी तथा सम्पूर्ण कहानियाँ (कहानी-संग्रह); मेरी कविताएँ, सविनय और एक नाराज़ कविता (कविता-संग्रह); मेरे नाटक, वसीयत (नाटक); अतीत के गर्त से, कहि न जाय का कहिए (संस्मरण); साहित्य के सिद्धांत तथा रूप (साहित्यालोचन)।

    निधन: 5 अक्तूबर, 1981

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