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Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara

Bastar Ki Aadivasi Evam Lok Hastshilp Parampara

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  • Pages: 336p
  • Year: 2014
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Radhakrishna Prakashan
  • ISBN 13: 9788183616768
  •  
    कोई भी शिल्प या कला केवल शिल्प या कला नहीं हिती, वह इतिहास को भी अपने भीतर समेटे होती है और वर्तमान को भी उसी तरह सामने रखती है, उसे प्रतिबिंबित इअरती है ! इतना ही नहीं, हम उसमें सम्बंधित समाज का भविष्य भी देख-पढ़ सकते हैं ! कहना गलत न होगा कि आदिवासी एवं लोक हस्शिल्पों में उनका कल्पना-लोक बहुत ही प्रभावशाली ढंग से रूपायित होता और अहम् भूमिका निभाता दिखलाई पड़ता है ! बस्तर अंचल के हस्तशिल्प, चाहे वे आदिवासी हस्तशिल्प हों या लोक हस्तशिल्प, दुनिया-भर के कलाप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट करने में सक्षम रहे हैं ! कारण, इनमे इस आदिवासी बहुल अंचल की आदिम संस्कृति की सोंधी महक बसी रही है ! यह शिल्प-परंपरा और उसकी तकनीक बहुत पुरानी है ! शिल्पं का यह ज्ञान बहुत पुराना और पारंपरिक है किन्तु इस ज्ञान का लिखित स्वरुप अब तक नहीं मिल पाया था ! यही कारण है कि बस्तर अंचल में जन्मे, पीला, बढे और सतत जिज्ञासु साहित्यकार-लेखक और संस्कृत कर्मी हरिहर वैष्णव को यह लगा कि न केवल बस्तर, अपितु देश के अन्य भागों में विभिन्न हस्तशिल्प विधाओं से जुड़े शिल्पियों के पास शिल्प और उसकी परंपरा से सम्बंधित जो मौखिक ज्ञान है, वह किसी-न-किसी तरह अगली पीढ़ी तक हस्तांतरित होना चाहिए ! श्री वैष्णव के पास यहाँ के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्पियों से सम्बद्ध विभिन्न लोगों से बातचीत के दौरान पहले से एकत्र थोड़ी-बहुत सामग्री तो थी और कच्ची भी ! अपनी इस नहीं के बराबर और कच्ची जानकारी को उन्होंने सम्बंधित शिल्पियों से कई-कई बार मिलकर तथा सहभागी अवलोकन आदि के द्वारा और अधिक समृद्ध करने का प्रयास किया ! विश्वास है कि बस्तर के आदिवासी एवं लोक हस्तशिल्प तथा इसकी परंपरा में रुचि रखने वाले कलाप्रेमियों तथा अध्येताओं के लिए यह पुस्तक उपयोगी सिद्ध होगी !

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    Harihar Vaishnav

    जन्म : 19.01.1955, दन्तेवाड़ा (बस्तर-छत्तीसगढ़)।

    शिक्षा : हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर।

    मूलत: कथाकार एवं कवि। साहित्य की अन्य विधाओं में भी समान रूप से लेखन-प्रकाशन। सम्पूर्ण लेखन-कर्म बस्तर पर केन्द्रित। प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानी-कविता के साथ-साथ महत्त्वपूर्ण शोधपरक रचनाएँ प्रकाशित। बस्तर के लोक-संगीत तथा रंगकर्म में भी दखल।

    कृतियाँ : मोहभंग (कहानी-संग्रह); बस्तर की मौखिक कथाएँ, बस्तर का लोक साहित्य, राजा और बेल कन्या, बस्तर की गीति कथाएँ, बस्तर की लोक कथाएँ, (लोक साहित्य); लछमी जगार, धनकुल (बस्तर का लोक महाकाव्य); चलो, चलें बस्तर, बस्तर के तीज-त्यौहार, (बाल साहित्य); बस्तर के धनकुल गीत (शोध विनिबन्ध); बस्तर का आदिवासी एवं लोक संगीत (आंचलिक संस्कृति)।

    विशेष : साहित्य-ऋषि लाला जगदलपुरी : लाला जगदलपुरी समग्र (व्यक्तित्व एवं कृतित्व), तीजा जगार, सुमिनबाई बिसेन द्वारा प्रस्तुत छत्तीसगढ़ी लोक-गाथा धनकुल (लोक-गाथा)।

    सम्पादन : घुमर (हल्बी साहित्यिक पत्रिका); प्रस्तुति, ककसाड़ (लघु पत्रिकाएँ)।

    अन्य : सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम के अन्तर्गत आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी के आमंत्रण पर 1991 में आस्ट्रेलिया; लेडिग-रोव्होल्ट फाउंडेशन के आमंत्रण पर 2000 में स्विट्जरलैंड तथा दी राकेफेलर फाउंडेशन के आमंत्रण पर 2002 में इटली प्रवास। स्कॉटलैंड की एनीमेशन संस्था हाईलैंड एनीमेशन के साथ हल्बी की पहली एनीमेशन फिल्मों का निर्माण। फ्रांस की टी.वी. फिल्म प्रोडक्शन कम्पनी बी.एफ.सी. प्रोडक्शंस द्वारा बस्तर दशहरा पर तैयार फिल्म के लिए बस्तर की बोलियों के संवादों का अंग्रेजी अनुवाद।

    सम्मान : छत्तीसगढ़ हिन्दी साहित्य परिषद् से 'स्व. कवि उमेश शर्मा सम्मान’ 2009 में। दुष्यन्त कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय, भोपाल द्वारा वर्ष 2009 के लिए 'आंचलिक साहित्यकार सम्मान’।

    सम्पर्क : सरगीपाल पारा, कोंडागाँव-494226, बस्तर-छत्तीसगढ़।     

    ईमेल : hariharvaishnav@gmail.com

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