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Badalon Ke Rang, Hawao Ke Sang

Badalon Ke Rang, Hawao Ke Sang

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  • Pages: 372p
  • Year: 2016, 2nd Ed.
  • Binding:  Hardbound
  • Language:  Hindi
  • Publisher:  Rajkamal Prakashan
  • ISBN 13: 9788126722419
  •  
    बादलों के रंग, हवाओं के संग बादलों के रंग, हवाओं के संग भारत के बेहद समृद्ध लोकज्ञान, उसकी कालातीत परंपरा और उनकी मौजूदगी की कहानी है। यह कहानी स्मृति, विश्वास और अनुभवजनित है जिसके प्राण में है संवेदना और मानवीयता। यह कहानी है उस समाज की जो अपने मनमौजी स्वभाव, वर्जनाहीन जीवन और सामूहिक सोच के दर्शन से जिंदगी जीता है। उसकी जीवन-शैली में है आनंद, उत्सव और पारस्परिक समर्पण, जो रोज रससिक्त होकर बांसुरी और मादल, गीत और नृत्य, प्रकृति और उससे जुड़ी परंपरा में डूब जाता है। शेष दुनिया से बेखबर होकर। लेखक अमरेंद्र किशोर का बचपन बिहार और झारखंड के गाँवों और आदिवासी समाज में बीता। बीते करीब दो दशकों से वे वन्य अंचलों की आबादी की परंपरागत आस्थाओं के संकलन और उसकी अस्मिता को समृद्ध करने में जुटे हैं। अपूर्व भावमयता के साथ गहन संवेदना में डूबकर अमरेंद्र उन इलाकों के जीवन से उन तथ्यों को जुटाने में समर्थ रहे हैं जिनका कोई विकल्प नहीं है। खास तौर से श्रम विभाजन की कट्टरता के जमाने में, और पूँजीवाद के इस दौर में, जब बाजारवाद सामाजिक स्वभाव बन चुका है। इस किताब से जीने की चाहत पैदा होती है। इससे जीवन के कई रहस्य खुलते हैं और यथार्थ एवं कर्मकांड, तर्कसंगत ज्ञान और अंधविश्वास का फर्क समझ में आता है। जल-जंगल-जमीन-जन और जानवर के अन्योन्याश्रित रिश्तों के पैरोकार अमरेंद्र किशोर इस किताब से यह साबित करने में सफल रहे हैं कि लोकज्ञान की परंपरा उतनी ही प्राचीन है जितना सभ्यता का इतिहास और जितनी पुरानी संस्कृति की कहानी। संस्कृति से जुदा कुछ भी नहीं - न पेड़, न धर्म और न लोक आस्थाएँ। पूरी किताब में लेखक एक कुशल ललित निबंधकार नजर आते हैं तो साथ में एक समझदार समाजविज्ञानी भी। भारत की लोकोपयोगी परंपराओं-आस्थाओं एवं मान्यताओं को तर्कसंगत, जीवंत और रोचक रूप में देखने का सुुुंदर प्रयास है बादलों के रंग, हवाओं के संग।

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    Amrendra Kishore

    जन्म: 8 जून, 1971 को पटना में हुआ। बचपन कैमूर की दुर्गम पहाड़ियों में बीता, क्योंकि इनके पिता श्री कृष्णदेव नारायण पांडेय 1972 से 1980 तक उसी वन्य अंचल के आदिवासी आवासीय विद्यालयों में सेवारत रहे। बाद में अमरेंद्र ने सासाराम के शांति प्रसाद जैन महाविद्यालय से स्नातक (अंग्रेजी) की पढ़ाई पूरी की।

    अमरेंद्र किशोर करीब 23 सालों से जन और वन के अन्योन्य रिश्तों की वकालत कर रहे हैं। ग्रामीण विकास, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन, जन सहभागिता की विभिन्न गतिविधियों में संलग्न अमरेंद्र ने सामाजिक वानिकी, रोजगारपरक तकनीक और स्थानीय स्वशासन से आम जनता को जोड़ने  में अपना खास योगदान दिया है। देश के दुर्गम इलाकों में सामाजिक लामबंदी और बेहतर आर्थिक स्थिति बहाली के मंसूबे लेकर 175 से ज्यादा परियोजनाओं का कुशल कार्यान्वयन और सफल निष्पादन कर चुके हैं। उड़ीसा की अनब्याही माताओं, झारखंड से महानगरों में भेजे जानेवाली वनपुत्रियों तथा जनजातीय विरोधी सरकारी नीतियों जैसे कई मुद्दों पर अमरेंद्र किशोर ने मुल्क के मीडिया को दिशा दी है। अमरेंद्र को देश के सात राज्यों के अलावा बांग्लादेश के बंदरवन-रंगामाटी और इण्डोनेशिया के कलिमंटन इलाकों में सामाजिक कार्यों का खास अनुभव है।

    अभी तक इनकी छः किताबें आजादी और आदिवासी, सत्ता-समाज और संस्कृति, पानी की आस (सभी निबंध संग्रह), जंगल-जंगल लूट मची है (हिन्दी अकादमी, दिल्ली सरकार द्वारा पुरस्कृत निबंध संग्रह), ये माताएँ अनब्याही (केस स्टडी) और माँ नाराज क्यों है (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं। इनके अलावा वन-जन और सामाजिक मुद्दों पर इनके 500 से कहीं ज्यादा लेख-रिपोर्ट और फीचर हिन्दी और अंग्रेजी में प्रकाशित हो चुके हैं।

    • Sarthak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Chahak An Imprint of Rajkamal Prakshan
    • Funda An Imprint of Radhakrishna
    • Korak An Imprint of Radhakrishna

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